सरकारी सिस्टम के आगे हार चुके हैं कारगिल शहीदों के परिवार

सरकारी सिस्टम के आगे हार चुके हैं कारगिल शहीदों के परिवार
सरकारी सिस्टम के आगे हार चुके हैं कारगिल शहीदों के परिवार

झुंझुनू, 25 जुलाई (हि.स.)। कारगिल युद्ध के दो दशक बीत जाने के बाद आज भी शहीद के परिवार अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं और सरकारी सिस्टम के आगे हार भी मान चुके है। बात झुंझुनू जिले के बासमाना के शहीद हवासिंह के परिवार की करते है। सरकार ने पहले ही परिवार को पूरा पैकेज नहीं दिया। फिर जो दिया वो भी छीन लिया। शहीद परिवार से उनके जीवन यापन के लिए दी गई सुविधाओं को छीनने वाली यह दास्तां आपको शर्मशार कर देगी। बासमाना गांव उस दिन गौरवान्वित हुआ जब यहां का लाडला हवासिंह कारगिल युद्ध में शहीद हो गया। जब हवासिंह का शव तिरंगे में लिपटा हुआ गांव पहुंचा तो सभी की आंखें नम थी। शहीद का परिवार आज भी अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रहा है और सरकारी सिस्टम के आगे ना केवल लाचार है, बल्कि अब हारकर अपने घर भी बैठ गया है। वीरांगना मनोज देवी एमए बीएड तक पढ़ी होने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली। परिवार का जीवन यापन करने के लिए जो पेट्रोल पंप मिला। वो भी कुछ साल पहले कंपनी ने धोखे से वापस ले लिया। अब केवल दफ्तरों के चक्कर लगाने के अलावा परिवार के पास कुछ नहीं है। परिजन बताते है कि उन्होंने सरकारी सिस्टम में अपनी सुविधाओं को दम तोड़ते देखा है। अब वे खुद हारकर बैठ गए है और अब उन्हें उम्मीद भी कम है कि उन्हें जो पैकेज मिलना था और जो मिला था। वो उन्हें मिलेगा। शहीद के भाई रामकरण ने बताया कि जिस दिन उनका भाई हवासिंह शहीद हुआ था। वो दिन आज भी याद आता है तो उनकी आंखें नम हो जाती है। पति की शहादत से दो साल पहले सुहागन हुई शहीद वीरांगना को भी अपनी सुहाग की निशानियां उतारनी पड़ी। लेकिन जो सम्मान मिला और जो गर्व हुआ। वो आज भी कायम भी है। बासमाना फौजियों का गांव भी है। यहां के पूर्व फौजी बाबूलाल ने बताया कि हवासिंह भी उम्र में छोटा था। लेकिन देश के लिए उसके जज्बात कहीं पर भी छोटे नहीं थे। होनहार था, जिसको शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए जिले के सीथल गांव के शहीद हवलदार मनीराम की शहादत को दो दशक से ज्यादा का समय बीत गया लेकिन अभी भी शहादत का सम्मान देने में सरकार कोई ज्यादा चिंतित नजर नहीं आई है। शहीद के दो बेटें नौकरी का इंतजार कर रहे है। तो वहीं जिस स्कूल का नामकरण शहीद के नाम से किया गया। वो भी अब बंद हो गई है। सीथल के शहीद हवलदार मनीराम महला, जब 1999 में कारगिल में आपरेशन विजय चल रहा था तो दुश्मनों से लोहा लेते हुए तीन जुलाई 1999 को शहीद हो गए और शहादत के तीन दिन बाद 6 जुलाई 1999 को उनका शव उनके गांव पहुंचा। ग्रामीण बताते है कि 1999 में जब गांव में पहली बार किसी शहीद का शव आया उस वक्त का जो गांव का माहौल था। वो आज भी रोंगटे खड़ा करता है और शहीद के प्रति सम्मान के जज्बे को याद करता तो बरबस ही मनीराम को सभी का सेल्यूट करने का मन होता है। शहीद परिवारों को सम्मान देने की बात तो बड़ी बड़ी होती है। लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद भी मनीराम के परिवार को अभी भी सम्मान नहीं मिला है। जो सम्मान मिला, वो भी सरकारी सिस्टम में वापिस हो चुका है। शहीद वीरांगना मुन्नीदेवी ने बताया कि जब उनके पति शहीद हुए थे। तो उन्हें बताया गया था कि उनके बेटों में से एक को सरकारी नौकरी मिलेगी। लेकिन सरकार बदली तो तो नियम भी बदल दिया गया। अब सरकारी नौकरी के लिए वे दो दशक से चक्कर लगा रही है। इसके अलावा गांव की जिस स्कूल का नामकरण उनके पति के नाम से किया गया था। वो भी मर्ज कर दी गई है। ऐसे में उनके सम्मान को ठेस पहुंची है। गांव के लोगों में आज भी ना केवल शहीद का सम्मान, बल्कि खुद शहीद भी जिंदा है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है जिस तरह के शहीद मनीराम थे। उनके सम्मान में अब सरकार का सलीका सही नहीं है। क्योंकि शहीद का सम्मान ऐसा हो जो स्थायी हो। अब स्कूल का नामकरण करने और शहीद परिवार को सरकारी नौकरी का फायदा देने की मांग की है। शहीद मनीराम ने द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लोहा लिया और वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन अब उनका परिवार सरकारी सिस्टम से लोहा ले रहा है लेकिन ना तो शासन और ना ही प्रशासन इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। जो वास्तव में शहादत का अपमान है। ना केवल हवासिंहव मनीराम बल्कि दर्जनों कारगिल शहीदों के परिवारों को मिलने वाली सरकारी नौकरियां लाल फीताशाही में दब गई है। कुछेक को मिली और कुछेक रह गए। लेकिन सरकार आई और गई, नेता आए और गए। आश्वासन सभी नहीं दिए। लेकिन इनके दुखों को मरहम लगाने का काम किसी ने नहीं किया। हिन्दुस्थान समाचार/रमेश सर्राफ/ईश्वर/सुनीत-hindusthansamachar.in

अन्य खबरें

No stories found.