कोरोना के लिए मोदी को दोषी ठहराने वाले, हकीकत तो जानें !

कोरोना के लिए मोदी को दोषी ठहराने वाले, हकीकत तो जानें !
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विक्रम उपाध्याय देश में कोरोना से हजारों लोग मर रहे हैं। ऑक्सीजन से लेकर दवाइयों की भारी कमी है। मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया है और चारों तरफ हाराकिरी का मंजर है। ऐसा तास्सुर मिल रहा है कि देश भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। अदालतें, पत्रकार, समाज के कथित जागरूक लोग और बदहवास जनता की ओर से एक ही आवाज आ रही है। कुछ करो सरकार ! यहां अब सरकार कौन है। क्या सरकार का मतलब सिर्फ नरेंद्र मोदी की सरकार है। या सरकार का मतलब देश के सभी राज्यों से भी है। अफसोस की बात यह है कि कोरोना से होने वाली हर मौत और कोरोना के इंतजाम में हर कोताही के लिए प्रधानमंत्री मोदी को जिम्मेदार बताने की होड़-सी लग गई है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही सक्रिय मोदी विरोधी लोग जिनके चेहरे पहले से ही मोदी दुश्मन के रूप में जाने जाते हैं, बेहद सक्रिय हो गए हैं। देश के कई यू-ट्यूबर मोदी को ही कोरोना के लिए जिम्मेदार ठहराने में लगे हैं। मोटे तौर पर मोदी को कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार बताने वाले चार दलीले दे रहे हैं। पहली कि मोदी ने अपना सारा ध्यान चुनाव में लगाया और कोरोना के प्रति सचेत करने वाली सभी आवाजों को नकार दिया। दूसरी दलील यह दी जा रही है कि कोरोना फैलने के बावजूद मोदी ने हिंदुओं को खुश करने के लिए कोरोना काल में भी कुंभ की इजाजत दे दी। तीसरी दलील यह दी जा रही है कि देश में विकसित कोरोना वैक्सीन को अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित रखने की बजाए दुनिया को बांट कर अपनी वाहवाही करवाई और चौथी दलील यह कि मोदी ने कोरोना के इंतजाम में उन राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया, जहां गैर भाजपा सरकारें थीं। चारों दलीलों को सच्चाई की कसौटी पर कसने के लिए कुछ हिम्मत और कुछ समझ चाहिए। कोरोना ने हमारे देश को नहीं पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। हमसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशोें में अमेरिका यूरोप और अफ्रीका के कई देश शामिल हैं। अमेरिका में अबतक सबसे ज्यादा कोरोना से मौतें हुईं है। तो क्या इन सभी देशों ने अपने यहां चुनाव बंद कर दिए। पब्लिक मीटिंग पर पाबंदी लगा दी या लोगों को त्योहार या सांस्कृतिक कार्यक्रमों से वंचित कर दिया। नहीं। दुनिया कोरोना से लड़ भी रही है और सरकारें या संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियां भी निभा रही हैं। जो लोग यह कहते हैं कि मोदी को कोरोना काल में चुनाव नहीं कराना चाहिए था, उन्हें यह मालूम होना चाहिए था कि हमारे देश में प्रधानमंत्री चुनाव होने या ना होने का फैसला नहीं करते। यह काम चुनाव आयोग का है, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। प्रधानमंत्री मोदी को बंगाल चुनाव में शामिल होने को कोरोना विस्फोट के साथ जोड़ने वाले जरा अखबार पलट कर देखें 21 जनवरी 2021 को बंगाल चुनाव पर चर्चा के लिए चुनाव आयोग ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस की ओर से उनके सेकेट्री जेनरल पार्थ चटर्जी शामिल हुए। जानते हैं चुनाव को लेकर उनकी चिंता क्या थी और उन्होंने चुनाव आयोग से शिकायत क्या की? यह कि बंगाल के चुनाव में बाॅर्डर सिक्योरिटी फोर्स को न लगाया जाए। बकौल उनके बीएसएफ के लोग उनके मतदाताओं को धमका रहे हैं और भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए कह रहे हैं। उस बैठक में किसी ने भी नहीं कहा कि चुनाव इस समय नहीं होना चाहिए क्योंकि देश में कोरोना फैलने का खतरा है। क्या भाजपा को अकेले चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए था। यही नहीं चुनाव के बीच में 15 अप्रैल को फिर से चुनाव आयोग ने कोविड को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाई और नियमों के पालन के प्रति चेताया। क्या कोई यह दावा कर सकता है कि 15 अप्रैल के बाद ममता बनर्जी या उनके समर्थकोें ने रैलियां रोक दी, रोड शो बंद कर दिया या कोविड नियमों का पालन किया। जो लोग चुनाव को कोरोना से जोड़ रहे हैं उन्हें यह जानने की जरूरत है कि पूरे विश्व में कोरोना भी फैला और पूरे विश्व में चुनाव भी होते रहे। 2020-21 के दौरान अफ्रीका में इजिप्ट, तंजानिया और नाइजीरिया समेत 19 देशों में चुनाव हुए। एशिया में भारत ही नहीं दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, सिंगापुर और मलेशिया समेत 21 देशों में चुनाव कराए गए। हमारे पड़ोस पाकिस्तान में पिछले तीन महीने में सात बाई इलेक्शन हुए। यूरोप में ग्रीक, आयरलैंड, फ्रांस, इटली, और इंग्लैंड समेत 25 देशों में चुनाव संपन्न हुए। पूरी दुनिया के लिए मायने रखने वाले यूएस प्रेसेडिंशियल इलेक्शन भी इसी कोरोना काल में आयोजित कराया गया। इन सभी देशों में भी कोरोना ने कोहराम मचाया। क्या किसी ने कहा कि यूरोप में मौत के लिए इटली फ्रास या इंग्लैड के राष्ट्राध्यक्ष जिम्मेदार हैं। यूरोप के सभी देशों को मिला लें वहां 29 अप्रैल तक कोरोना से 678653 लोगों की मौत हुई है। अकेले अमेरिका में 5,77,000 लोगों की कोरोना से मौत हुई है। अब बात करते हैं कि मोदी का कथित हिंदुत्व और कोरोना से हुई मृत्यु के बीच संबंध की सच्चाई का। अनुमान लगाया जा रहा है कि हरिद्वार कुंभ में लगभग डेढ़ करोड़ लोग आए। इसके पहले 2019 में इलाहाबाद में जो कुंभ का आयोजन हुआ था उसमें आने वालों की संख्या 24 करोड़ थी। इसके अतिरिक्त 10 लाख से अधिक विदेशी सैलानी भी वहां आए थे। जाहिर है कि हरिद्वार कुंभ में आने वालों की संख्या सीमित रखने की कोशिश की गई। इस बात की पूरी कोशिश भी की गई कि यहां कोरोना प्रोटोकाॅल का पालन भी हो। लेकिन यह कम अफसोस की बात नहीं कि उसके बाद भी हजारों लोग कोरोना संक्रमित हुए उनमें से काफी लोगों की मृत्यु भी हो गई। लेकिन कोई बताए कि किस देश ने अपने यहां धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों पर पूरी तरह रोक लगा दिया। मुस्लिमों के लिए सबसे पवित्र मक्का मदीना अक्टूबर 2020 से खो दिया गया है, जबकि वहां लगभग 7000 लोगों की कोरोना से मृत्यु हो चुकी है। इसाइयों के लिए वेटिकन सिटी का चर्च फरवरी 2021 से खोल दिया गया है। न्यू इयर की विशेष पार्टियां पूरे ऑस्ट्रेलिया में आयोजित की गई। नेपाल, पाकिस्तान और बर्मा में हजारों