पंजाब में कपड़ा बनाने वाला मतलू गांव में मिला रहा बालू-सिमेंट, फिर जाएगा लुधियाना
पंजाब में कपड़ा बनाने वाला मतलू गांव में मिला रहा बालू-सिमेंट, फिर जाएगा लुधियाना
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पंजाब में कपड़ा बनाने वाला मतलू गांव में मिला रहा बालू-सिमेंट, फिर जाएगा लुधियाना

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सुरेन्द्र बेगूसराय, 20 जून (हि.स.)। हजारों-हजार की संख्या में प्रवासी कामगारों के घर वापसी के बाद तत्काल सरकार उन्हें स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने की कवायद कर रही है। मनरेगा समेत विभिन्न योजनाओं के काम तथा अन्य सरकारी विभागों में होने वाले कार्य में बाहर से आए श्रमिकों को लगाया गया है। लॉकडाउन के दौरान शुरू किए गए कार्य में बेगूसराय के करीब 30 हजार मजदूरों को काम मिल चुका है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान का शुभारंभ हो रहा है, इसमें बेगूसराय के 60 हजार से अधिक श्रमिकों को 125 दिन तक काम मिलने की उम्मीद है। लेकिन इन सारी कवायद के बावजूद बाहर से आए कामगार यहां रुकने को तैयार नहीं हैं, वे फिर परदेस जाएंगे। हालांकि दिल्ली में बेतहाशा बढ़ रहे कोरोना संक्रमितों की संख्या को देखते हुए लोग वहां जाने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन अन्य जगह जरूर जाएंगे। बेगूसराय के हजारों कामगार लुधियाना के रेडीमेड फैक्ट्री में काम करते थे, लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद होने से सभी गांव आ गए और अपने गांव में कुछ काम कर दिन गुजार रहे हैं। लेकिन जल्दी ही वे सब पंजाब जाएंगे, पंजाब के लुधियाना के कपड़ा फैक्ट्री मालिकों ने लेबर को फोन किया है तथा आने की तैयारी करने को कहा है। कपड़ा फैक्ट्री में कच्चा माल जुटाया जा रहा है, सब सामान पहुंच जाएगा तो कामगार बिहार के गांव से पंजाब के प्रमुख शहर लुधियाना की ओर कूच कर जाएंगे। गढ़पुरा प्रखंड के भंसी गांव का मतलू राम भी अपने दो भाइयों के साथ लुधियाना के छावनी मोहल्ला, मुन्ना सिंह नगर में कपड़ा सिलाई का काम करता है। तीनो भाई मिलाकर रोज 12 से 15 सौ तक कमा लेते थे। मतलू ने बताया कि हम लोग ठेका पर काम करते थे, एक पेंट बनाने का 42 रुपया दिया जाता था, तीनो भाई मिलाकर 30 से 40 पेंट रोज बना लेते थे। मकान का किराया चार हजार लगता था, दिन अच्छे से गुजर रहे थे। लेकिन जब लॉकडाउन हो गया तो फैक्ट्री बंद हो गई। पंजाब की सरकार ने मात्र दस दिन खाना खिलाया, वह दिन भी दोपहर में एक-दो बजे के बीच एक बार खाना मिलता था। जब सरकारी खाना मिलना बंद हो गया तो आफत हो गई, मकान मालिक ने दो माह का किराया माफ कर दिया। लेकिन खाना की बड़ी समस्या थी, थक हार कर घर से दस हजार रुपया मंगवाया और किसी तरह जीने लायक खाना खाकर दिन गुजारते रहे। 22 मई को जब स्थिति काफी मुश्किल हो गई तो अन्य लोगों की तरह घर जाने के लिए चल दिए। स्टेशन के पास आने पर कैंप की व्यवस्था थी, वहां मेडिकल जांच के बाद सर्टिफिकेट और टिकट देकर ट्रेन में बैठा दिया गया। वहां से बस्ती तक ट्रेन से आए, बस्ती से बस से फिर गोपालगंज बॉर्डर तक भेजा गया, गोपालगंज से समस्तीपुर तक बस से आए, उसके बाद समस्तीपुर से बरौनी और बरौनी से होते हुए अपने घर आ गए हैं। अब यहां राजमिस्त्री के साथ मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन यह काम कितने दिन मिलेगा, मजबूरी है, फिर परदेस जाना ही पड़ेगा। हिन्दुस्थान समाचार-hindusthansamachar.in