ऋचा दुबे की 'मन की बात' से उठे सवाल, साक्षात्कार या विज्ञापन
ऋचा दुबे की 'मन की बात' से उठे सवाल, साक्षात्कार या विज्ञापन
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ऋचा दुबे की 'मन की बात' से उठे सवाल, साक्षात्कार या विज्ञापन

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गाजीपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद बहुचर्चित पुलिस हत्याकांड के बाद चर्चा में आए विकास दुबे मुठभेड़ में मौत हो गई। घटना के लगभग एक पखवाड़े बाद मुठभेड़ में मृत अपराधी विकास दुबे की पत्नी ऋचा दुबे का विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर साक्षात्कार दिखाया गया। जिसमें ऋचा दुबे ने बेबाकी के साथ अपने मन की पूरी बात रखी। लेकिन जिस तरह से टेलीविजन चैनलों द्वारा इस सम्बोधन को साक्षात्कार का नाम दिया जाना शुरू किया गया जिससे लोगों के मन में यह विचार सहज ही खड़ा हो गया कि यह उक्त महिला का साक्षात्कार था या विज्ञापन! जिस प्रकार से ऋचा दुबे ने केवल अपने मन की बात कही व साक्षात्कारकर्ता द्वारा श्रोता की भूमिका में करबद्ध होकर बातें सुनी गई। इससे तो यह कहना भी गलत नहीं होगा ऋचा दुबे ने प्रवचन सुनाएं। जिसमें उन्होंने भारतीय नारी, भारतीय संस्कृति, सभ्यता व पुलिस के जवानों की स्थिति पर दया व्यक्त करते हुए लॉकडाउन के 3 महीने तक लंगर का चलाना इत्यादि की बात कर अपने धार्मिक व संस्कार होने का पूरा प्रमाण दे डाला। इस बातचीत को साक्षात्कार या विज्ञापन कहने के पीछे बड़ा तर्क यह भी है कि जिस बातचीत के दौरान टेलीविजन के स्क्रीन पर ब्रेकिंग लाइन के रूप में ऋचा दुबे के यह शब्द सुनाए गए कि मुझे विकास की मौत से कोई शिकायत नहीं बल्कि प्रसन्नता है। ऐसे व्यक्ति को मैं खुद गोली मार देती। उससे यह सवाल पूछना भी लाजमी नहीं हुआ कि जब उसने श्मशान स्थल पर चिल्ला चिल्ला कर मीडिया को लक्ष्य कर कहाकि तुम सबों ने मेरे पति को मरवा दिया, मैं 1-1 से बदला लूंगी और चुन-चुन के बदला लूंगी। शादी के 3 वर्ष बाद ऋचा गांव छोड़कर शहर आ गई। पति विकास दुबे द्वारा महज उसके व उसके बच्चों का खर्चा ही प्राप्त होता रहा। फिर भी ऋचा ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान 3 महीने तक दर्जनों पुलिस वालों को उनके घर से लंगर खिलाया गया। जिसमें ऋचा की बड़ी भूमिका रही, उसने पति को ऐसे दयालुता पूर्वक कार्य करने का सुझाव दिया। पति के कार्यों में कोई संबंध न रखने के बावत इस बातचीत में "डिप्ली" शब्द का दर्जनों बार प्रयोग किया गया, जिसमें ऋचा ने यह साबित करने की कोशिश की विकास के कार्यों में गहराई से उसका कोई संबंध नहीं रहा। लेकिन विकास ने करोड़ों की संपत्ति अर्जित के सवाल पर क्लीन चिट देते वक्त एक सेकंड की देरी नहीं लगाई गई। इतना ही नहीं ऋचा ने खुद सवाल खड़ा किया कि क्या विकास द्वारा अकूत संपत्ति जुटाई गई होती तो इतने से छोटे से मकान में रहती। हालांकि उसे केवल गुजारा भत्ता ही प्राप्त होता रहा लेकिन उसका कहना जायज है कि उसे भी आलीशान महल और विदेशों में रहने को मिला होता है भले ही वह गुजारा भत्ता के ही रूप में हो। विकास अपराधी नहीं था, गुस्से वाला था। इसके लिए "एंग्जाइटी" एक कारण रहा, जिसमें पुलिस वालों की हत्या हो गई और कोई अपराधी पैदा ही नहीं होता, उसी तरह विकास को भी क्षेत्र के लोगों ने और उसके स्थानीय लोगों ने अपराधी बनाया। विकास के कार्यों के दौरान पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों या राजनेताओं द्वारा उसकी मदद के बाबत सवाल आते ही कैमरे के पीछे से आई आवाज कि "उसे इस संबंध में कुछ नहीं पता" जिसे ऋचा दुबे ने दोहराया और इसके साथ ही वही लाइन बोली कि विकास का किस्मत बहुत अच्छा था। अब ऐसे अच्छे किस्मत वाले पति विकास को ऋचा को मिले तो जाहिर सी बात है उसे इस तरह के मन की बात रखने की खुली आजादी वाले भी मिल ही जाएंगे। क्योंकि जिसके पति की किस्मत अच्छी उसके पत्नी की किस्मत भी बुरी नहीं हो सकती। कुल मिलाकर 23 मिनट के इस बातचीत में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया कि मन की बात या प्रवचन को साक्षात्कार कह कर टेलीविजन के पर्दे पर चलाना कितना उचित कितना अनुचित? यह सवाल अकेले लेखक के ही मन में नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उठ रहे घमासान में भी खुलेआम रूप से देखा जा सकता है। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीराम/राजेश-hindusthansamachar.in