समानता के हक में बाधा है पचास फीसदी आरक्षण

समानता के हक में बाधा है पचास फीसदी आरक्षण
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प्रमोद भार्गव वैसे तो आरक्षण का पेच गाहे-बगाहे अदालतों में विवाद का मसला बना ही रहता है लेकिन इसबार सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की निर्धारित सीमा पचास प्रतिशत पर रोक लगा दी है। शीर्ष न्यायालय ने महाराष्ट्र में मराठों के लिए 16 फीसदी आरक्षण देने के राज्य सरकार के फैसले को रदद् कर दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इंदिरा साहनी के मामले पर पुनर्विचार नहीं होगा। यदि यह आरक्षण दिया जाता है तो आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास प्रतिशत के पार चली जाती, जो असंवैधानिक है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आरक्षण की सीमा लांघने की स्थिति को समानता के मौलिक अधिकार के विरुद्ध बताने के साथ यह भी कहा कि मराठा समुदाय शैक्षणिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं कहा जा सकता है। नतीजतन इन्हें आरक्षण के दायरे में लाना उचित नहीं है। देश में फिलहाल सरकारी नौकरियों में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के 1992 में इंदिरा साहनी के आए फैसले के आधार पर आरक्षण की सीमा निर्धारित है। इसे मंडल जजमेंट भी कहते हैं। इसमें आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास फीसदी तय की गई थी। किंतु इस निर्णय में यह विकल्प है कि अपवाद की स्थिति में यह सीमा लांघी जा सकती है। इसे आधार बनाकर कई राज्यों ने जाति विशेष के मतदाताओं को लुभाने के नजरिए से 75 फीसदी तक आरक्षण की सीमा बढ़ा दी है। दरअसल राज्य सरकारें यह भलिभांति जानती हैं कि वोटबैंक की राजनीति के चलते ठीक चुनाव के पहले किसी जाति या पंथ को आरक्षण देना या उसकी घोषणा करना संविधान के विपरीत है। अदालत ऐसे आरक्षण को शून्य में बदल सकती है। बावजूद राजनीतिक चालाकियों के चलते यह खेल खेला जाता रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को मंजूर करते हुए मराठा समुदाय को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने का फैसला लिया था। आयोग की सिफारिश के मुताबिक मराठों को नई श्रेणी 'सामाजिक और श्ौक्षिक पिछड़ा वर्ग' के तहत आरक्षण दिया जाना प्रास्तावित था। मराठा समाज की यह मांग 1980 से लंबित थी। 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा से इस समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान पहली बार किया था। किंतु मुंबई उच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को गैर संवैधानिक मानते हुए, अमल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद आरक्षण की मांग नियमित उठती रही। 2016 में इस आंदोलन के स्वरूप ने आक्रोश का रूप भी लिया, नतीजतन एक युवक ने नहर में कूदकर आत्महत्या भी कर ली थी। तत्पश्चात आयोग ने 25 विभिन्न बिंदुओं के आधार पर मराठा समुदाय को कमजोर मानते हुए महाराष्ट्र सरकार को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की हरी झंडी दे दी थी। आयोग ने इन्हें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक आधार पर पिछड़ा माना था। फिलहाल महाराष्ट्र में 52 प्रतिशत आरक्षण है, जो बढ़कर 68 हो जाता। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने यह खेल खेला था। बावजूद सरकार 16 प्रतिशत आरक्षण कैसे देगी यह विवाद का पहलू था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जकता है। हालांकि इस आरक्षण को देने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग ने मराठा समुदाय की सभी जातियों और उपजातियों से विचार विमर्श किया था। समाज के 98 फीसदी लोगों से राय ली गईं थी। कुनबी और ओबीसी के दायरे में आने वाली 90 फीसदी जातियों ने मराठों को आरक्षण देने का समर्थन किया था। इसके लिए 43,600 से भी ज्यादा परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। इससे पता चला कि मराठा समुदायों के 37 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने को विवश हैं। 70 प्रतिशत परिवार कच्चे मकानों में रहते हैं और 63 प्रतिशत परिवार लघु कृषक हैं। 53 प्रतिशत परिवारों के पास फ्रिज्र, वाशिंग मशीन और कंप्युटर नहीं हैं, वहीं 43 प्रतिशत परिवार के पास टीवी नहीं हैं। 22 फीसदी परिवारों की वार्षिक आय 24000 से भी कम हैं। 51 प्रतिशत परिवारों की सालाना आमदनी 24 से 50 हजार के बीच हैं। 