जितिन प्रसाद का कांग्रेस की राजनीति को झटका

जितिन प्रसाद का कांग्रेस की राजनीति को झटका
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सियाराम पांडेय 'शांत' पूर्व केंद्रीय मंत्री और युवा कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए। जाहिर है कि इससे कांग्रेस को झटका लगा है लेकिन कांग्रेस इस बात से इनकार कर रही है कि इससे कोई नुकसान होगा। जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का ब्राह्मण चेहरा थे। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के नजदीकियों में उनकी गणना होती रही है। राहुल-प्रियंका की यूथ ब्रिगेड से ज्योतिरादित्य सिंधिया पहले ही कांग्रेस का दामन छोड़ चुके हैं। राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत किसी से छिपी नहीं है। वे दोबारा कांग्रेस में वापस तो आ गए लेकिन उनकी मांगें अभी पूरी नहीं हुई हैं। मिलिंद देवड़ा की नाराजगी भी चरम पर है। पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को अपनी ही पार्टी के बगावतियों से दो-चार होना पड़ रहा है। सवाल यह है कि राहुल और प्रियंका के नजदीकी कांग्रेस छोड़ क्यों रहे हैं? कांग्रेस को इसमें अवसरवादिता तलाशने के साथ ही आत्ममंथन भी करना चाहिए। हालांकि चुनाव के दौरान नेता दल बदलने लगते हैं और अपने लिए सुरक्षित स्थान तलाशने लगते हैं, यह कोई नई बात नहीं है। जिस नए दल में वे जाते हैं, वहां उनका स्वागत होता है, जिस दल को वे छोड़ते हैं, वहां उनकी आलोचना होती है। सुविधा का संतुलन ही इसके पीछे मुख्य है। भाजपा को जितिन प्रसाद के पार्टी से जुड़ने का कितना फायदा होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता। एक नेता के तौर पर उनकी उपयोगिता समझ में आती है लेकिन ब्राह्मण चेहरे के तौर पर वे कितने प्रासंगिक होंगे, यह कहना जरा जल्दीबाजी होगी। वैसे भी जिस ब्राहमण चेतना परिषद के वे संरक्षक रहे हैं, उसके उन्नाव इकाई के जिलाध्यक्ष कमलेश कुमार तिवारी ने अपने पद और दायित्व से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया है कि इस परिषद का गठन मौजूदा सरकार के ब्राह्मण विरोधी रवैये की मुखालफत के लिए किया गया था, जब परिषद के संरक्षक ही भाजपा के साथ खड़े हो गए तो इस परिषद का औचित्य क्या बचा? राष्ट्रीय ब्राह्मण युवजन सभा के अध्यक्ष आशुतोष पांडेय ने कहा है कि ब्राहमण संगठन बनाना अच्छी बात है मगर अपने स्वार्थ के लिए समाज को धोखा देकर ब्राहमणों को बेच देना अच्छी बात नहीं, पाप है। सोशल मीडिया पर इस तरह अनेक ब्राहमण संगठनों की प्रतिक्रिया आ रही है। मतलब साफ है कि उनके इस निर्णय को कम से कम ब्राहमण संगठनों ने स्वीकार नहीं किया है। वर्ष 2022 के आसन्न विधानसभा चुनाव से पहले जितिन प्रसाद को अपने खेमे में लाकर भाजपा ने कांग्रेस की टूटी कमर पर एक और लाठी मार दी है। जिस गर्मजोशी के साथ जितिन प्रसाद का भाजपा में स्वागत हुआ है, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। जितिन प्रसाद के भाजपा में गृहप्रवेश के एक दिन बाद ही जिस तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिल्ली बुलाया गया है, उसे लेकर भी कयासों का बाजार गर्म हो गया है। वैसे भी भाजपा में जब भी कोई नई बात होती है तो राजनीतिक सरसराहट तो होती ही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले, भाजपा के संगठन मंत्री बीएल संतोष और भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह के लखनऊ प्रवास और मंत्रियों, विधायकों व कार्यकर्ताओं से बातचीत के बाद प्रदेश में सियासी सुगबुगाहट की चिंगारी सुलग रही थी। ए.के. शर्मा को प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी देने की बात भी हवा में उछल रही है और अब तो खबर यह है कि ए.के. शर्मा भी दिल्ली पहुंच गए हैं। बातचीत का सिरा कुछ भी हो लेकिन विमर्श अपने लिए संभावनाएं तो तलाशता ही है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपाध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा से मुलाकात के दौरान योगी के सामने एके शर्मा और जितिन प्रसाद पर भी वार्ता हो सकती है। न हो, वह और बात है लेकिन उत्तर प्रदेश में चर्चाओं का बाजार तो गर्म है ही। गौरतलब है कि जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस में सक्रिय नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की मांग को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी। पत्र से जुड़े विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की कांग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पारित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, जिसे लेकर विवाद भी हुआ था। इसके बाद से वे कांग्रेस में खुद को उपेक्षित पा रहे थे। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद ने कांग्रेस में अहम पदों पर अपनी सेवाएं दी थीं। मतलब जितिन का कांग्रेस से रिश्ता पारिवारिक और बेहद आत्मीय रहा है। जितिन वर्ष 2004 में शाहजहांपुर से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीते थे और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में इस्पात राज्यमंत्री बने थे। वर्ष 2009 में धौरहरा सीट से उन्होंने विजय हासिल की और संप्रग सरकार में पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस, सड़क परिवहन और राजमार्ग और मानव, संसाधन विकास राज्यमंत्री बनाए गए। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने वाले जितिन प्रसाद को पराजय का मंह देखना पड़ा था। वर्ष 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में वे तिलहर विधानसभा सीट से हाथ चुनाव लड़े लेकिन असफलता ने यहां भी उनका साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी धौरहरा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। बंगाल में उन्हें कांग्रेस ने प्रभारी बना रखा था लेकिन वहां कांग्रेस की हालत पहले से भी पतली होकर रह गई है। यूपी पंचायत चुनाव में उनकी भाभी का चुनाव हारना राजनीतिक हलके में विमर्श का विषय बना हुआ है। भाजपा ने विश्वास जाहिर किया है कि उनके भाजपा में आने से भाजपा को मजबूती मिलेगी। राजनीति में हानि- लाभ का विचार किए बिना तो कुछ होता नहीं। वैसे भाजपा को जितिन प्रसाद से लाभ मिलेगा या जितिन को भाजपा से, यह तो वक्त ही तय करेगा। भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जितिन प्रसाद को अपना छोटा भाई बताते हुए भाजपा में शामिल होने के उनके निर्णय का स्वागत किया। संयोग से, ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद दोनों उत्तर प्रदेश मामलों के कांग्रेस में प्रभारी थे। सिंधिया मार्च 2020 में अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने के बाद उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्हें विचारविहीन, सिद्धांतविहीन एवं सहूलियत की राजनीति करने वाला बता दिया है। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हुए थे तब उनके पिता माधवराव सिंधिया पर कांग्रेस छोड़ने और सोनिया गांधी का विरोध करने का मुददा उछला था। और अब जब जितिन ने कांग्रेस छोड़ी है तो कहा जा रहा है कि जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी तो जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद ने विरोध किया था। उन्होंने विरोध में चुनाव लड़ा था और इसके बाद भी उन्हें पद दिया गया। कांग्रेस कह रही है कि यह लड़ाई सत्तालोलुपता की नहीं, विचारधारा की है। वैसे भी जितिन प्रसाद ने भाजपा की जिस तरह सराहना की है, वह कांग्रेस की छाती पर मूंग दलने जैसी ही है। इससे उबरने में उसे समय तो लगेगा ही। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)