रायपुर:जूनियर डॉक्टरों की सेवा भावना ने बचायी दो मरीजों की जान

 रायपुर:जूनियर डॉक्टरों की सेवा भावना ने बचायी दो मरीजों की जान
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रायपुर ,13 मई (हि.स.)। कोरोना की दूसरी लहर से निर्मित बेहद ही विषम परिस्थितियों के बीच डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल विभाग के जूनियर डॉक्टरों की टीम ने बेहद ही गंभीर स्थिति में भर्ती दो मरीजों को अपनी सेवाभावना की बदौलत ,एंडोट्रैकियल ट्यूब यानी कृत्रिम श्वांस नली लगाकर जल्दी ठीक होने में मदद की। दोनों मरीज के फेफड़े में संक्रमण अधिक होने के कारण इनका इंटुबैशन किया गया और ट्यूब के सहारे कृत्रिम सांस (वेंटिलेटर से) दी गई जिससे दोनों मरीज, जिन्हें सांस लेने में बेहद कठिनाई हो रही थी, उनके फेफड़ों की रक्षा हो सकी। अभी दोनों मरीज आईसीयू 4 में भर्ती हैं और जल्द ही डिस्चार्ज होने वाले हैं। एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग की डॉक्टर लिली शेरोन, डॉ. तारेन्द्र देवांगन, डॉ. मुकेश नाग, डॉ. सुषमा, डॉ. अंकिता, डॉ. त्रिलोक, डॉ. दिव्यानंद, डॉ. शीतल दास और डॉ. मनीष कुर्रे की टीम ने लगातार कई दिनों तक सिमगा, बलौदाबाजार निवासी 28 वर्षीय जंतु मांझी और कवर्धा की 42 वर्षीय सुदामा बाई का इलाज एवं देखरेख किया। इन दोनों मरीजों को कोरोना के साथ-साथ आंत अवरोध की बीमारी की समस्या थी। मरीजों का ऑक्सीजन सैचुरेशन भी बहुत कम था। इनका ऑपरेशन हुआ ,लेकिन स्थिति गंभीर होने के कारण दोनों मरीजों को सांस लेने में कठिनाई हो रही थी, इनके फेफड़ों की रक्षा के लिये गले में ट्यूब (इंटुबैशन) की मदद से कृत्रिम सांस दी गई जिससे जल्दी दोनों रिकवर हो सकें। अम्बेडकर अस्पताल के कोविड क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. ओ. पी. सुंदरानी के मुताबिक वेंटिलेटर में मरीजों का एनआईवी सपोर्ट से रिकवरी हो जाती है, लेकिन इंटुबैशन के बाद कोविड मरीजों का ट्यूब निकालना बहुत मुश्किल होता है, पर दोनों मरीज एक्सटुबैट हुए। जूनियर डॉक्टरों के अथक परिश्रम और सेवा की बदौलत कुछ दिनों बाद ये दोनों मरीज डिस्चार्ज हो जाएंगे। क्या है एंडोट्रैकियल इंटुबैशन एंडोट्रैकियल इंटुबैशन (ईआई) अक्सर एक आपातकालीन प्रक्रिया होती है जो ऐसे लोगों पर की जाती है जो बेहोश हैं या जो अपने दम पर सांस नहीं ले सकते हैं। एंडोट्रैकियल इंटुबैशन एक खुला वायुमार्ग बनाता है और घुटन को रोकने में मदद करता है। यह प्रक्रिया बेहद ही सावधानीपूर्वक मरीज को बेहोश करके किया जाता है। इसमें एक लचीली प्लास्टिक ट्यूब होती है जो सांस लेने में मदद करने के लिए मुंह के माध्यम से श्वासनली में रखा जाता है और इसकी मदद से फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है। डॉक्टर लिली शेरोन के पैर में मोच फिर भी कोविड मरीजों की चिंता एनेस्थेसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग के जूनियर डॉक्टरों की टीम में शामिल डॉ. लिली शेरोन का जज्बा देखने को बनता है। उनके पैर में मोच के बाद भी वे जल्द ठीक होकर वापस कोविड ड्यूटी करना चाहती हैं। डॉ. लिली शेरोन कहती हैं, कोरोना काल में मैंने लोगों को सबसे ज्यादा परेशान देखा। यदि हम लोग उनका अच्छे से इलाज करते हैं तो उनके मन में भी जल्दी ठीक होने की ललक जागती है। वे डॉक्टरों की ओर उम्मीद की निगाह से देखते हैं और यही प्रश्न करते हैं कि वे कब ठीक हो जाएंगे। उनकी यही उम्मीद हमें भी हौसला देती है । हिन्दुस्थान समाचार /केशव शर्मा

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