कोरोना को कुर्सी तक पहुंचने का अवसर बनाना

कोरोना को कुर्सी तक पहुंचने का अवसर बनाना
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प्रो. एस.के.सिंह पिछले डेढ़ साल से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया कोरोना महामारी से उत्पन्न कठिन परिस्थितियों का सामना कर रही है। पिछले साल 30 जनवरी को भारत में कोरोना का पहला मामला सामने आया था, उसके लगभग दो हफ्ते पहले ही 17 जनवरी को भारत सरकार ने पहली एडवाइजरी जारी कर दी थी। भारत दुनिया के उन पहले देशों में से है, जिसने कोरोना के देश में प्रवेश करने के पूर्व ही अपने एयरपोर्टस पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी, तभी से सरकार लगातार न केवल कोरोना की रोकथाम से संबंधित दिशा-निर्देश जारी कर रही है, बल्कि सही तरीके से महामारी का सामना करने के लिए जनता को जागरूक करने की हरसंभव कोशिश भी कर रही है। वैसे तो पूरी दुनिया ही इस अभूतपूर्व आपदा से जूझ रही है, लेकिन भारत सरकार को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है, पहला कोरोना और दूसरा विपक्ष। कोरोना महामारी में विपक्ष की भूमिका ने बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों की यादें ताजा कर दी हैं, जिनमें घायल नायक को खलनायक ठीक उसी जगह मारता था, जहां हीरो जख्मी होता है। भारत में जब-जब कोरोना महामारी का जिक्र होगा, तब-तब विपक्ष की गैर-जिम्मेदाराना एवं नकारात्मक भूमिका को भी याद किया जायेगा। वस्तुत: भारत के अलावा दुनिया में शायद ही कोई दूसरा उदाहरण मिलेगा, जहां इस महामारी के दौरान विपक्ष द्वारा वैक्सीनेशन के संबंध में अफवाहें फैलाकर जनता को भ्रमित कर उनकी जान से खेलने का कुत्सित प्रयास किया गया हो। विपक्ष को सरकार के साथ मिलकर कोरोना महामारी से लड़ना चाहिए था, लेकिन विपक्ष ने इस महामारी के दौरान सरकार को और अनकों बार अपने देश को भी इस बहाने नीचा दिखाने का प्रयास किया है । कहना होगा कि विपक्ष ने नकारात्मक आलोचना करने का कोई भी अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। इस महामारी में अपने राजनीतिक फायदे के लिए विपक्ष हमेशा 'आपदा में अवसर' ढूंढता हुआ ही नजर आया। यहां देखा यह भी गया कि कैसे विपक्ष ने जनता की मदद करने के बजाय पूर्वाग्रह से ग्रसित चन्द विदेशी मीडिया का हवाला देकर सरकार की आलोचना करना अधिक महत्वपूर्ण समझा। कुछ समय पहले जब यही विदेशी मीडिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुणगान कर रहा था, तब विपक्ष द्वारा इसी विदेशी मीडिया को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास भी किया गया था। शायद ही ऐसा कोई मौका हो जब विदेशी मीडिया में भारत के प्रधानमंत्री की तारीफ होने पर विपक्ष द्वारा सार्वजनिक रूप से उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दी गई हों। इससे कोई मना नहीं करता कि जो सही नहीं उसकी ओर ध्यान ना दिलाया जाए। आलोचना तो होनी चाहिए, लेकिन सिर्फ सरकार की आलोचना विपक्ष की मंशा पर सन्देह उत्पन्न करती है, क्योंकि सरकार के साथ-साथ कुछ जबावदेही तो विपक्ष एवं जनता की भी है। किसी भी विपक्षी राजनेता ने यह अपील नहीं की कि कोरोना महामारी के कारण किसानों को अपना आन्दोलन समाप्त अथवा स्थगित कर देना चाहिए। विपक्ष ने कोरोना महामारी को लेकर जनता को उनकी जबावदेही के लिये कभी आगाह नहीं किया, बल्कि कई जगह विपक्षी राजनेताओं ने जनता को भड़काने एवं उकसाने का कार्य जरूर किया। कोरोना से लड़ाई में सरकार की कमियों के साथ-साथ विपक्ष की नकारात्मकता एवं जनता की लापरवाही पर भी चर्चा होनी चाहिए। कोरोना महामारी का सहारा लेकर विपक्ष को कुर्सी तक पहुंचाने की कोशिश में मीडिया का एक तबका भी जी-जान से लगा हुआ है। कई न्यूज चैनल के एंकर तो सरकार की आलोचना में इतने उतावले नजर आ रहे हैं जैसे इन्होंने किसी से प्रधानमंत्री की आलोचना करने की सुपारी ले ली हो। पिछले साल भारत द्वारा 150 से अधिक देशों को दवाईयां एवं अन्य सामग्री भेजी गई। 70 देशों में भारत की बनी वैक्सीन पहुंचाई गई। 2014 से पहले जहां देश में लगभग 55 हजार एम.बी.बी.