बैलगाड़ी में सवार बरातियों संग पालकी से ससुराल पहुंचा दूल्हा, लोगों की उमड़ी रही भीड़

बैलगाड़ी में सवार बरातियों संग पालकी से ससुराल पहुंचा दूल्हा, लोगों की उमड़ी रही भीड़
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देवरिया, 20 जून(हि.स.)। आधुनिक दौर में जहां दुल्हा पक्ष के लोग लग्जरी गाड़ियों से दुल्हन के दरवाजे पर बरात लेकर पहुंचते हैं, वहीं रविवार को देवरिया जिले के एक दुल्हा ने अपने को पालकी में सवार किया और बारातियों को बैलगाड़ी में बैठाकर दुल्हन के घर जा पहुंचा। इस दृश्य को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी रही। इस दौरान लोग अपने मोबाइल में सेल्फी लेते भी नजर आये। दूल्हा अपनी पुरानी परंपराओं को जीवित रखने और पर्यावरण को बचाने के लिए बैल गाड़ी से बरात लेकर दुल्हन के घर तक पहुंचा था। प्राचीन समय को लोग याद करते नजर आये और कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए यह कदम सबको उठाना होगा। यह बारात कारखाना ब्लॉक के कुशहरी गांव से निकली थी। कुशहरी के छोटेलाल पाल पुत्र स्व. जवाहिर पाल ने डोली और बैलगाड़ी को आकर्षक ढंग से सजाकर ब्याह रचाने निकल थे। बरात कुशहरी से 32 किलोमीटर दूर पकड़ी बाजार के निकट बरडिहा दल गांव में पहुंची, जहां रमानंद पाल की बेटी सरिता से शादी होगी। उल्लेखनीय है कि बचपन में अक्सर सुनने को मिलता है कि दादा और नाना की बरात बैलगाड़ी से गई थी, जिसमें उन्हें ससुराल पहुंचने में कई दिन का सफर तय करना पड़ा था। वर्तमान समय में अगर कोई यह कहे कि किसी की बरात बैलगाड़ी में जाएगी तो लोग यकीन नहीं करेंगे। कई वर्षों बाद पुरानी परंपरा से निकली बरात चर्चा का का विषय बनी रही। बरात जिस गांव और चौराहे से निकली वहां लोग बरात को देखने के लिए अपने-अपने घरों से बाहर निकल गए। फरुही नृत्य बना आकर्षण का केन्द्र इस बारात में फरुही नृत्य भी आकर्षक का केन्द्र रहा। हर चौराहे पर फरुही नृत्य के कलाकारों ने अपने नित्य को करते हुए आगे बढ़ते रहे। बैलों के गले में बंधी थी घंटी बैलगाड़ियों के खींच रहे सभी बैलों के गले में घंटी बंधी थी। जो एक आध्यात्मिक गूंज से मार्ग को गूंजयमान करती हुई शुभबेला की घड़ी का याद दिला रही थी। दूल्हा फिल्म इंडस्ट्री में करता है काम दुल्हा छोटेलाल ने बताया कि उनकी मां कोईली देवी का स्वर्गवास 1998 में हो गया। पिता का भी साया 2006 में छीन गया। वर्ष 1999 में हाईस्कूल की परीक्षा में फेल होने के बाद 2002 में मुंबई चला गया। फिल्म इंडस्ट्री में आर्ट का काम करते हैं। कहा कि प्रदूषण से जनजीवन पर पड़ रहे कुप्रभाव को लेकर लोग जागरूक हों इसलिए मैंने पुरानी परंपरा को जीवित करने की पहल की है। इससे प्रदूषण में कमी, ईंधन की बचत और खर्चीली शादियों पर लगाम लगेगा। इसके लिए भईया और ग्रामीणों के बीच यह प्रस्ताव रखा, तो सभी लोगों ने मेरा साथ दिया। लड़की वालों का भी पूरा सहयोग है। उन लोगों ने भी इस प्रयास को सराहा है। हिन्दुस्थान समाचार/ज्योति

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