बेहतर बुनियादी ढांचा और छात्र-शिक्षक अनुपात के साथ दिल्ली के स्कूलों से कहीं आगे हैं एनसीआर के स्कूल
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बेहतर बुनियादी ढांचा और छात्र-शिक्षक अनुपात के साथ दिल्ली के स्कूलों से कहीं आगे हैं एनसीआर के स्कूल

नई दिल्ली, 8 नवंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में कई नए जमाने के स्कूलों ने एक परिवर्तनकारी शिक्षा प्रणाली को शामिल किया है, जो शायद दिल्ली में स्थित स्कूलों की तुलना में इन स्कूलों में दाखिले की संख्या में हालिया वृद्धि का कारण है। माता-पिता, शिक्षक और उद्योग विशेषज्ञ हाल ही में बच्चों की दिल्ली के स्कूलों से एनसीआर के स्कूलों में शिफ्टिंग को देख रहे हैं। यानी ऐसे कई मामले देखे गए हैं, जब परिजन अपने बच्चों को दिल्ली के स्कूलों से निकालकर एनसीआर के स्कूलों में दाखिला दिला रहे हैं। ऐसे कई कारण हैं, जिससे यह बदलाव देखने को मिल रहा है और इनमें उन्नत पाठ्यक्रम, बच्चों के अनुकूल सीखने का माहौल, छात्र-शिक्षक अनुपात, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा प्रमुख कारण प्रतीत होते हैं। इसके साथ ही मुख्य कारणों में समग्र विकास और विभिन्न सह-पाठ्यचर्या संबंधी गतिविधियों आदि पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल है। समय की मांग यह है कि वर्तमान शैक्षणिक संस्थान 21वीं सदी की कौशल आवश्यकताओं के अनुरूप प्रगतिशील शैक्षणिक प्रथाओं के साथ एक लचीले और उन्नत पाठ्यक्रम का पालन करें। इसी तरह के विचार का समर्थन करते हुए द हेरिटेज ग्रुप ऑफ स्कूल्स के डायरेक्टर और एक्सपीरिएंशियल लनिर्ंग सिस्टम्स के सीईओ विष्णु कार्तिक ने कहा, गुरुग्राम के प्रगतिशील स्कूल, जिन्होंने सिर्फ 15-16 साल पहले अपनी यात्रा शुरू की थी, उन्होंने 21वीं सदी के कार्यस्थल की अपेक्षाओं के साथ उनके संरेखण के लिए पारंपरिक स्कूलों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रथाओं और शिक्षाशास्त्र का मूल्यांकन किया। वहीं दूसरी ओर, पारंपरिक स्कूल परिवर्तन को अपनाने में धीमे रहे हैं। इसके अलावा, छात्र-शिक्षक अनुपात की चिंता माता-पिता के स्कूल चयन मानदंड पर काफी हद तक हावी है, क्योंकि बेहतर छात्र-शिक्षक अनुपात व्यक्तिगत ध्यान और व्यक्तिगत सीखने को सक्षम बनाता है। यह एक अनुकूल सीखने का माहौल भी प्रदान करता है, क्योंकि अगर छात्रों के एक सही अनुपात में शिक्षक होंगे तो एक शिक्षक सभी बच्चों पर विशेष ध्यान दे सकता है और प्रत्येक बच्चे की ताकत और कमजोरियों के बारे में जानने की अत्यधिक संभावना है। अगर कक्षा में 16 से 20 छात्र ही हों तो इसकी संभावना जाहिर तौर पर काफी बढ़ जाती है। एक अभिभावक, जिनका बच्चा पाथवे वल्र्ड स्कूल, अरावली में ग्रेड-3 में पढ़ता है, ने कहा, 30-40 बच्चों वाली कक्षा ऐसी स्थिति होती है, जिसे कोई भी माता-पिता नहीं चाहेगा। कोविड के कारण कक्षाएं ऑनलाइन होने के साथ, 16 बच्चों वाली एक कक्षा का प्रबंधन 30-40 बच्चों वाली कक्षा की तुलना में बहुत बेहतर है। अभिभावक ने यह भी कहा कि जब किसी कक्षा में बच्चे अधिक होते हैं तो खासकर ऑनलाइन क्लास में ज्यादा परेशानी देखने को मिलती है, क्योंकि अगर बच्चे अधिक होंगे तो एक शिक्षक तो केवल बच्चों पर नजर रखने के लिए जूम प्लेटफॉर्म पर बाएं से दाएं स्लाइड करने में ही व्यस्त रहेगा और इससे पढ़ाई में बाधा आएगी। एक अन्य अभिभावक, अमृता सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे के लिए खेतान पब्लिक स्कूल, गाजियाबाद