डेली वेज वर्कर प्लेटफॉर्म और जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी ने प्रवासी श्रमिकों के बीच टीकाकरण को लेकर जारी की सर्वेक्षण रिपोर्ट

 डेली वेज वर्कर प्लेटफॉर्म और जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी ने प्रवासी श्रमिकों के बीच टीकाकरण को लेकर जारी की सर्वेक्षण रिपोर्ट
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नई दिल्ली, 22 नवंबर (आईएएनएस)। कोविड-19 के टीके ने महामारी के विनाशकारी प्रभावों को कम करना शुरू कर दिया है। सरकार ने जनवरी 2021 में अपना सामूहिक टीकाकरण अभियान शुरू किया और 10 नवंबर 2021 तक 110 करोड़ से अधिक भारतीय नागरिकों को कम से कम एक खुराक मिल चुकी है। 100 प्रतिशत टीकाकरण वाले भारत के रास्ते में कई बाधाएं मौजूद हैं, जिनमें कमजोर आबादी के बीच टीका हिचकिचाहट और प्रतिरोध सबसे प्रमुख है। वैक्सीन हिचकिचाहट वैक्सीन की स्वीकृति में देरी को संदर्भित करता है, जबकि प्रतिरोध एक पूर्ण अस्वीकृति का संकेत देता है। संकोच करने वाली आबादी में प्रतिरोध के स्तर और अन्य विभिन्न विशेषताओं को मापने के लिए, द डेली वेज वर्कर प्लेटफॉर्म (डीडब्ल्यूडब्ल्यूपी) ने जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (जेजीयू) के साथ मिलकर शहरी भारत में वैक्सीन अपनाने और प्रतिरोध को मापने के लिए एक सर्वेक्षण किया। दोनों संगठनों ने मिलकर सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्षों का विश्लेषण करते हुए एक रिपोर्ट जारी करने की घोषणा की है। जेजीयू राष्ट्रीय और वैश्विक शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों के विभिन्न उच्च स्तर की फैकल्टी के साथ भारत का शीर्ष निजी विश्वविद्यालय है। जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संयुक्त निदेशक श्रीराम राघवन ने कहा, हम भारत में प्रवासी और दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों का समर्थन करने के लिए एक ज्ञान मंच (नॉलेज प्लेटफॉर्म) विकसित करने के लिए डीडब्ल्यूडब्ल्यूपी के साथ जुड़कर रोमांचित हैं। एनजीओ के साथ स्वैच्छिक कार्यक्रम हमारे छात्रों के लिए एक समृद्ध अनुभव रहा है, क्योंकि उन्होंने प्रवासी श्रमिकों के दैनिक संघर्ष को देखा है। देश के टीकाकरण अभियान पर भारत के 45 करोड़ अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों के आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य को सामने लाने वाली इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर काम करते हुए छात्रों ने जो अकादमिक और क्षेत्रीय अनुभव हासिल किया है, उसके लिए हम आभारी हैं। डेली वेज वर्कर प्लेटफॉर्म (डीडब्ल्यूडब्ल्यूपी) एक गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ है, जो खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और आजीविका के साथ महामारी के दौरान प्रवासियों और दैनिक तौर पर मजदूरी करके जीवनयापन करने वाले लोगों का समर्थन करने के लिए समर्पित है। पहली लहर के दौरान, डीडब्ल्यूडब्ल्यूपी ने टेली-मेडिसिन और सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) का उपयोग करते हुए मलिन बस्तियों में श्रमिकों के लिए एक आपातकालीन स्वास्थ्य पैकेज शुरू करने के लिए स्विस सरकार और स्माइल फाउंडेशन के साथ भागीदारी की। इसके अलावा दूसरी लहर के दौरान चिकित्सा आपूर्ति की उपलब्धता पर अपडेट जानकारी प्रदान करने के लिए डीडब्ल्यूडब्ल्यूपी ने एक वर्चुअल हेल्प डेस्क की स्थापना भी की। डेली वेज वर्कर प्लेटफॉर्म के संस्थापक सिद्धार्थ प्रकाश ने कहा, हमारी वैक्सीन सर्वेक्षण रिपोर्ट शहरी प्रवासियों के बीच राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम की पहुंच का एक क्षेत्र मूल्यांकन प्रदान करती है, साथ ही उन कारकों में अंतर्²ष्टि प्रदान करती है, जो श्रमिकों के