लाखों लोग सड़कों पर विरोध में उतरे। वहां भी कोविड से मौते हुईं। लेकिन उसके लिए क्या वहां के सत्ता प्रमुख को दोषी ठहराया गया। या उनसे इस्तीफा मांगा गया। पूरे विश्व में 195 देश हैं, लेकिन उनमें से दस ही ऐसे देश हैं जिन्होंने कोविड से लड़ने के लिए वैक्सीन को इजाद किया। भारत उन इक्के-दुक्के देशों में शामिल है, जिनके यहां विकसित वैक्सीन को दुनिया में उत्तम वैक्सीन का दर्जा दिया गया। यहां तक अमेरिका के लैब ने भी भारतीय वैक्सीन को सराहा और उसे पूरी तरह कारगर भी बताया। भले ही हमारे वैज्ञानिकों ने इस वैक्सीन को विकसित किया हो, लेकिन उनको भरपूर प्रेरणा, हर तरह की सहायता और सुविधा तथा वैक्सीन को हर व्यक्ति के पास पहुंचाने की ललक और पीड़ा प्रधानमंत्री मोदी के अलावा और किसी में नहीं दिखाी। जिस समय हमारे वैक्सीन बाजार में पहुंचे तब तक कोरोना का प्रकोप थोड़ा थम चुका था। डब्लूएचओ व विश्व बिरादरी की अपील और भारत की क्षमता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने वैक्सीन पड़ोसी मुल्कों के साथ दुनिया के कई और देशों को उपलब्ध कराया। आज उसी का परिणाम है कि मुसीबत के समय दुनिया के तमाम देश भारत की ओर सहायता लेकर दौड़ रहे हैं। भारत की क्षमता और दक्षता पर पूरी दुनिया को भरोसा है और इसे कायम भले ही नहीं किया हो मोदी ने लेकिन भरोसा बढ़ाया जरूर है। इसलिए यह कहना कि मोदी ने दुनिया के कुछ देशों को वैक्सीन देकर देश की जनता को नुकसान पहुंचाया सही नहीं है। यह वसुधैव कुटुंबकम के भारत के सिद्धांत के खिलाफ भी है। आज भारत को दुनिया के अन्य देश में विकसित दूसरे वैक्सीन भी उपलब्ध हो पा रहा है तो इसलिए कि भारत ने विश्व को अपना परिवार माना है और उनके लिए किया है। इसबार भारत में कोरोना की लहर केरल, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की तरफ से आई। फरवरी के दूसरे सप्ताह में केंद्र ने केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पंजाब और जम्मू कश्मीर को पत्र लिखकर आगाह किया कि वहां कोरोना के मामले औसत से अधिक आ रहे हैं, इसलिए रैपिड एंटीजेन और आरटी पीसीआर के टेस्ट में तेजी लाएं। केंद्र सरकार ने इन राज्यों को यह भी कहा कि जहां भी कोरोना के केस ज्यादा मिले वहां कठोर, विस्तृत निगरानी रखें वायरस के फैलाव को रोकने के लिए कड़े नियमों के साथ कंटेनमेंट जोन बनाए। 21 फरवरी को स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि देश के कुल एक्टिव केस के 74 प्रतिशत मामले केरल और महाराष्ट्र से आ रहे हैं। क्या यह कहें कि महाराष्ट्र, केरल या छत्तीसगढ़ की सरकार ने पूरे देश में कोरोना फैलाने में कोई योगदान किया। नहीं, यह कोरोना अभी भी मिस्ट्री बना हुआ है। इससे लड़ने की कोशिश हो रही है। इससे अभी कोई भी देश पार नहीं पाया है। यदि किसी एक के वश में होता तो पूरी दुनिया इसके पीछे अपनी पूरी ताकत लगा कर खड़ी नहीं हुई होती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में एक ऐसी किवदंती बनी या कुछ हद तक सिद्ध भी हो गया है कि वह सबकुछ कर सकते हैं। मोदी है तो मुमकिन है। यह बात आम आदमी के मन में घर कर गया है। यदि उसमें देश चूकता है तो लोगों को लगता है कि मोदी ही चूक गए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)