का विकल्प चुना, क्योंकि दिल्ली में छात्र-शिक्षक अनुपात खराब है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, दिल्ली में प्राथमिक विद्यालय स्तर में 32.7, उच्च प्राथमिक (कक्षा छठी से आठवीं) में 29.3, माध्यमिक (कक्षा नौवीं से दसवीं) में 27.6 और उच्चतर माध्यमिक (11वीं से 12वीं) में 17.9 के साथ दूसरा सबसे खराब छात्र-शिक्षक अनुपात है। अमृता ने कहा, हर माता-पिता एक पीसफुल माइंड (बच्चों को लेकर कोई चिंता न हो) के हकदार हैं, यह जानते हुए कि उनके बच्चे को बहुत जरूरी ध्यान मिल रहा है और वह नई जानकारी हासिल कर रहा है। उन्होंने स्कूल के चयन को लेकर उनकी ओर से दी जाने वाली अन्य सुविधाओं पर भी ध्यान दिया, जिससे उन्होंने दूरी को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा, माता-पिता के लिए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उनका बच्चा नए आयामों की खोज करे, जो उनकी समझने और सीखने की मानसिक क्षमता को बढ़ाता है। जो स्कूल छात्रों को असाधारण सुविधाएं प्रदान करने के लिए इतना प्रयास कर रहे हैं, तो फिर माता-पिता को दूसरे से कोई फर्क नहीं पड़ता। अमृता सिंह की तरह ही हिमानी डालमिया और आकाश प्रेमसेन, जिनकी बेटी हेरिटेज इंटरनेशनल एक्सपेरिएंशियल स्कूल में ग्रेड-1 में पढ़ रही है, स्कूल की शैक्षणिक और बुनियादी सुविधाओं को दूरी की अपेक्षा अधिक महत्व देते हैं। दंपति ने कहा, हम एक ऐसी जगह चाहते थे, जो कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में हमारी बेटी के प्रीस्कूल, ड्रीमिंग चाइल्ड के रूप में बेहतर और प्रगतिशील हो। ड्रीमिंग चाइल्ड एक बाल-सुलभ ²ष्टिकोण का पालन करता है, दुनिया भर में सर्वोत्तम शैक्षणिक विधियों को एक खूबसूरती से डिजाइन किए गए स्थान के साथ मिश्रित करता है और इसे शिक्षा के लिए एक स्वर्ण मानक कहा जा सकता है! इसमें कक्षा का आकार छोटा रहता है, उम्र के आधार पर 6:1 या 8:1 के साथ शिक्षक और बच्चे का अनुपात निर्धारित रहता है। दिल्ली का कोई भी स्कूल इस तरह के के उपयुक्त अनुपात में फिट बैठता हुआ दिखाई नहीं देता है। दूसरी ओर, हेरिटेज इंटरनेशनल स्वाभाविक उत्तराधिकारी की तरह लग रहा था। अपने आईबी पाठ्यक्रम, ओपन-प्लान, विश्व स्तरीय परिसर, आकार के लिहाज से छोटी कक्षाएं, अद्वितीय शिक्षक-बाल अनुपात, मजबूत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम और माता-पिता के साथ एक ओपन-डोर नीति के साथ, यह हमारे लिए स्वाभाविक पसंद की तरह लग रहा था। दपंति ने यह भी बताया कि शुरूआत में वह अपने घर के करीब ही एक स्कूल को प्राथमिकता दे रहे थे, लेकिन जब उन्होंने लागत-लाभ विश्लेषण किया, तो शिक्षा की गुणवत्ता ने को देखते हुए उन्होंने दूरी को नजरअंदाज किया और बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए हेरिटेज को चुना। खेतान पब्लिक स्कूल, गाजियाबाद में अभिभावकों से संबंधित मामलों की प्रमुख प्रीति गुप्ता ने माता-पिता की चिंता और दूरी को लेकर झिझक पर बात करते हुए कहा, हम दूरी और यात्रा-समय की चिंता को समझते हैं, जो स्कूलों में आने में लगता है। हमने देखा है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए सही विकल्प खोजने के लिए बहुत प्रयास करते हैं। ज्यादातर मामलों में, अच्छी तरह हवादार कक्षाओं, स्वच्छ परिवेश, विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे और प्रीमियम शैक्षणिक पेशकशों जैसे बड़े लाभों को देखते हुए दूरी को दरकिनार कर दिया जाता है। कम शब्दों में एक ही बात कहूं तो यह कहना