लोकभाषा से राजभाषा बनी हिन्दी
लोकभाषा से राजभाषा बनी हिन्दी
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लोकभाषा से राजभाषा बनी हिन्दी

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हिन्दी दिवस 14 सितम्बर पर विशेष डॉ. रामकिशोर उपाध्याय हिन्दी देश में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। भारत में राजनीतिक सत्ता परिवर्तित होने के साथ-साथ राज-काज की भाषा तो परिवर्तित होती रहीं किन्तु साधु-संतों, भक्तों और कवियों के हृदय से यह स्रोतस्विनी निरंरत निर्झारित और निःसृत होती रही है। यहाँ के जनमानस की भाषा संस्कृत, पालि, प्राकृत से होती हुई आज की हिन्दी तक एक सुदीर्घ परंपरा में चलती चली आ रही है। मुगलकाल में जब शासकों की भाषा फ़ारसी और धर्म इस्लाम हो गया तब अहिन्दी संत-कवियों ने चाहे वे दक्षिण के वल्लभाचार्य जी रहे हों या असम के शंकर देव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर हों या गुजरात के नरसी मेहता जी, सभी ने अपनी रचनाओं का माध्यम हिन्दी को बनाकर भारत की संस्कृति एवं अध्यात्मिक चेतना को लोकजीवन में उतारने का कार्य किया। सूर, तुलसी, मीरा आदि ने भारतीय समाज को स्वधर्म एवं स्वभाषा से जोड़े रखा। उस समय राज-काज भले फ़ारसी में संचालित होने लगा किन्तु साहित्य सृजन लोकभाषाओं में ही होता रहा। मुसलमान सूफी संत भी हिन्दी में पद रचना करते रहे। अँगरेजों के आने से पूर्व उस समय की हिन्दी को लेकर धर्म के आधार पर कोई उग्र या उद्धृत करने योग्य विरोध नहीं था। सन 1835 में अँगरेजों ने भारत में अँगरेजी को शिक्षा का माध्यम घोषित कर विद्यालय खोलने प्रारंभ किये। कार्यालयों में मुगलकाल की फ़ारसी के स्थान पर हिन्दी में कार्य करने के उद्देश्य से 29 जुलाई 1836 को आदेश प्रसारित किया। इसमें कहा गया कि फ़ारसी कठिन भाषा होने के कारण आम जनता समझ नहीं पाती इसीलिये न्यायालयों में कामकाज जनभाषा हिन्दी में ही किया जाए। आवेदन भले फ़ारसी लिपि में लिखा हो या देवनागरी में किन्तु भाषा हिन्दी ही होनी चाहिए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के इतिहास में लिखते हैं “खेद की बात है कि यह उचित व्यवस्था चलने न पाई। मुसलमानों की ओर से इस बात का घोर यत्न हुआ कि दफ़्तरों में हिन्दी रहने न पाए, उर्दू चलाई जाए।” यह विरोध इतना उग्र और सतत चला कि एक वर्ष के भीतर कंपनी सरकार ने अपना आदेश वापस लेकर उर्दू संयुक्त प्रान्त के राजकाज की भाषा बना दी। उर्दू के कार्यालयीन भाषा (ऑफिशियल लेंगुएज) हो जाने के कारण नौकरी, रोजगार, सरकार और समाज में पढ़े-लिखे लोगों में उर्दू का बोलबाला हो गाया। इस प्रकार देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि और हिन्दी के स्थान पर उर्दू को बलात देश-भाषा बना दिया गया। पेट पालने के लिए और समाज में सम्मान पाने के लिए लोग उर्दू सीखने पर विवश हुए। इस दुर्दशा का वर्णन बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने इन शब्दों में किया “जो लोग नागरी अक्षर सीखते थे फ़ारसी अक्षर सीखने पर विवश हुए और हिन्दी भाषा हिन्दी न रहकर उर्दू बन गई। हिन्दी उस भाषा का नाम रहा जो टूटी-फूटी चाल पर देवनागरी में लिखी जाती थी |” (रा.च.शुक्ल हिन्दी साहित्य का इतिहास प्र.