दुर्ग :छत्तीसगढ़ में दिखने लगा दुर्लभ कछुआ "ट्रैकेरिंनेट हिल टर्टल"

दुर्ग :छत्तीसगढ़ में दिखने लगा दुर्लभ कछुआ "ट्रैकेरिंनेट हिल टर्टल"
durg-rare-turtle-seen-in-chhattisgarh-quottrakarinet-hill-turtlequot

दुर्ग, 01 अप्रैल (हि. स.)। टाइगर की भांति शेड्यूल वन में संरक्षित दुर्लभ ट्रैकारिनेट हिल टर्टल (पहाड़ी कछुआ) केशकाल पहाड़ियों एवं उदन्ती सीतानदी टाइगर रिजर्व में पहली बार देखा गया है। इसके बाद इसे रिपोर्ट कर वन विभाग द्वारा दस्तावेजों में शामिल किया गया है। जिला दुर्ग के डीएफओ धम्मशील गणवीर ने गुरुवार को चर्चा करते हुए बताया कि इस दुर्लभ प्राणी ट्रैकारिनेट हिल टर्टल (पहाडी कछुआ) को उनके द्वारा केशकाल में रहते हुए 6 माह पूर्व रिपोर्ट किया गया था। इस दुर्लभ प्रजाति के पहाड़ी कछुए के बारे में उनके द्वारा शीघ्र ही एक शोध पत्र भी प्रस्तुत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि यह दुर्लभ प्राणी सब हिमालयन रेंज में पाया जाता है, परंतु अब छत्तीसगढ़ में भी दिखाई पड़ रहा है। उन्होंने बताया गया कि कोविड-19 काल में मानवी उपस्थिति वन क्षेत्र में कम हुई है, इसी का परिणाम है कि इस प्रकार के दुर्लभ प्राणी अब दिखाई देने लगे हैं। 2017 से 2019 के बीच नोवा नेचर वेलफ़ेयर सोसाइटी द्वारा गरियाबंद, धमतरी और केश्काल के जंगलों मे अध्ययन के दौरान एक दुर्लभ और संकटग्रस्त कछुए की प्रजाति का पता लगाया गया। यह है ट्रैकारिनेट हिल टर्टल (पहाडी कछुआ) ।यह औसत 12 सेमी का कछुआ है, जिसके काले शल्क पर तीन पीली लकीरे होती है। इसी वजह से इसका नाम ट्रैकारिनेट हिल टर्टल पड़ा हैं। यह सामान्य तौर पर समतल जगहों पर मिश्रित वनों में पाया जाता हैं। इसे जंगलों के जमीन पर सर्दियों मे देखा जा सकता हैं। इसके करीब जाने पर हिस -हिस जैसा आवाज करता है। इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो दुनिया मे पाये जाने वाले सभी जीवों का वर्गीकरण करता है। वे संकटग्रस्त है या नही। अभी तक राज्य मे कुछ जीव जैसे बाघ, वन भैसा, एशियाई हाथी, पेंगोलिन या साल खपरि और ढोल इस सूची मे शामिल थे। अब राज्य में एक कछुआ भी ऐसा मिला जो संकटग्रस्त की सूची में पहले से शामिल हैं। सिर्फ यही नही भारतीय वन्यजीव अधिनियम 1972 के अनुसार इसे सूची -एक में रखा गया हैं, जिसका मतलब है इसे उतना ही संरक्षण प्रप्त है जितना की एक बाघ को प्राप्त हैं। संकटग्रस्त जीवों की अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रोक लगाने वली संस्था साइट्स ने भी इसे अपने सूची एक मे शामिल किया हैं। जिससे पता चलता है कि ये प्रजाति संकट में है और इसके संरक्षण में ध्यान देना बहुत ज़रूरी है। जंगलों का कम होना, और वनो मे लगने वली आग ये बड़े कारण है, जिनसे इनकी जनसंख्या कम हो रही हैं। इस पर जल्द से जल्द अध्ययन कर इसके बारे मे जानकारी जुटाना और इनके संरक्षण ऐक्शन प्लान तैयार करने की जरूरत हैं। इस अध्ययन में वन विभाग के विष्णुराज नायर (वनमंडलाधिकारी) एवं धम्मशील गणवीर(वनमंडलाधिकारी) का सहयोग प्रदान हुआ। साथ में उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के स्टाफ नीलकंठ ध्रुव, विनय पटेल और नोवा नेचर वेलफेयर सोसाइटी से एम सूरज,(अध्यक्ष) मोईज अहमद, (सचिव)ओम प्रकाश नागेश, नितेश साहू भी शामिल रहे। हिन्दुस्थान समाचार/अभय जवादे

अन्य खबरें

No stories found.