जनहित याचिकाओं पर न्यायालय का कड़ा रुख

जनहित याचिकाओं पर न्यायालय का कड़ा रुख
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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा फिल्म अभिनेत्री जूही चावला पर कोर्ट द्वारा बीस लाख रुपए का जुर्माना लगाना हो या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डीवाय चन्द्रचूड़ द्वारा पहले से निपटाए जा चुके केस की दुबारा सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी, अपने आप में गंभीर है। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. खेहर ने सस्ती लोकप्रियता के नाम पर न्यायालयों के दुरुपयोग पर कड़ी आपत्ति जताते हुए संदेश दिया था। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 5 जी मामले में जूही चावला द्वारा दायर याचिका पर गहरी आपत्ति व्यक्त करते हुए इसे सस्ती लोकप्रियता करार दिया। इसमें दो राय नहीं कि इस तरह की प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण होने के साथ ही न्यायालयों पर बढ़ते बोझ को कम करने में सहायक होगी। जस्टिस खेहर ने एक जनहित याचिका पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अमृतधारा नहीं जिसका हर बीमारी के इलाज में उपयोग किया जा सके। दरअसल पिछले कुछ समय से छोटी से छोटी समस्या को भी जनहित याचिका के रुप में न्यायालयों में दाखिल कर उस पर न्या य मांगा जाने लगा है। याचिकाकर्ता को जहां इससे सुर्खियां बटोरने का मौका मिल जाता है वहीं कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के काम में अनावश्यक रुप से न्यायालयों का दखल देखे जाना लगता है। इसके साथ ही इस तरह की याचिकाओं के चलते न्यायालयों पर काम का बोझ भी बढ़ता है। सर्वोच्च न्यायालय कई बार इस तरह की बेबुनियाद सस्ती लोकप्रियता या छिपे हुए एजेंडे को लेकर दायर याचिकाओं पर कड़ी टिप्पणी की जा चुकी है। उदाहरण के लिए भारत का नाम बदल कर हिन्दुस्तान करने, अरब सागर का नाम सिन्धु सागर करने, राष्ट्र्गान या इसी तरह के अन्य विषयों को लेकर जनहित याचिकाएं लगाकर सुर्खियां बटोरने वालों की कमी नहीं है। दरअसल 80 के दशक में पवित्र उद्देश्य से न्यायमूर्ति पीएन भगवती ने साधनहीन गरीब न्याय से वंचित लोगों को न्याय दिलाने के लिए पोस्टकार्ड को ही याचिका के तौर पर स्वीकार कर नई शुरुआत की। राजस्थान में भी तत्कालीन न्यायमूर्ति गुमान मल लोढ़ा ने सुधार की इस कड़ी में बड़ा नाम कमाया पर समय के साथ कुछ लोगों ने इसे हथियार के रुप में उपयोग करना आरंभ कर दिया। त्वरित न्याय और न्यायालयों में न्याय के बोझ को कम करने की उद्देश्य से शुरू की गई इस व्यवस्था का लोगों ने नाम कमाने और कुछ लोगों द्वारा तो अन्य उद्देश्यों को भी पूरा करने के लिए इसका उपयोग किया जाने लगा। जूही चावला का हालिया केस भी इसका एक उदाहरण है। यह सही है कि जनहित याचिकाओं के लगाने का प्रावधान समाज के व्यापक हित में किया गया था पर आज इसका उपयोग एक सीमा से अधिक होने लगा है। मध्य प्रदेश, उडीसा और उत्तरप्रदेश की एंबुलेंस नहीं मिलने की घटना को लेकर जनहित याचिका के रुप में सर्वोच्च़ न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर जस्टिस खेहर को टिप्पणी करने को मजबूर होना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों द्वारा इस तरह की याचिकाओं को लेकर जो सख्त कदम उठाने शुरू किए हैं उसकी सराहना की जानी चाहिए। इसकी तारीफ इस मायने में की जानी चाहिए कि प्रशासन को भी तो काम करने दिया जाना चाहिए। इस तरह की याचिकाओं के चलते जहां एक और न्यायालयों का दैनिक काम बाधित होता है, काम का बोझ बढ़ता है, वहीं सरकार के संबंधित विभाग भी कुछ करने की जगह इन याचिकाओं के लिए जवाब दावे पेश करने में अपना समय जाया करने लगते हैं। इसके अलावा प्रशासनिक अमला भी न्यायालय