आसान है कि एनसीआर स्कूल अगली पीढ़ी के स्कूलों के रूप में उभर रहे हैं, जहां माता-पिता के प्रश्नों या चिंताओं पर अच्छी तरह से ध्यान दिया जाता है। अपने स्वयं के संस्थान के लिए, हम इसी चीज का पालन करते हैं, क्योंकि हम सभी का एक समान लक्ष्य है - हमारे बच्चों को अधिक और बड़ा फायदा हो। बदलते समय के साथ, माता-पिता ऐसे स्कूलों की तलाश में हैं, जो उनके बच्चे को उचित रूप से जीवन के पाठ (लाइफ लेसन), सामुदायिक जीवन और सीखने में जिम्मेदारी की भावना को एकीकृत करने के लिए प्रोत्साहित करें। मोनिका गंजू, जिनकी किशोर बेटी सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल में पढ़ रही है, अपने चयन मापदंडों के बारे में स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा, एक छात्र काफी आरामदायक माहौल में सीखने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में सक्षम है। मेरे मामले में, स्कूल के अकादमिक रिकॉर्ड के अलावा, इसके खेल बुनियादी ढांचे, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, अच्छी तरह से सुसज्जित पुस्तकालय और एक सुखद माहौल ने सकारात्मक सु²ढीकरण के रूप में कार्य किया। बुनियादी ढांचे के अलावा, पर्याप्त जगह या स्पेस भी दिल्ली और एनसीआर के स्कूलों के बीच एक और विभेदक कारक है, जिस पर पाथवेज वल्र्ड स्कूल, अरावली की निदेशक सुश्री सोनिया गांधी मेहता ने बात की। उन्होंने कहा, चूंकि एनसीआर स्कूलों के लिए जगह की कोई बाधा नहीं है, इसलिए वे बड़ी संख्या में छात्रों को प्रवेश देने के लिए अधिक खुले (ओपन) हैं। बड़े स्थानों का मतलब इनडोर और आउटडोर, सह-पाठ्यचर्या संबंधी गतिविधियों के लिए अधिक अवसर हैं। बड़े जगह प्रकृति के करीब रहते हुए रचनात्मक कौशल को बढ़ाने के लिए भी द्वार खोलती हैं। आखिर स्वस्थ मन ही स्वस्थ शरीर का पोषण करता है। एनसीआर में स्कूल छात्र-शिक्षक अनुपात के बारे में अधिक विशेष रूप से सुनिश्चित करते हैं और व्यक्तिगत तौर पर ध्यान दिया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप छात्र के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में एक यादगार सीखने का अनुभव होता है, जो कि उसका स्कूल ही है। सेठ आनंदराम जयपुरिया ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में स्कूल्स की निदेशक मंजू राणा ने एनसीआर में स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता को दिल्ली के स्कूलों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति और उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता सहित कुछ कारकों के बारे में बात की। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि दिल्ली में ज्यादातर स्कूल घुटन भरे हैं। इसके अलावा, उनकी शिक्षा में नए जमाने की कार्यप्रणाली को लागू करने के लिए आवश्यक नवीन उपायों का अभाव है। उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक कारणों से भी कई प्रमुख शैक्षिक समूह दिल्ली में स्कूलों के संचालन से सावधान हो गए हैं। उन्होंने कहा, स्कूलों की आत्मनिर्भरता और एनसीआर के स्कूलों में सरकार द्वारा कम हस्तक्षेप कुछ ऐसे कारण हैं, जो बेहतर स्कूल अनुभव, निदेर्शात्मक कार्यप्रणाली, बुनियादी ढांचे, जनसांख्यिकी, 21वीं सदी के कौशल-केंद्रित पाठ्यक्रम, आधुनिक पहल आदि की ओर ले जाते हैं। इससे स्पष्ट रूप से एनसीआर के स्कूलों को लेकर नामांकन या दाखिले बढ़ने के रास्ते खुल गए हैं। --आईएएनएस एकेके/एएनएम

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