बैतूल में भुमका-भगत ने आदिवासियों का टीकाकरण को लेकर बदला नजरिया

 बैतूल में भुमका-भगत ने आदिवासियों का टीकाकरण को लेकर बदला नजरिया
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बैतूल, 20 जून (आईएएनएस)। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए कारगर वैक्सीन को लेकर आदिवासी इलाकों के साथ ग्रामीण अंचल में डर है। इस डर को खत्म करने के लिए मध्य प्रदेश के बैतूल में आदिवासी पुजारियों जिन्हें भुमका-भगत का सहारा लिया जा रहा है। इसका असर भी दिखने लगा है और गांव के लोग वैक्सीन लगवाने के लिए तैयार हो रहे हैं। बैतूल आदिवासी बाहुल्य जिला है । यहां के ग्रामीण इलाकों में टीकाकरण को लेकर भ्रम है, जिसे लेकर वे टीकाकरण के लिए तैयार नहीं होते हैं। ग्रामीण टीकाकरण के लिए तैयार हो यह बड़ी चुनौती है। ग्रामीणों के भ्रम और डर को मिटाने के लिए जिलाधिकारी अमनवीर सिंह बैस ने नायाब तरीका निकाला , लोगों के भ्रम को दूर करने के लिए भुमका-भगत का सहारा लिया। आदिवासी पुजारियों को इलाके में भुमका या भगत कहते हैं। पहली बार इनकी मदद प्रशासन ने भी ली है। बैतूल कलेक्टर अमनवीर सिंह ने बताया कि 30 गांवों के आदिवासी वैक्सीन लेने के लिए तैयार नहीं थे, अब वे तैयार और टीकाकरण कराना चाहते है। जिलाधिकारी सिंह ने कहा कि बैतूल के आदिवासी क्षेत्रों में कम से कम 25 पंचायतें हैं, जहां किसी ने भी टीका नहीं लगवाया है। वहीं, 47 गांवों में पांच फीसदी से कम टीकाकरण हुआ है। इसकी मुख्य वजह कोविड वैक्सीन को लेकर फैले अफवाह हैं। इससे निपटने के लिए प्रशासन की टीम स्थानीय धार्मिक प्रमुखों के पास पहुंची। वे लोग ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के लिए तैयार हो गए। अब अधिकारी भी इन पुजारियों के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। ये पुजारी स्थानीय भाषा में लोगों से वैक्सीन लगवाने के लिए अपील कर रहे हैं। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी केएल त्यागी ने बताया कि जूनापानी गांव के भुमका (आदिवासियों के पुजारी) सागन मार्सकोले का गोंडी बोली में वीडियो सोशल मीडिया पर प्रशासन ने पोस्ट भी किया है। इसमें वह कह रहे हैं कि सरकार आपकी सुरक्षा के लिए यह टीकाकरण अभियान चला रही है। बैतूल के अधिकांश आदिवासी इलाके में लोग गोंडी बोली बोलते हैं। 14 आदिवासी पुजारियों के वीडियो बैतूल के ग्रामीण इलाकों में प्रशासन की तरफ से प्रसारित किए जा रहे हैं, जिसका असर देखने को मिल रहा है। त्यागी ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में वैक्सीनेशन के प्रचार-प्रसार के लिए सेवाभारती संस्था की मदद से अभियान चलाया जा रहा है। जिसका नेतृत्व अभिषेक खंडेलवाल कर रहे है। बोरगांव के पर्वत राव धोटे ने बताया, हमारे गांव में इस बात की अफवाह थी कि टीकाकरण के बाद मौत हो रही है, जो निराधार थीं। लोगों के इस भ्रम को दूर किया गया और स्वयं का टीकाकरण कराकर लोगों को भरोसा दिलाया । कलेक्टर सिंह ने कहा परंपरागत रूप से आदिवासियों की अपनी समानांतर स्वास्थ्य प्रणाली और मान्यताएं होती हैं। उनके पास अगर पुजारियों से कोई जानकारी आती है तो इसका प्रभाव पड़ता है। इसी वजह से स्थानीय पुजारियों की पहचान की, उनके साथ बैठकें कीं, उन्हें वैक्सीन को लेकर आश्वस्त किया और वे अब जागरूकता फैला रहे हैं। उन गांवों में लक्षित वैक्सीनेशन किया जा रहा है, आदिवासियों और गैर आदिवासियों की मिश्रित आबादी है। अब जिन लोगों को टीका लग रहा है, वह पड़ोसी आदिवासी गांवों में जागरूकता पैदा कर रहे हैं। जिलाधिकारी सिह के मुताबिक पिछले 10 दिनों में लोगों की मानसिकता में बदलाव आया है। 47 गावों का सर्वेक्षण किया, जहां टीकाकरण प्रतिशत कम था। इनमें से 30 गांवों के लोग अब टीकाकरण के लिए तैयार हैं। वहां शिविर लगाए जाते हैं तो वे टीकाकरण करवाएंगे। --आईएएनएस एसएनपी/आरजेएस

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