एस. सीटें थीं वहीं पिछले सात साल में इसमें 30 हजार से ज्यादा की वृद्वि की जा चुकी है। इसी तरह पी.जी. की सीटें भी जो 30 हजार हुआ करती थीं, उनमें 24 हजार से ज्यादा नई सीटें जोड़ी जा चुकी हैं । 2014 में छह एम्स थे जबकि पिछले सात सालों में 15 एम्स स्वीकृत हुए हैं। लेकिन इन्हें नरेन्द्र मोदी सरकार के सात साल के कार्यकाल में एक भी अच्छा कार्य नजर नहीं आ रहा है। वस्तुत: यहां बताने को बहुत कुछ है । लेकिन ये हमेशा इसी को लेकर चिन्तित रहते हैं कि प्रधानमंत्री ने जो बोला वह क्यों बोला एवं जो नहीं बोला वह क्यों नहीं बोला! गोदी मीडिया, व्हाटसएप यूनिवर्सिटी, हिन्दू-मुस्लिम जैसे विवादास्पद शब्दों के बिना इनका कार्यक्रम पूरा नहीं होता। एक चैनल के पत्रकार तो इन दिनों इतने उतावले नजर आ रहे हैं कि ये महाशय जिन-जिन की ओर गोदी मीडिया होने का इशारा करते हैं, उन सभी जगहों पर सरकार की आलोचना देखने, सुनने और पढ़ने को मिल जायेगी, लेकिन इनके कार्यक्रम में आपको सिर्फ सरकार की आलोचना ही मिलेगी। एक नोबेल पुरस्कार विजेता एवं विपक्ष की तरह यह भी सरकार की आलोचना करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। नोबेल पुरस्कार मिलना इस बात की कतई गारन्टी नहीं हो सकता कि आप हमेशा सही ही होंगे और तब तो बिल्कुल भी नहीं जब आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हों। एंकर महोदय की स्थिति तो उस रैफरी की तरह नजर आती है जिसने मैच शुरू होने के पहले ही यह घोषणा कर दी हो कि मैं तो फलां टीम के पक्ष में रहूंगा। यदि ऐसा न होता तो इनके सैकड़ों कार्यक्रमों में से कुछ कार्यक्रमों में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार के कुछ अच्छे कामों की तारीफ जरूर देखने को मिलती। इनके कार्यक्रम एवं बहुत पहले दूरदर्शन पर आने वाले ‘चित्रहार’ में अब सिर्फ इतना ही अंतर नजर आता है कि 'चित्रहार' का सिर्फ समय पता रहता था यह मालूम नहीं रहता था कि कौन से गाने देखने को मिलेंगे। लेकिन इनके कार्यक्रम के बारे में समय के साथ-साथ कम से कम इतना अंदाजा तो रहता ही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार की आलोचना के बिना इनका कार्यक्रम पूरा नहीं होगा। इन्हें अपने कार्यक्रम का नाम 'ए.एन.एम.एस.के.' रख लेना चाहिए अर्थात ‘आलोचना नरेन्द्र मोदी सरकार की’। यदि यह नाम पसंद न आये तो 'ए.एन.एम.के.' पर भी विचार किया जा सकता है अर्थात् 'आलोचना नरेन्द्र मोदी की'। वस्तुत: यहां यही कहना होगा कि सिर्फ प्रतिभाशाली होना ही काफी नहीं है जरूरी है प्रतिभा का उपयोग सही दिशा में हो। निष्पक्षता मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता है तथा पक्षपात मीडिया पर सबसे बड़ा आरोप है। बहुत ही दुखद एवं दुर्भाग्यपूर्ण है मीडिया से जुड़े लोगों का किसी एक तरफ हो जाना। वास्तव में यही असली गोदी मीडिया है। जीरो को हीरो बनाने की कोशिश में कोई बुराई नहीं है, लेकिन पूर्वाग्रह के कारण हीरो को जीरो बताने की कोशिश निश्चित तौर पर एक नकारात्मक प्रयास है। किसी दूसरे क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाला चिकित्सक कितना ही योग्य क्यों न हो, वह सर्जरी नहीं कर सकता, सर्जरी सिर्फ सर्जन ही कर सकता है। देश में आज कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां अभी बहुत सर्जरी एवं सर्जीकल स्ट्राइक होनी है, इसलिये सत्ता तक पहुंचने के लिए विपक्ष द्वारा कोरोना महामारी को ढाल के रूप में उपयोग करना किसी भी रूप में देशहित में प्रतीत नहीं होता है और यह बात अब जनता भी अच्छी तरह समझ चुकी है कि कोरोना महामारी को लेकर विपक्ष की पैंतरेबाजी सिर्फ एक नौटंकी एवं कुर्सी तक पहुंचने की कवायद मात्र है। यहां यदि जो सत्ता में है यदि वे भी विपक्ष में रहकर इसी प्रकार का आचरण करते दिखाई देते तो यह सभी बातें उन पर भी लागू होतीं। लेकिन फिलहाल ये सभी बातें मोदी सरकार को बेवजह घेराव कर रहे विपक्ष की कमियों की ओर ही इशारा कर रहे हैं । (लेखक जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में वाणिज्य संकायाध्यक्ष हैं।)

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