समलैंगिक विवाह के मसले पर केंद्र को नोटिस, हाई कोर्ट ने कहा: यह नागरिक के अधिकार का मामला
समलैंगिक विवाह के मसले पर केंद्र को नोटिस, हाई कोर्ट ने कहा: यह नागरिक के अधिकार का मामला
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समलैंगिक विवाह के मसले पर केंद्र को नोटिस, हाई कोर्ट ने कहा: यह नागरिक के अधिकार का मामला

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नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (हि.स.)। दिल्ली हाई कोर्ट ने समान लिंग वाले जोड़ों को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने का अधिकार देने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की अध्यक्षता वाली बेंच ने चार हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 8 जनवरी को होगी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि पूर्वी दिल्ली के एसडीएम ने उनकी शादी की अनुमति नहीं दी। यहां तक कि याचिकाकर्ताओं को एसडीएम के दफ्तर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। उन्होंने कहा कि नवतेज जोहार केस में समान लिंग वाले जोड़ों की गरिमा और निजता के अधिकार की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि पूर्वी दिल्ली के एसडीएम ने उनके अधिकारों का उल्लंघन किया है। गुरुस्वामी ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने फॉरेन मैरिज एक्ट के तहत कांसुलेट से भी शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया था लेकिन वहां भी अनुमति नहीं दी गई। कांसुलेट ने कहा कि यह शादी दिशा-निर्देशों के मुताबिक नहीं हो सकती है। कांसुलेट जनरल को नवतेज जोहार के फैसले के बारे में भी बताया गया लेकिन नवतेज जोहार का फैसला शादी के वर्तमान कानूनों पर लागू नहीं होता है। गुरुस्वामी ने कहा कि हाईकोर्ट ने हमेशा ही भेदभाव से बचाव किया है। याचिका डॉक्टर कविता अरोड़ा और अंकिता खन्ना ने दायर की है। दोनों पिछले आठ साल से एकसाथ रहती आ रही हैं। डॉक्टर कविता अरोड़ा पेशे से साइक्रिएटिस्ट हैं जबकि अंकिता खन्ना पेशे से थेरेपिस्ट हैं। दोनों मेंटल हेल्थ एंड लर्निंग डिसेबिलिटीज फॉर चिल्ड्रेन एंड यंग एडल्ट्स नामक क्लीनिक के लिए एक टीम का हिस्सा हैं। दोनों ने मांग की है कि दोनों की शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत करने का दिशा-निर्देश दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के मैरिज अफसर को दिया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अरुंधति काटजू, गोविंद मनोहरनॉ, सुरभि धर और मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि दोनों की शादी होने से न केवल एक संबंध बनेगा बल्कि दोनों परिवार एकसाथ होंगे लेकिन बिना शादी हुए दोनों कानून के मुताबिक अलग-अलग हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि संविधान की धारा 21 अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने की छूट देता है। ये अधिकार समान लिंग वाले जोड़े पर भी वैसे ही लागू होता है जैसे असमान लिंग वाले जोड़े पर। यह अधिकार केवल शादी से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि यह गरिमा और बराबरी से साथ जीने के अधिकार का भी मामला है। हिन्दुस्थान समाचार/ संजय/बच्चन-hindusthansamachar.in