क्र. 429-30) जिस प्रकार आज अँगरेजी तथाकथित सभ्यता का प्रतीक बना दी गई है उसी प्रकार परतंत्र होते हुए भी देश में फ़ारसी भाषा पढ़े-लिखे होने का प्रतीक बना दी गई | हिन्दी का विरोध यहीं तक सीमित न रहा, अँगरेजों द्वारा जब बर्नाकुलर भाषाओं में हिन्दी को भी विद्यालयों में पढ़ाने की बात की गई तो कुछ लोगों ने हिन्दी को गँवारू भाषा कहकर उसे विद्यालयों में पढ़ाए जाने का विरोध किया। विद्यालयों, कार्यालयों एवं न्यायालयों से बहिस्कृत कराए जाने के बाद भी हिन्दी ने हार नहीं मानी। घोर अपमान व उपेक्षा झेलते हुए हिन्दी में आस्था रखने वाले विद्वानों ने हिन्दी में समाचार पत्र निकाले, पद्य रचे और अपरिमित गद्य साहित्य लिखकर हिन्दी को समृद्ध भाषा बनाये रखा। भारतेंदु हरिश्चन्द्र और पंजाब के बाबू नवीन चन्द्र राय जैसे महापुरुषों ने अतुलनीय योगदान दिया। भारतेंदु जी अपने प्रत्येक व्याख्यान से पूर्व इस पंक्ति को दोहराते थे- “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।'' श्रद्धेय मदन मोहन मालवीय जी ने ‘अदालती लिपि एवं प्राइमरी शिक्षा’ नामक पुस्तक लिखकर अँगरेजों को हिन्दी के बहिष्कार से होने वाले दुष्परिणामों से अवगत कराया। मालवीय जी एवं नागरी प्रचारिणी सभा के अथक प्रयासों एवं वर्षों के संघर्ष के पश्चात् देवनागरी लिपि में हिन्दी को कार्यालयों में प्रवेश मिल पाया। जब हिन्दी भाषी लोग हिन्दी में व्याख्यान देकर प्रतिष्ठा और जन सम्मान प्राप्त करने लगे तब देश में इस बात पर विवाद होने लगा कि भारत की “देसी ज़बान” किसे माना जाए- हिन्दी अथवा उर्दू को? 1947 में देश का विभाजन होने के पश्चात् जो लोग भारत पर फ़ारसी लादना चाहते थे उन्होंने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बना लिया। यहाँ भारत में 14 सितम्बर 1949 के दिन हिन्दी को संवैधानिक रूप से भारत गणराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। इसीलिये यह दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। विडंबना यह है कि स्वतंत्रता पूर्व जो अहिन्दी भाषी नेता उर्दू के स्थान पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की बात करते थे स्वतंत्रता पश्चात् उनके स्वर भी बदलने लगे। हिन्दी वालों में भी दो मत थे, नेहरू जी और अबुल कलाम आजाद फ़ारसी एवं देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी जो वस्तुतः अरबी-फ़ारसी से लदी हुई उर्दू ही थी जिसे हिन्दी के नाम पर लाना चाहते थे तो दूसरा गुट साधु हिन्दी या शुद्ध हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा के रूप में चाहता था। अहिन्दी भाषी नेताओं की असहति भी धीरे-धीरे विवाद में बदलने लगी तब ‘मुंशी-आयंगार समित’ द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर राजभाषा बनाये जाने पर सहमति बनी। इस प्रकार हिन्दी राजभाषा बनाई गई और अँगरेजी मात्र पंद्रह वर्षों के लिए उसकी सहायक राजभाषा के रूप में स्वीकार की गई। दुःख की बात है कि जिस अँगरेजी को पन्द्रह वर्षों के लिए सहायक भाषा रूप में स्वीकार किया गया था वह भारत में शासन-प्रशासन और रोज़गार की मुख्य भाषा बन गई। जिस हिन्दी ने सन 1900 से लेकर 1947 तक स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया और बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, वीर सावरकर, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि महापुरुषों ने हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन की राष्ट्रीय भाषा हिन्दी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश की राष्ट्रभाषा बनने के लिए राजनीतिक विरोधों का सामना कर रही है। क्षेत्रीय संकीर्णताओं और सत्ता प्राप्ति के निहित स्वार्थों के कारण हिन्दी को लेकर विरोध किया जाता है। कुछ लोगों के विरोध के कारण हम एक ऐसे राष्ट्र बन गए हैं जिसके पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है। देश के नौजवान आज नहीं तो कल इस बात को अवश्य समझेंगे। प्रसन्नता की बात यह है कि हिन्दी अपनी जीवन्तता,उपयोगिता और लोक शक्ति के कारण ज्ञान-विज्ञान, इन्टरनेट सहित पूरी दुनिया में अपनी यश पताका लहराती जा रही है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)-hindusthansamachar.in