बढ़ते कोरोना संकट में अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत

बढ़ते कोरोना संकट में अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत
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अनिल निगम देश में कोरोना महामारी के बढ़ते ग्राफ ने एकबार फिर लोगों को डराना शुरू कर दिया है। विभिन्न राज्यों के महानगरों और नगरों में नाइट कर्फ्यू एवं लॉकडाउन के चलते मजदूरों में दहशत का माहौल बन रहा है। वे अपने घरों की ओर पलायन करने लगे हैं। पिछले वर्ष लगाए गए लॉकडाउन के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पांच-सात साल पीछे चली गई थी। उसका खामियाजा देश आजतक भुगत रहा है। आज हमारी स्थिति तब ज्यादा खराब हो रही, जबकि हमारे पास लड़ने का अनुभव और वैक्सीन दोनों हैं। बावजूद इसके हम बदतर स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यों के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि महामारी का समाधान लॉकडाउन नहीं है, फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब स्थिति बेकाबू होने लगेगी तो इसका अंतिम समाधान लॉकडाउन ही है। और अगर ऐसा होता है तो देश की अर्थव्यवस्था पुन: चौपट हो जाएगी। सवाल यह नहीं है कि संपूर्ण देश में लॉकडाउन होगा अथवा नहीं। अहम प्रश्न यह है कि इसबार संक्रमण की लहर सरपट क्यों दौड़ रही है? क्या कोरोना संक्रमण की दर बढ़ने के लिए केवल नया स्ट्रेन जिम्मेदार है? संक्रमण बढ़ने के लिए और कौन से कारक जिम्मेदार हैं? यह तय है कि अगर हम अब भी नहीं चेते तो भारत में सिर्फ संक्रमण और मौतों का आंकड़ा ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को एकबार फिर बहुत बड़ा पलीता लग जाएगा। आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों ने अपने हालिया शोध में कहा है कि वायरस का नया वैरिएंट अथवा स्ट्रेन आ चुका है। इसके मामले दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में पाए गए हैं। ब्रिटेन और अफ्रीका से आए नए स्ट्रेन का फैलाव बहुत तेजी से हो रहा है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि देश में सक्रिय वायरस में म्युटेशन के चलते लगातार उसमें बदलाव चल रहा है। इसके अलावा पूर्व में कोरोना से संक्रमित हो चुके 30 फीसदी लोगों में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज समाप्त हो चुकी है, इसलिए एकबार संक्रमित हो चुके इन लोगों को दोबारा कोरोना हो सकता है। यही नहीं, कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन भी लोगों को कोरोना की चपेट में तेजी से ले रहा। जॉन हॉपकिंस मेडिसिन के विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर के लिए लोगों का बर्ताव जिम्मेदार है। पिछले वर्ष के लॉकडाउन ने भारत में कोविड-19 महामारी की रफ्तार धीमी कर दी थी। लोगों ने भी कोरोना प्रोटोकॉल को अपनाते हुए मास्क पहने, दो गज की दूरी बनाई और नियमित तौर पर हाथों को सफाई करते रहे। इसके चलते हम कोरोना से निपटने में कारगर रहे। लेकिन यह भी सच है कि वैक्सीन आने और कोरोना संक्रमण के आंकड़ों के कम होने के बाद लोगों ने मास्क से दूरी बना ली और फिजीकल डिस्टैंसिंग को ताक पर रख दिया। शादी-विवाह और अन्य सामाजिक समारोहों में असीमित संख्या और मानकों के पालन में लापरवाही के चलते स्थिति खराब होने लगी। ऐसा नहीं है कि इसके लिए सिर्फ आम आदमी ही जिम्मेदार है। पहले किसान आंदोलनों में बिना मास्क के आंदोलनकारी और बाद में विभिन्न राज्यों में चुनाव के दौरान होने वाली रैलियों को देखकर ऐसा लगा ही नहीं कि किसी नेता या जनता को कोरोना का भय है। इस समय देशभर में स्थिति खराब हो रही है लेकिन बाजार, मंदिर और चुनावी रैलियों में देखकर नहीं लगता कि लोगों को इस महामारी की गंभीरता के बारे में कुछ समझ आ रहा है। पिछले साल जब देश में लॉकडाउन किया गया तो यातायात अचानक बंद होने के चलते सर्वाधिक परेशानी प्रवासी मजदूरों को झेलनी पड़ी थी। मजदूरों को जब खाने-पीने की परेशानी हुई तो वे पैदल अपने घरों के लिए निकल पड़े थे। लेकिन जब फैक्टरी शुरू हुई तो मजदूर काफी मशक्कत के बाद शहरों को वापस लौटे थे। अब एकबार फिर कोरोना के मामले बढ़ने पर सख्ती शुरू हुई तो प्रवासी मजदूरों ने लॉकडाउन के भय से पलायन शुरू कर दिया है। जैसे-जैसे प्रवासी मजदूर अपने घरों को जा रहे हैं, उद्यमियों के माथे पर बल पड़ना शुरू हो गए हैं। निस्संदेह, अर्थव्यवस्था की हालत को देखते हुए सरकार देश में फिर से लॉकडाउन की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री लॉकडाउन करने से परहेज कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि अगर महामारी का संक्रमण ऐसे ही तेजी से दौड़ता रहा तो सरकारों के पास लॉकडाउन के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा। यह बात भी सोलह आने खरी है कि यदि देश में एक-दो महीने का लॉकडाउन करना पड़ा तो देश की अर्थव्यवस्था एकबार फिर पांच से सात साल पीछे चली जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)