मुकुल राय के भाजपा से अलग होने की अटकलें तेज, भाजपा विधायक दल की बैठक में नहीं हुए शामिल

मुकुल राय के भाजपा से अलग होने की अटकलें तेज, भाजपा विधायक दल की बैठक में नहीं हुए शामिल
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कोलकाता, 07 मई (हि.स.)। विधानसभा चुनाव से पूर्व तक ममता बनर्जी के बेहद खास रहे मुकुल राय एक बार पाला बदल सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय के एक बार फिर ममता का दामन थाम लेने की अटकलें तेज हो गई हैं। शुक्रवार को राज्य विधानसभा में नवनिर्वाचित विधायक के तौर पर शपथ लेने के बाद मुकुल राय ने भी इस बात के संकेत दिए हैं। शपथ ग्रहण के दौरान विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बंगाल प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी के साथ उनका शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में मुकुल राय शामिल नहीं हुए और चुपचाप विधानसभा परिसर से निकल गए। कुछ मीडिया कर्मियों ने उन्हें घेर कर इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने केवल इतना कहा कि जो भी बोलना है, प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बोलूंगा। बंगाल विधानसभा परिसर में भाजपा के विधायकों की बैठक में उनका शामिल न होना और अपनी बात को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके रखने वाला उनका जवाब, इस बात का संकेत है कि भाजपा के साथ उनका सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। खास बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल छोड़ने वाले पार्टी के नेताओं की खूब आलोचना की थी लेकिन मुकुल की सराहना की थी। एक बार प्रचार में उन्होंने यह भी कहा था कि मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी से अच्छे हैं, क्योंकि उन्होंने मुश्किल वक्त में धोखा नहीं दिया। अब जबकि खुद मुकुल भाजपा से दूरी बनाने लगे हैं और तृणमूल के राज्य अध्यक्ष सुब्रत बख्शी के साथ खुशी-खुशी शुभकामनाओं का आदान प्रदान करना, उनका एक बार फिर ममता बनर्जी की पार्टी के दामन थामने के कयास लगाए जा रहे हैं। कमाल के रणनीतिकार हैं मुकुल मुकुल रॉय कमाल के राजनीतिक रणनीतिकार माने जाते हैं। दो दशक तक ममता के खास रहे हैं और पार्टी में बनर्जी के बाद अगर किसी नेता का कद सबसे बड़ा था तो वह मुकुल रॉय थे। 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी, जिसके बाद 2018 के पंचायत चुनाव में उन्होंने राज्यभर में भाजपा के लिए प्रचार किया था, जिसका लाभ पार्टी को मिला भी था। 2019 का लोकसभा चुनाव उन्हीं के कंधे पर मुख्य जिम्मेदारी देकर लड़ा गया था,जिसमें भाजपा को 42 में से 18 सीटें जीतने में मदद मिली थीं। इसके बाद ही पार्टी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई थी। अब जबकि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की करारी शिकस्त हुई है और ममता बनर्जी ने प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज की है तो एक बार फिर राजनीतिज्ञों के पाला बदल की अटकलें तेज हैं। खास बात यह है कि भाजपा ने 77 सीटों पर जीत दर्ज की है और जीतने वालों में मुकुल रॉय तथा शुभेंदु अधिकारी जैसे दो बड़े नेता भी हैं। प्रदेश भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को ही नेता प्रतिपक्ष बनाने के संकेत दिए हैं, जो मुकुल रॉय के लिए शायद स्वीकार्य नहीं हो पा रहा है। क्योंकि वह कद और राजनीति दोनों में शुभेंदु से ऊंचे हैं। तृणमूल कांग्रेस का साथ भी मुकुल ने इसी लिए छोड़ा था क्योंकि ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तुलना में अधिक अहमियत देने लगी थीं। हालांकि शुभेंदु ने ममता बनर्जी को हराया है। इसीलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेता प्रतिपक्ष के पद पर उनका दावा मजबूत है। लेकिन वरिष्ठता के हिसाब से मुकुल रॉय भी खुद को इस पद के योग्य समझ रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि शनिवार को पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों के नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के फैसले पर ही मुकुल का फैसला भी निर्भर हो सकता है। हिन्दुस्थान समाचार / ओम प्रकाश