19 फीसदी परिवारों की आमदनी 50 हजार से 1 लाख के बीच हैं। आठ फीसदी परिवारों की आय 1 लाख से 4 लाख रुपए वार्षिक और महज 0.5 फीसदी परिवारों की आमदनी सालाना 4 लाख रुपए से अधिक है। इन बिंदुओं को आधार बनाकर फड़नवीस सरकार मराठाओं को आरक्षण देने की तैयारी में थी। जबकि महाराष्ट्र में मराठा, उत्तर भारत के क्षत्रियों की तरह उच्च सवर्ण और सक्षम भाषाई समूह हैं। आजादी से पहले शासक और फिर सेना में इस कौम का मजबूत दखल रहा है। आजादी की लड़ाई में मराठा, पेशवा, होल्कर और गायकवाड़ की अहम भूमिका रही है। स्वतंत्र भारत में यह जुझारू कौम आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में इतनी क्यों पिछड़ गई कि इसे आरक्षण के बहाने संरक्षण की जरूरत पड़ गई, यह राजनेताओं और समाज विज्ञानियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए ? दरअसल किसी भी समाज की व्यापक उपराष्ट्रीयता धर्म, भाषा और कई जातीय समूहों की पहचान से जुड़ी होती है। भारत ही नहीं समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में उपराष्ट्रीयताएं अनंतकाल से वर्चस्व में हैं। इसकी मुख्य वजह है कि भारत एक साथ सांस्कृतिक भाषाई और भौगोलिक विविधताओं वाला देश है। इसीलिए हमारे देश के साथ 'अनेकता में एकता' का संज्ञा सूचक शब्द जुड़ा है। एक क्षेत्र विशेष में रहने के कारण एक विशेष तरह की संस्कृति विकसित हो जाती है। जब इस एक प्रकार की जीवन श्ौली के लोग इलाका विशेष में बहुसंख्यक हो जाते हैं तो यह एक उपराष्ट्रीयता का हिस्सा बन जाती है। मराठे, बंगाली, पंजाबी, मारवाड़ी, बोड़ो, नगा और कश्मीरी ऐसी ही उपराष्ट्रीयताओं के समूह हैं। एक समय ऐसा भी आता है, जब हम अपनी-अपनी उपराष्ट्रीयता पर गर्व दुराग्रह की हद तक करने लग जाते हैं। जम्मू-कश्मीर और पंजाब के अलगाववादी आंदोलन, शुरूआत में उपराष्ट्रीयता को ही केंद्र में रखकर चले, किंतु बाद में सांप्रदायिकता के दुराग्रह में बदलकर आतंकवादी जमातों का हिस्सा बन गए। इन्हीं उपराष्ट्रीयताओं के हल हमारे पूर्वजों ने भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण करके किए थे। लेकिन महाराष्ट्र में मराठों को यदि आरक्षण दे दिया जाता तो तमाम सुप्त पड़ी उपराष्ट्रीयताएं जाग जाती। गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर और आंध्र प्रदेश में कापू समाज का आरक्षण के लिए आगे आना तय था। हमारा संविधान भले ही जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर वर्गभेद नहीं करता, लेकिन आज इन्हीं सनातन मूल्यों को आरक्षण का आधार बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। आजादी के बाद जब संविधान अस्तित्व में आया तो, अनुसूचित जाति और जनजातियों के सामाजिक उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गई थी। 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए ओबीसी आरक्षण का प्रावधान किया था। आजादी के 73 साल बाद भी ये जातियां समग्र रूप में न तो अपने बुनियादी उद्देश्य में सफल हुईं और न ही व्यापक सामाजिक हित साधने में कामयाब रहीं। इसके उलट एक ही वर्ग में आर्थिक और सामाजिक विसंगति बढ़ गई, जो ईर्ष्या और विद्वेष का कारण बन रहे हैं। नतीजतन आरक्षण के ये प्रावधान न तो समाज के लिए लाभदायी रहे और न ही देश के लिए। आरक्षण व्यवस्था के परिणामों से रुबरू होने के बावजूद देश के राजनेता वोट की राजनीति के लिए संकीर्ण लक्ष्यों की पूर्ति में लगे हैं और जातीय आरक्षण की इस प्रक्रिया को लगातार बनाए रखने की कवायद करते रहते हैं। जबकि समय की मांग है कि इसकी पुनर्समीक्षा हो और इसे आर्थिक आधार देकर वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ दिया जाए ? एक समय आरक्षण का सामाजिक न्याय से वास्ता जरूर था, लेकिन सभी जाति व वर्गों के लोगों द्वारा शिक्षा हासिल कर लेने के बाद जिस तरह से देश में शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई है, उसका कारगर उपाय आरक्षण जैसे चुक गए औजार से संभव नहीं है। लिहाजा सत्तारूढ़ दल अब सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों के समाधान आरक्षण के हथियार से खोजने की बजाय रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर निकालेंगे तो बेहतर होगा। यदि वोट की राजनीति से परे अबतक दिए गए आरक्षण के लाभ का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो साबित हो जाएगा कि यह लाभ जिन जातियों को मिला है, उनका समग्र तो क्या आंशिक कायाकल्प भी नहीं हो पाया ? भूमण्डलीकरण के दौर में खाद्य सामग्री की उपलब्धता से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास संबंधी जितने भी ठोस मानवीय सरोकार हैं, उन्हें हासिल करना इसलिए और कठिन हो गया है, क्योंकि अब इन्हें केवल पूंजी और अंग्रेजी शिक्षा से ही हासिल किया जा सकता है ? ऐसे में आरक्षण लाभ के जो वास्तविक हकदार हैं, वे अर्थाभाव में जरूरी योग्यता और अंग्रेजी ज्ञान हासिल न कर पाने के कारण हाशिये पर उपेक्षित पड़े हैं। अलबत्ता आरक्षण का सारा लाभ वे लोग बटोरे लिए जा रहे हैं, जो पहले ही आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक व शैक्षिक हैसियत हासिल कर चुके हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)