अयोध्या से 14 किमी दूर नंदीग्राम, यहीं से भरत ने 14 वर्ष तक किया था राज
अयोध्या से 14 किमी दूर नंदीग्राम, यहीं से भरत ने 14 वर्ष तक किया था राज
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अयोध्या से 14 किमी दूर नंदीग्राम, यहीं से भरत ने 14 वर्ष तक किया था राज

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-भगवान राम ने नंदीग्राम में ही पिता राजा दशरथ का किया था पिंडदान -भरत की इस तपोभूमि को भूल गई जनता, सरकारें भी कर रहीं उपेक्षा पीएन द्विवेदी अयोध्या, 31 जुलाई (हि.स.)। राम जन्मभूमि से करीब 14 किमी दूर नंदीग्राम है। भगवान राम के वन जाने के बाद उनके भाई भरत ने यहां तपस्या की और सिंहासन पर राम की खड़ाऊ रखकर यहीं से 14 वर्ष तक अयोध्या का राजपाट चलाया था। लेकिन, वर्तमान में भरत की इस तपोभूमि को लोग भूल सा गये हैं। सरकार की तरफ से भी इस पवित्र स्थल की उपेक्षा हो रही है। प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद रामनगरी अयोध्या में विकास कार्य जहां बड़ी तेजी से प्रारम्भ हुआ, वहीं नंदीग्राम आज भी किसी सरकारी योजना से अछूता दिख रहा है। यहां किसी तरह का विशेष विकास नहीं हुआ है। नंदीग्राम तक पहुंचने के लिए सर्विस लेन भी बुरी तरह से टूटी हुई है। नंदीग्राम मंदिर के महंत हनुमान दास का कहना है कि यह पवित्र स्थली जनता और सरकार दोनों की उपेक्षा का शिकार है। उन्होंने बताया कि नंदीग्राम स्थित भरत सरोवर में लोग यदा कदा इकट्ठा जरुर होते हैं लेकिन, सरकारी एजेंसियों का ध्यान यहां अभी तक नहीं गया है। नंदीग्राम अयोध्या-प्रयागराज हाईवे पर स्थित है। उन्होंने बताया कि वनवास से लौटने के बाद भगवान राम ने यहीं पर अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था। इसलिए लोग आज भी यहां पिंडदान के लिए आते रहते हैं। महंत हनुमान दास ने कहा कि नंदीग्राम आये बगैर किसी भी श्रद्धालु का अयोध्या का दर्शन पूर्ण नहीं माना जाता है। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई है कि अब जब राम मंदिर के निर्माण हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूमि पूजन करने आ रहे हैं, ऐसे समय में नंदीग्राम के भी अच्छे दिन आ सकते हैं। उन्होंने बताया कि नंदीग्राम वही स्थान है, जहां पर भरत ने 14 वर्ष तक कठिन तपस्या की। अपने बड़े भाई राम की खड़ाऊँ को गद्दी पर रखकर स्वयं नंदीग्राम में भूमि पर 14 वर्ष तपस्या की और यहीं से अयोध्या का शासन चलाते थे। महंत ने बताया कि नंदीग्राम कई प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं का भी साक्षी रहा है। राम-रावण युद्ध के दौरान लक्ष्मण को जब शक्तिबाण लगी थी तो हनुमान जी संजीवनी वूटी के लिए पर्वत लेकर इसी मार्ग से लंका की ओर जा रहे थे। विशालकाय हनुमानजी को देख राजाभरत भयभीत होकर हनुमान जी पर बाण चला दिए और हनुमान जी राम राम का नाम लेते हुए जमीन पर गिरते हैं। यह सुनकर भरत व्याकुल हो जाते हैं कि कौन है जो भइया का नाम ले रहा है। हनुमान जी जब होश में आए और उन्होंने अपना परिचय दिया तो भरत को बहुत प्रायश्चित हुआ। हनुमानजी से मिलकर भरत को बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने दूसरा प्रसंग बताते हुए कहा कि भगवान राम रावण का वध करके सबसे पहले पुष्पक विमान से अपने सहयोगियों के साथ नंदीग्राम ही उतरे थे। यहीं पर परिवार के अन्य सदस्यों के साथ 14 वर्ष बाद राम और भरत का मिलन हुआ था। यह हृदय विदारक मिलन सभी को भावुक कर देता है। इसके साथ भगवान राम यहीं पर नंदीग्राम में ही अपने स्वर्गीय पिता राजा दशरथ का पिंडदान भी किये। महंत ने बताया कि नंदीग्राम में दो ऐसे वट वृक्ष हैं जो राम-भरत और हनुमान-भरत के मिलाप को दर्शाते हैं। यह वट वृक्ष बड़ा ही अद्भुत है। एक ही तने में पाकर और बरगद दोनों ऐसे मिले हैं मानो एक हों। इसके साथ ही नंदीग्राम में भरतकूप है। वैसे तो प्राचीन भरतकूप चित्रकूट में है परंतु राजा भरत जब चित्रकूट से लौटे थे नंदीग्राम के लिए उन्होंने वहां से 27 पवित्र नदियों का जल लाकर यहां पर रखे थे। इसी को आज भरतकूप कहा जा रहा है। हिन्दुस्थान समाचार-hindusthansamachar.in