चिंता का ग्राफ बढ़ाती जंगल की आग

चिंता का ग्राफ बढ़ाती जंगल की आग
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सियाराम पांडेय 'शांत' देश-विदेश में जंगल जल रहे हैं। जंगलों में आग लगी है। जंगल की आग बुझाए नहीं बुझती। बढ़ती ही रहती है और जैव विविधता का नाश करती है। जैव विविधता नष्ट होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। जंगल उत्थान की प्रेरणा देते हैं। उसकी हरियाली मन को आनंदातिरेक से भर देती है। भारत में तो वृद्ध होने पर जंगल जाने और तपस्या करने की परंपरा रही है। राजा जवानी में जंगलों में आखेट करने जाते थे और बुढ़ापे में तपस्या करने। 'चौथेपन नृप कानन जाहीं।' अब न राजा रहे और न ही तपस्या वाली बात। जंगल अकेले पड़ गए हैं। जंगल में हर साल आग लग जाती है। यह आग खुद लगती है या लगाई जाती है, यह खोज का विषय हो सकता है। इसके पीछे व्यक्ति की असावधानी और लापरवाही कारक हो सकती है तो मक्कारी और धूर्तता भी इसकी बड़ी वजह रही है। कविवर रहीम ने लिखा है कि 'अति आदर ते होत है, बहुत अनादर भाय। मलयागिरी की भीलनी चंदन देत जराय।' जंगलों के जलने के लिए किसी को भी दोषी ठहराना ठीक नहीं है लेकिन जंगलों को बचाने के प्रयास तो होने ही चाहिए। जंगल ही न बचे तो जीवन रक्षक वनौषधियां हमें कैसे मिलेंगी? जंगल न बचा तो वन्य जीव कहां रहेंगे? वन्य जीव वैसे ही गांवों में पहुंचने लगे हैं। जब जंगल ही जलकर राख हो जाएंगे तो आदमी का तो जीना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए जरूरी है कि जंगलों को कटने और जलने से बचाया जाए। जबतक जंगल हैं तभी तक मानव जीवन सुरक्षित है। एक दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के कालिंजर के जंगल में आग लग गई। वैसे कालिंजर के जंगलों में आग हर साल लगती है और इस क्रम में बहुत सारे जीव-जंतु जलकर नष्ट हो जाते हैं। चित्रकूट के जंगलों में पिछले कई दिनों से आग लगी हुई है। देवांगना घाटी की हवाई पट्टी से सटे जंगल में आग की लपटें लोगों को डरा रही हैं। इस आग पर अभी काबू पाया जा सका था कि कालिंजर के जंगल में आग का लगना अचंभित करता है। फरवरी, 2021 में इटावा जिले में राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी के जंगल में लगी भीषण आग से दो हेक्टेयर भूमि पर खड़े सैकड़ों वृक्ष जलकर राख हो गए। 24 मार्च 2021 को कालपी क्षेत्र के छौंक के जंगल में अचानक भीषण आग लगने से सैकड़ों पेड़ जलकर राख हो गए। इसी मार्च माह में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद के मड़िहान तहसील क्षेत्र के पटेहरा जंगल में भड़की आग ने देखते ही देखते 15 किलोमीटर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। चार जनपदों से फायर ब्रिगेड बुलानी पड़ी थी। वैसे भी जिस तरह मौसम बदल रहा है। मार्च में ही मई-जून जैसी गर्मी पड़ रही है।अगलगी की बढ़ती घटनाओं से इंसान ही नहीं, वन्य जीव तक परेशान हैं, वह सुखद संकेत तो नहीं ही है। इस साल जंगलों में आग लगने की घटनाओं की बाढ़-सी आ गई है। देश के कई जंगलों और पहाड़ों में आग लगी है जिससे बेशकीमती पेड़-पौधे और दुर्लभ वनस्पतियां जलकर राख हो रही हैं। वनों में लगी आग से देश में हर साल 550 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यह और बात है कि जंगल की आग से निपटने के लिए सरकार के स्तर जारी फंड का 45 से 65 प्रतिशत तक ही इस्तेमाल हो पाता है। वनों में आग लगने की घटना पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। हर साल दुनिया भर में 6 लाख 70 हजार किमी. जंगल आग की भेंट चढ़ रहे हैं जो कि विश्व के कुल वन क्षेत्रों का 2 प्रतिशत भाग है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में देश में 277779 ऐसे वन क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं जहां अक्सर आग लगती है। अकेले मिजोरम में सर्वाधिक 32659 वनक्षेत्रों में प्राय: आग लगती है। रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2021 तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में नवंबर से जनवरी तक जंगल में आग लगने की 2984 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें सर्वाधिक 470 उत्तराखंड में दर्ज की गई हैं। उत्तराखंड में पिछली सर्दियों में नवंबर से जनवरी तक जंगल में आग की 39 घटनाएं हुई थीं। तब अरुणाचल प्रदेश में सर्वाधिक 111 स्थानों पर जंगल जले थे जबकि असम में 71, नागालैंड में 38 और मणिपुर में 31 घटनाएं दर्ज की गईं थीं। कुमाऊं मंडल में बीते चार माह में जंगल में आग लगने की 276 घटनाएं हो चुकी हैं। इससे 396 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गए और 2603 लोग प्रभावित हुए। गढ़वाल मंडल में गत चार माह में जंगल में आग लगने की 430 घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें 501 हेक्टेयर वन जला है। इस आग में 6350 पेड़ जले हैं। 4 जनवरी, 2021 को सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार से जंगल की आग रोकने के लेकर किए गए प्रबंधों की जानकारी मांगी है। 3 मार्च 2021 को भुवनेश्वर के आठगड़ डिवीजन खुण्टुड़ी रेंज कृष्णपुर जंगल में हुए अग्निकांड के बाद अब अनुगुल जिले के कुइओ जंगल में 20 एकड़ जंगल जलकर खाक हो गया। ओडिशा के कंधमाल, गंजाम, गजपति, मालकान गिरी एवं रायगड़ा जिले के जंगलों में अक्सर आग लगती रहती है। वैसे भी जंगलों में आग लगने की घटना के मामले में ओडिशा देश में पहले स्थान पर है। 22 फरवरी से 1 मार्च के बीच ओडिशा के विभिन्न जंगलों में 5291 अग्निकांड घटना हो चुकी है। ओडिशा के बाद दूसरे स्थान पर तेलंगाना है जहां पर एक सप्ताह में 1527 वनाग्नि की घटनाएं हुई हैं। मध्य प्रदेश तीसरे स्थान पर है जहां पर 1507 अग्निकांड सामने आयी है। चौथे स्थान पर आंध्र प्रदेश है जहां 1292 अग्निकांड की घटना सामने आयी है। ओडिशा में वर्ष 2017 से 2019 के बीच भी सर्वाधिक वनाग्नि की घटनाएं हुई थीं। ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित सिमलीपाल नेशनल पार्क भी इन दिनों आग की लपटों में घिरा हुआ है। सिमलीपाल जंगल 1060 वर्गमीटर में फैला देश का सबसे अहम नेशनल पार्क है। यह जगह मयूरभंज एलीफेंट रिजर्व का हिस्सा है। यह एक टाइगर रिजर्व भी है। ऐसे में यहां आग का लगना चिंता की बात है। 31 मार्च 2021 को मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के खितोली, मगधी और ताला जोन में आग लग गई थी जो अभीतक बुझाई नहीं जा सकी है। वर्ष 2012 में उत्तराखंड विधानसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया था कि इस साल छह जून तक वनाग्नि की 1,086 घटनाएं दर्ज की गई हैं जिनमें 2,542 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर खाक हो गया है। उत्तराखंड में वन क्षेत्र के 30 फीसदी हिस्से में आग बुझाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इन्हीं क्षेत्रों से आग शुरू होती है और बिना अंकुश के विकराल हो जाती है। वन विभाग के अनुसार पिछले दस साल में हर साल औसतन 3,000 हेक्टेयर वन जले हैं। वर्ष 2012 में रुद्रप्रयाग वन प्रभाग के अधिकांश वन क्षेत्र में आग लग गई थी। तब विभाग ने दावा किया था कि एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस वन प्रभाग के 14 हजार हेक्टेयर में अकेले चीड़ के जंगल हैं जो पूरे जल गए हैं। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में वनाग्नि की रोकथाम के लिए विभिन्न वन क्षेत्रों में 1460 किलोमीटर फायर लाइन का निर्माण किया गया है। 77 क्रू स्टेशन बनाए गए हैं, जिन्हें एक्टिव कर दिया है। विभिन्न क्षेत्रों में पांच वॉच टावर भी बनाए गए हैं। इस तरह की व्यवस्था काश, हर जगह हो पाती। जंगलों में आग का लगना आर्थिक दृष्टि और जैविक संतुलन व आर्थिकता के लिहाज से भी उचित नहीं है। आग लगने का कारण बहुधा मानव जन्य गलतियां होती हैं। इन पर अंकुश लगाए बिना जंगलों का भला नहीं होने जा रहा। जंगलों में आग लगने से वन्य जीव भी परेशान होते हैं और अंतत: वे मानव समाज के लिए ही घातक होते हैं। ऐसे में जरूरी है कि जंगल की आग को बुझाने के यथासंभव प्रयास किए जाएं। जंगल ही न रहे तो मानव का वजूद भी खतरे में पड़ जाएगा। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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