गोरक्षनाथ पीठ की अगुआई में 165 साल पहले हल होने वाला था विवाद, लेकिन अंग्रेजों ने 2 क्रांतिकारियों को फांसी देकर तोड़ दिया था सपना
गोरक्षनाथ पीठ की अगुआई में 165 साल पहले हल होने वाला था विवाद, लेकिन अंग्रेजों ने 2 क्रांतिकारियों को फांसी देकर तोड़ दिया था सपना
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गोरक्षनाथ पीठ की अगुआई में 165 साल पहले हल होने वाला था विवाद, लेकिन अंग्रेजों ने 2 क्रांतिकारियों को फांसी देकर तोड़ दिया था सपना

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500 सालों के इंतजार के बाद आखिरकार वह शुभ घड़ी आ ही गई, जब अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर की नींव रखी जाएगी। बताया जाता है कि इस आंदोलन की शुरुआत गोरक्षनाथ पीठ से हुई। यह विवाद 1855 से 1860 के बीच हल हो जाता, लेकिन तब अंग्रेजों ने इस आंदोलन से जुड़े दो क्रांतिकारियों को फांसी देकर मामला शांत कर दिया था। डॉक्टर प्रदीप राव गोरखनाथ मंदिर के महाविद्यालय के प्राचार्य और इतिहासकार हैं। उन्होंने इस आंदोलन का पूरा किस्सा बताया। राव कहते हैं कि गोरक्षनाथ मंदिर, नाथ पंथ, शैव धर्म को मानने वाले और शैव पीठ ने भारत की राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के मुद्दों को हमेशा उठाया है। श्रीराम जन्म भूमि आंदोलन की लंबे समय तक किसी पीठ या धर्म परंपरा ने अगुआई की है तो वह गोरक्षनाथ पीठ रही है। 1855-60 में विवाद हल होने की ओर था- डॉक्टर प्रदीप राव 1855 से 1885 तक गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर महंत गोपालनाथ महाराज थे। 1850 से 60 के बीच में राम जन्मभूमि विवाद लगभग हल होने की ओर था। तब गोपालनाथ ने क्रांतिकारी अमीर अली और आंदोलन में सक्रिय रहे बाबा रामचरण दास को साथ लिया और मंदिर विवाद हल करने की पहल शुरू की। अमीर अली का मत था कि जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप देना चाहिए, लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा नहीं होने दिया। अंग्रेजों ने अमीर अली और रामचरण दास को बागी घोषित कर 18 मार्च 1885 को फांसी पर लटका दिया। इस घटना ने लोगों को झकझोर दिया। लेकिन, लोग एकजुट होते रहे। आगे चलकर योगीराज बाबा गंभीर नाथ और ब्रह्मनाथ जी महाराज ने भी इसके लिए कोशिश की। इसके बाद 1949 में अयोध्या में करपात्री महाराज, परमहंस रामचंद्र दास जी महाराज और महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज जुटे और वहां अप्रैल में तय किया गया कि राम जन्मभूमि पर 1108 नवान पाठ करेंगे। लोग बताते हैं कि महंत दिग्विजय नाथ, परमहंस रामचंद्र महाराज ने खुद उस स्थान को साफ किया। 22-23 दिसंबर की रात भगवान श्रीराम वहां पर बाल रूप में प्रकट हुए। सुबह होते-होते खबर पूरे देश में फैल गई। यह बात उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक पहुंची तो वे मंदिर से मूर्ति हटवाने की कोशिश करने लगे। उत्तर प्रदेश के तब के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के निर्देश पर डीएम और स्थानीय प्रशासन ने मूर्ति हटाने की कोशिश की, लेकिन महंत दिग्विजय नाथ के साथ अन्य संतों और करीब 5 हजार जनता को देखते हुए उन्हें यह रिपोर्ट देनी पड़ी कि जनता के दबाव में हम यह नहीं कर सकते। उसके बाद वहां पूजा-पाठ चलता रहा। महंत अवेद्य नाथ बनाए गए थे राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष 1984 में यह आंदोलन फिर उठ खड़ा हुआ, जब आरएसएस की अगुआई में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की धर्मसभा हुई। तब श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के लिए ऐसे संत की जरूरत थी, जो सनातन परंपरा के सभी मठ-मजहब को समान रूप से स्वीकार हो। उस समय गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्य नाथ का नाम आगे अाया। उन्हें श्रीराम जन्मभूमि न्यास का अध्यक्ष बनाया गया। इस तरह यह आंदोलन एक नए रूप में शुरू हुआ। ढांचा गिराने का कभी दुख नहीं जताया ब्रह्मलीन महंत अवेद्य नाथ ने कभी ढांचा गिरने पर दुख नहीं जताया। वे 6 दिसंबर 1992 में ढांचा गिरने के साक्षी रहे। महंत अवेद्य नाथ ने कभी इस पर अफसोस नहीं जताया। जब भी ढांचा गिरने की बात आई, वे कहते थे कि हिंदू समाज का यह पुरुषार्थ रहा है। वह ढांचा नहीं गिरा। वह भारत के माथे पर लगा जो कलंक था, वह गिरा और वह साफ हुआ। 5 अगस्त को गोरक्षनाथ पीठ में भी जश्न मनेगा 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के करोड़ों हिंदुओं के संकल्प को पूरा करने के लिए अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखेंगे। इसके साथ ही अयोध्या से 137 किमी दूर गोरखपुर में स्थित गोरक्षनाथ पीठ में भव्य जश्न की तैयारी है।-newsindialive.in