बीच प्रतिरोध और झिझक पैदा कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि वैश्विक स्तर पर वैक्सीन प्रतिरोध को दूर करने के लिए निष्कर्षों और सिफारिशों को राष्ट्रीय संचार और टीकाकरण कार्यक्रमों के डिजाइन में शामिल किया जाएगा। जेजीयू के शोधकर्ताओं द्वारा डिपस्टिक सर्वेक्षण छह शहरों - दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, रांची, चेन्नई और कोलकाता में किया गया। टीम ने शुरू में द्वितीयक शोध का उपयोग करते हुए वैक्सीन हिचकिचाहट/प्रतिरोध के कारणों और विशेषताओं की परिकल्पना की। सर्वेक्षण विभिन्न जनसांख्यिकीय और मनो-सामाजिक पहलुओं को मापने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है। टीम द्वारा सुविधाजनक सैंपलिंग की पद्धति का उपयोग कर 200 प्रवासियों और दिहाड़ी मजदूरों का सर्वेक्षण किया गया। रिपोर्ट उनकी प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करती है और प्रमुख हितधारकों - सरकार, गैर सरकारी संगठनों और निगमों के लिए सुझाव प्रदान करने का प्रयास करती है। वैक्सीन सर्वेक्षण के परिणामों से पता चला है कि छह शहरों में सर्वेक्षण में शामिल 200 प्रवासियों में से, 44 प्रतिशत ने पहली खुराक प्राप्त की है, जबकि 18 प्रतिशत ने दूसरी खुराक प्राप्त की है। 38 प्रतिशत को टीका नहीं लगाया गया है, 18 प्रतिशत वैक्सीन को लेने में हिचकिचा रहे हैं और 12 प्रतिशत ऐसे प्रवासी देखने को मिले, जिन्होंने वैक्सीन लेने से मना कर दिया है। सर्वेक्षण ने उम्र, लिंग, व्यवसाय सहित कई मापदंडों को देखते हुए टीके के प्रति झिझक और प्रतिरोध को मापा। सर्वे में पाया गया कि 10,000 रुपये प्रति माह से कम कमाने वाले दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी टीकाकरण के प्रति सबसे अधिक प्रतिरोधी या खिलाफ हैं। दूसरी ओर, एक निश्चित आय वाले प्रवासी वैक्सीन लेने के इच्छुक हैं और उन्होंने पहली खुराक प्राप्त भी कर ली है। निर्माण कंपनियों और रेलवे सहित कई सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के नियोक्ता सक्रिय रूप से टीकाकरण प्रक्रिया को सुविधाजनक बना रहे हैं, जिन्होंने अपने श्रमिकों के लिए टीकाकरण अनिवार्य कर दिया है। हालांकि, कई कर्मचारी कोविड-19 वैक्सीन के प्रति अनभिज्ञ, संदिग्ध और प्रतिरोधी बने हुए हैं। विभिन्न समूहों के बीच झिझक के स्तर का आकलन करने के साथ-साथ, सर्वेक्षण ने उन अंतर्निहित कारणों और विश्वासों को उजागर करने का प्रयास किया, जिनके परिणामस्वरूप झिझक बनी हुई है। इनमें साइड इफेक्ट का डर, मजदूरी का नुकसान, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में अविश्वास और जानकारी की कमी और टीकाकरण कार्यक्रम तक पहुंच जैसे कारण शामिल थे। एक प्रमुख कारक, जो हिचकिचाहट के स्तर को प्रभावित कर रहा, वह संचार के चैनल रहे हैं। वैक्सीन की झिझक सर्वे में शामिल ऐसे उत्तरदाताओं के साथ अधिक देखने को मिली है, जिन्होंने अपनी अधिकांश जानकारी सामुदायिक नेताओं या पंचायतों से प्राप्त की है। ऐसे लोगों ने ही टीके के लिए अधिक झिझक महसूस की है। सिफारिश अनुभाग सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर टीके की झिझक को कम करने के लिए कार्यान्वयन योग्य तरीके प्रदान करता है। सरकार के लिए सिफारिशों में सूचना प्रदान करने, समुदायों के बीच विश्वास बनाने और वैक्सीन को अधिक आसानी से सुलभ बनाने की आवश्यकता शामिल है। एनजीओ समुदायों को संगठित करने, टीकों के बारे में मिथकों को दूर करने और आरोग्य सेतु ऐप और वैक्सीन केंद्रों तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही नियोक्ता इसे अनिवार्य बनाकर और पहुंच को सुविधाजनक बनाकर श्रमिकों को टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। --आईएएनएस एकेके/एएनएम

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