के निर्देशों की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धर बैठ जाता है। इसका प्रतिकूल परिणाम ही प्राप्त होता है और जिस तरह से व्यवस्था में सुधार होना चाहिए वह धरा ही रह जाता है। इस तरह की पहल राज्यों के उच्च न्यायालयों में भी होनी चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय की जूही चावला के केस में टिप्पणी और सजा इस दिशा में बढ़ता कदम माना जाना चाहिए। दरअसल इस तरह के मुद्दों को मीडिया खासतौर से इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में ज्यादा तवज्जो देते हुए प्रसारित करता हैं वहीं सोशियल मीडिया पर भी क्रिया प्रतिक्रिया का दौर चल पड़ता है। अब इसे यों भी देखा जा सकता है कि जूही चावला के पास पैसों की कोई कमी नहीं है और जिस तरह से 5 जी मामलें में न्यायालय द्वारा 20 लाख का जुर्माना और कड़ी टिप्पणी की गई है उससे एक बात तो साफ हो गई है कि जूही चावला ने सभी टीवी चैनलों और अखबारों में सुर्खियां तो बटोर ही ली। हमें न्यायालय के हालिया टिप्पणी और सजा को इस मायने में भी देखना होगा कि आज देश के न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। एक मोटे अनुमान के अनुसार कोरोना से पहले देश के उच्च न्यायालयों में 49 लाख से अधिक मुकदमें दर्ज है। इसी तरह से नीचे की अदालतों में करीब पोने 3 करोड़ मुकदमें विचाराधीन है। वर्ष 2014 में विधि आयोग के प्रतिवेदन में 10 लाख की आबादी पर 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी। यह तो दूर की बात है पर इस समय तो देश के उच्च न्यायालयों में आधे से कुछ ही कम पद न्यायाधीशों के खाली है। इसे अलावा नीचली अदालतों में भी रिक्त पद चल रहे है। देश के न्याय के मंदिरों में काम का बोझ अत्यधिक है और यही कारण है इस देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की भावुकता मानने के स्थान पर स्थिति की गंभीरता और उनके दर्द को समझना होगा। अब तो देश के सभी राज्यों में लोक अदालतों का सिलसिला भी चल निकला है। प्रतिवर्ष इन लोक अदालतों में लाखों प्रकरण आपसी समझाइश से निपटाए जा रहे हैं। फिर हमें देखना यह भी है कि समूची दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। सभी स्थानों पर काम प्रभावित हो रहे हैं, लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट आ गया है। न्यायालयों द्वारा भी वर्चुअल सुनवाई की जाने लगी है उस दौर में इस तरह की याचिकाओं के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। न्यायालयों में बढ़ते बोझ को कम करने के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका को साझा प्रयास करने होंगे। सरकार और प्रशासन को भी अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। जब जनहित से जुड़े मुद्दों पर मीडिया ट्रायल हो जाता है तो ऐसे में प्रशासन को भी आगे बढ़कर मीडिया या अन्य माध्यमों से सामने आने वाले जनहित के मुद्दों का हल प्राथमिकता से निकालना चाहिए। आखिर सरकार है किसके लिए, सरकार जब आमजन के लिए ही है तो फिर ऐसे प्रकरणों के सामने आते ही संबंधित प्रशासनिक कारिंदों को सक्रिय हो जाना चाहिए। इससे एक और जहां सरकार की संवेदनशीलता सामने आती है वहीं भविष्य के लिए सुधार भी हो जाता है। अनावश्यक या कम महत्व के मुद्दों को लेकर सरकार और न्यायालयों का समय जाया नहीं करना चाहिए। याचिकाकर्ताओं को यह समझना होगा कि यदि सबकुछ न्यायालय के निर्देशों पर ही होने लगेगा तो फिर प्रशासनिक व्यवस्था रहेगी ही नहीं। न्यायपतियों की टिप्पणी की इस मायने में सराहना की जानी चाहिए कि वे न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं और व्यर्थ की याचिकाओं को हतोत्साहित कर देश को सकारात्मक संदेश दे रहे हैं। वकीलों के संगठनों को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)