​एलएसी पर शहीद नइमा तेनजिंग का अंतिम संस्कार
​एलएसी पर शहीद नइमा तेनजिंग का अंतिम संस्कार
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​एलएसी पर शहीद नइमा तेनजिंग का अंतिम संस्कार

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-तिब्बतियों ने तिरंगा लेकर भारत के साथ एकजुटता का अद्भुत संदेश दिया -रास्ते भर लगे 'भारत माता की जय' और 'विकास रेजिमेंट जिंदाबाद' के नारे नई दिल्ली, 07 सितम्बर (हि.स.)। पूर्वी लद्दाख में चीन सीमा पर 'ऑपरेशन ब्लैकटॉप' के दौरान 31 अगस्त को शहीद हुए भारतीय सेना की खुफिया बटालियन 'विकास रेजिमेंट' के कंपनी लीडर नइमा तेनजिंग का अंतिम संस्कार सोमवार को लेह की तिब्बती बस्ती में बौद्ध मन्त्रों के बीच पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। अंतिम संस्कार के समय तेनजिंग को गन की सलामी भी दी गई। इस मौके पर शामिल हुए हजारों तिब्बतियों ने अपने समुदाय के झंडे के साथ तिरंगा लेकर भारत के साथ एकजुटता का अद्भुत संदेश दिया। भारतीय सेना के अधीन स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) इकाई का गठन सन 1962 में चीन से युद्ध के बाद किया गया था। इस फ़ोर्स के गठन में बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा के बड़े भाई ग्यालो थोंडुप ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने फोर्स में उन शरणार्थियों में से तिब्बतियों को भर्ती किया जो 1959 के बाद भारत आए थे। इसके शुरुआती सैनिकों में से एक रैडग न्गावांग भी थे जो दलाई लामा के भारत आने पर उनके साथ अंगरक्षक के रूप में आये थे। उस समय उनके पास छह-सात हजार तिब्बती थे, जो वापस तिब्बत जाने और चीनी कब्जे से मुक्त कराना चाहते थे। भर्तियों का एक समूह विभिन्न तिब्बती बस्तियों में गया और हर उस युवा तिब्बती को इस सेना में भर्ती किया जो तिब्बत के लिए लड़ने के लिए उत्सुक था लेकिन यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं हुआ। इसी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) को बाद में भारतीय सेना की खुफिया बटालियन के तौर पर 'विकास रेजिमेंट' का नाम देकर जोड़ा गया। अभी तक यह इकाई उत्तराखंड के चकराता में हिमालय के पहाड़ी इलाकों में गुप्त ऑपरेशन के लिए तैनात थी। भारत ने पहली बार अपने इस गुप्त तिब्बती अर्धसैनिक बल को लद्दाख में एलएसी पर तैनात किया था। 29/30 अगस्त की रात को जब चीनी सैनिक थाकुंग चोटी पर घुसपैठ करने आये थे तो इसी इकाई के लड़ाकों की उन्हें खदेड़ने में अहम भूमिका रही थी। इसके बाद सेना ने पैगॉन्ग झील के दक्षिणी किनारे पर थाकुंग चोटी से लेकर 3 किमी. क्षेत्र में रेज़ांग ला तक फैली रणनीतिक चोटियों ब्लैक टॉप, हेलमेट, मागर और गुरुंग हिल्स को अपने कब्जे में लेकर इन पर नये सिरे से सैनिकों की तैनाती की। इसी दौरान स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) कंपनी के लेफ्टिनेंट कमांडर न्यामा तेनज़िन की 31 अगस्त को उस समय जान चली गई जब उन्होंने चुशुल के गुरुंग हिल में एक बारूदी सुरंग पर कदम रखा। बताया गया है कि यह बारूदी सुरंग 1962 में युद्ध के दौरान बिछाई गई थी जो अभी सक्रिय थी। भारतीय सेना ने उनकी मौत के बारे में प्रेस स्टेटमेंट जारी किया। इसके कुछ घंटों बाद लद्दाख में तिब्बती समुदाय के लोग '7 विकास' बटालियन के सैनिक को श्रद्धांजलि देने के लिए एक साथ आए। तेनज़िन का शव लद्दाख के लेह में सोनमलिंग तिब्बती शरणार्थी बस्ती में एक ट्रक से लाया गया था। ट्रक के पीछे वाहनों के काफिले में चल रहे लोग रास्ते भर 'भारत माता की जय', 'विकास रेजिमेंट जिंदाबाद' और 'तिब्बत देश की जय' के नारे लगाते रहे। अंतिम संस्कार से पहले राजकीय सम्मान देने के लिए सेना ने मातमी धुन बजाई और गन फायर करके सलामी दी। इसके बाद बौद्ध धर्म के रीति-रिवाजों से बौद्ध मन्त्रों के बीच शहीद को मुखाग्नि दी गई। इस मौके पर शामिल हुए हजारों तिब्बतियों ने अपने समुदाय के झंडे के साथ तिरंगा लेकर भारत के साथ एकजुटता का अद्भुत संदेश दिया जिन्होंने इस देश को अपना घर बना लिया है और इसे कई तरीकों से समृद्ध किया है। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीत-hindusthansamachar.in