एक व्यक्ति की मेहनत और आजादी के बाद लोगों को अपने गांव में ही मिला पानी

एक व्यक्ति की मेहनत और आजादी के बाद लोगों को अपने गांव में ही मिला पानी
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महाराष्ट्र के रामदास फोफले ने लॉकडाउन में खोदा 20 फिट गहरा कुंआ मुंबई, 20 जून (हि. स.)। बिहार के दशरथ मांझी ने बड़े पहाड़ को कांटकर गांव वालों के लिए रास्ता बना दिया था और अब महाराष्ट्र के रामदास फोफले ने कुंआ खोदकर गांव वालों को पानी मुहैया करवा दिया है।वासिम जिले के जामखेड़ा गांव के निवासी रामदास फोफले ने अपनी पत्नी के साथ 22 दिनों तक कड़ी मेहनत कर 20 फिट गहरा कुंआ खोदा है। रामदास के खोदे कुंए से अब गांववालों को उनके ही गांव में पीने का शुद्ध पानी मिलने लगा है। इस कुंए को पक्का करने के लिए उन्होंने लोगों से उधार लेकर कंक्रीट का भी काम किया। गांव में ही कुंआ हो जाने से गांववाले जहां खुश हैं और रामदास व उनके परिवार के सकारात्मक काम को सलाम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि वासिम जिले में पानी की समस्या आजादी के पहले से ही है। आजादी के बाद भी इस जिले की पानी की समस्या को खत्म करने का प्रयास नहीं किया गया। सरकारे बनीं ,बिगड़ीं। जनप्रतिनिधि हर पांच साल बदलते रहे, लेकिन वासिम जिले के जामखेड़ा गांव तक पानी की आपूर्ति का ध्यान किसी को नहीं आया। नतीजन गांववालों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था। गांववासी पानी के लिए तरस रहे थे। आजादी के 70 साल बाद भी गांववालों की हालत पानी न होने से खराब थी और गांव की महिलाओं की प्राथमिकता कई किलोमीटर दूर से पानी लाने की ही रहती थी। इसी गांव के रामदास फोफले गुजरात स्थित सूरत में काम करते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से वे अपने गांव आ गए। सूरत से अपने गांव आते समय अपने साथ कुछ साड़ियां लाए थे, जिसे बेचकर कुछ दिन गुजारा करते रहे। जब वह भी काम खत्म हो गया तो उन्हें अचानक पानी की समस्या ध्यान में आई और उन्होंने गांव में ही कुंआ खोदने का दृढ़ निश्चय किया। फिर क्याथा? सिर्फ फावड़े की मदद से रामदास ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 20 फिट गहरा कुंआ खोद डाला। इस कुंए को धंसने से बचाने के लिए इसको पक्का करना भी जरूरी था। इसके लिए उन्होंने अपने मित्रों से मदद ली और कुंआ पक्का भी हो गया। अब इस कुंए का पानी गांववाले भी पी रहे हैं । रामदास के प्रयास से गांववालों की वर्षों पुरानी पानी की समस्या हल हुई है,इसलिए गांववाले उनकी मेहनत को सलाम कर रहे हैं। रामदास के अनुसार कुंआ खोदते समय वे बीमार हो गए थे, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी पत्नी व 12 वर्षीय बेटे के सहयोग से कुंए को खोदने में सफल रहे हैं। उन्हें खुशी है कि गांववाले अपने ही गांव का पानी पी रहे हैं। इसलिए रामदास फोफले को महाराष्ट्र का दशरथ मांझी भी कहा जाने लगा है। हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर