यूपी का चम्पारण: राम नाम के सहारे मिली किसानों के संघर्ष को धार
यूपी का चम्पारण: राम नाम के सहारे मिली किसानों के संघर्ष को धार
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यूपी का चम्पारण: राम नाम के सहारे मिली किसानों के संघर्ष को धार

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- राम-राम और जय-जय सीताराम बन गया था 'मूलमंत्र' - अवध में हजारों किसानों ने दमन का विरोध करते हुए दिया बलिदान - किसानों के इस ऐतिहासिक संघर्ष की बीत गई गुमनामी में शताब्दी रजनीश पाण्डेय रायबरेली, 15 अक्टूबर(हि.स.)। राम करोड़ों लोगों के आराध्य हैं, लेकिन वह असंख्य लोगों के संघर्ष के प्रेरणा स्रोत भी हैं। यूपी का चंपारण कहा जाने वाला अवध के किसान आंदोलन में भी किसानों के संघर्ष को राम नाम के सहारे ही धार मिली। अंग्रेजों और जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ़ भारत के इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण आंदोलन के नींव में राम ही रहे और राम राम और जय सीताराम किसानों के संघर्ष का मूलमंत्र बन गया था। किसानों के इस संघर्ष को एक रूप देने वाली अवध किसान सभा की शताब्दी गुमनामी से बीत गई। सभा के गठन को अब 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं जिसकी विधिवत शुरुआत 17 अक्टूबर 1920 को प्रतापगढ़ के रूर गांव में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध किसान सभा के गठन के बाद हुई। हालांकि इसके पहले ही उत्तर प्रदेश किसान सभा के माध्यम में 1917 में किसानों की आवाज बुलंद होने लगी थी लेकिन 1920 के बाद अवध किसान सभा के माध्यम से ही इस ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसके केन्द्र में राम रहे।किसान सभा का अवध के गांव गांव में गठन होना शुरू हो गया था, जहां रामचरितमानस के पाठ के नाम पर किसान एकत्रित होते थे और अंग्रेजों जमींदारों के खिलाफ़ रणनीति बनाते थे। जय सीताराम और राम राम की आवाज पर कुछ समय में ही हजारों किसान एक जगह पहुंच जाते थे। गांधीवादी विचारक ओमप्रकाश शुक्ल कहते हैं 'राम हमेशा जन जन में थे जिसके सहारे इस आंदोलन को विस्तार और धार देने में बहुत मदद मिली।' किसानों के लिये मूलमंत्र था 'जय सीताराम व राम राम' अवध किसान सभा के बैनर तले किसान लागातर संगठित हो रहे थे, जिसके नींव में बाबा रामचंद्र की नेतृत्व शक्ति व भगवान राम की जन-जन में व्यापकता थी। अवध में किसानों के आंदोलन में किस तरह राम केंद्र में थे, इस पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना अनुभव बयान करते हुए कहा कि 'जय जय सीताराम के नारों के सुनने पर एक गांव के लोग दूसरे से जुड़ते हुए सभास्थल की ओर चल पड़ते थे, फ़टे चीथड़े पहने इन किसानों की छवि मेरे दिमाग में आजीवन छाई रही'। इसके नेतृत्वकर्ता बाबा रामचंद्र गांव गांव जाकर रामचरित मानस के माध्यम से किसानों को जागरूक कर रहे थे। बाबा रामचंद्र मूलतः मराठी परिवार से थे और उनका नाम श्रीधर बलवंत था। वह 1909 में ही अयोध्या आ गए थे, उनका पूरा रुझान धर्म जागरण के प्रति था। वह रामचरित मानस का पाठ और प्रवचन करते थे, हालांकि इसके पहले वह फिजी में गिरमिटिया मजदूरों के एक आंदोलन में भी वह सक्रिय रहे थे।किसान नेता के पहले वह अवध के एक बड़े क्षेत्र में एक धर्मगुरु के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।किसानों की पीड़ा उन्हें परेशान करती थी और अंग्रेजों और जमींदारों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने राम नाम का सहारा लिया और मानस पाठ के सहारे सबको एकत्रित करने लगे। बाबा रामचंद्र ने कई दोहे रचे थे जिनका वह मानस पाठ के दौरान उल्लेख करते रहते थे जिसके माध्यम से वह किसानों को जागरूक करते थे। रामचरित मानस का यह प्रायोगिक रूप अपनेआप में उल्लेखनीय था। राम नाम और जय सीताराम का असर यह था कि एक आदमी जब गांव में जाकर यह जयकारा लगाता था तो सैकड़ों की संख्या में किसान इकठ्ठे हो जाते थे। इस सम्बंध में उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू, पंडित मदनमोहन मालवीय सहित कई बड़े कांग्रेस नेताओं से भी संपर्क किया। 17 अक्टूबर 1920 को प्रतापगढ़ के रूर गांव में अवध किसान सभा का गठन कर किसानों के संघर्ष की शुरूआत की। जल्दी ही इसका विस्तार रायबरेली, सुल्तानपुर,अमेठी बाराबंकी सहित अवध के अन्य जिलों में हो गया। अवध किसान सभा की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रायबरेली बना और नवम्बर 1920 में ही कलकलियापुर में पहली किसान सभा का गठन हुआ। बाद में कई अन्य जिलों में तेजी से इसका प्रसार होता गया। 6 जून को बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में एक काफिला पैदल ही महात्मा गांधी से मिलने प्रयागराज पहुंचा, लेकिन गांधी जी वहां से जा चुके थे। किसानों का जत्था बलुआघाट पर जमा रहा,बाद में पंडित नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन और गौरी शंकर मिश्र से उनकी मुलाकात हुई। 20 अगस्त 1920 को पट्टी क्षेत्र के लखरावां बाग में सभा कर रहे बाबा रामचंद्र व उनके सहयोगी सहदेव सिंह व झिंगुरी सिंह सहित 32 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद हजारों की संख्या में किसान आंदोलित हो उठे। अंत में बाध्य होकर प्रशासन को सभी को रिहा करना पड़ा। यह किसानों द्वारा उठाई गई पहली सामूहिक आवाज थी जिसने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। इस घटना के बाद बाबा रामचंद्र को मानस प्रवचनकर्ता के अलावा एक किसान नेता के रूप में भी स्थापित कर दिया। उनके सहयोगियों में सहदेव सिंह, झिंगुरी सिंह और दृगपाल सिंह प्रमुख थे जिन्होंने इस आंदोलन को तेज करने में प्रमुख भूमिका निभाई। अयोध्या की धरती से हुआ आगाज़, साधु संत भी जुड़े राम के सहारे शुरू हुए इस आंदोलन का पहला बड़ा पड़ाव अयोध्या में हुआ। 20-21 दिसम्बर 1920 को सरयू नदी के किनारे क़रीब एक लाख से ज्यादा किसान एकत्र हुए। किसानों के इस संघर्ष में अयोध्या के साधु संतों को भी पूरा साथ मिला। मठों और मंदिरों के दरवाजे किसानों को लिए खोल दिये गए। बाबा रामचंद्र ने अयोध्या में एकत्रित किसानों को रामनाम का सकंल्प दिलाया और सभी को एकजुट होने के लिए कहा। यहीं से यह आंदोलन मुख्यधारा से जुड़ते हुए आजादी के संघर्ष का भी हमराही बना और किसानों ने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का संकल्प लिया। अयोध्या में पंडित मोतीलाल नेहरु और जवाहरलाल नेहरू को भी आना था लेकिन वह नहीं आ पाए। बाबा रामचंद्र ने किसानों को एकजुट रहने व गुलामी की मानसिकता छोड़ने के लिए मंच से ही एक संदेश दिया। मंच पर उन्होंने खुद को जंजीरों में जकड़े गुलाम की तरह पेश किया और अपनी जंजीरों को तभी खोली जब तक किसानों ने एकजुटता का संकल्प नहीं ले लिया। उन्होंने इसके सहारे किसानों को एकजुट रहने व गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए प्रेरित किया। किसानों ने सरयू के जल को हाथ में लेकर संकल्प लिया और ब्रिटिश सरकार व जमींदारों के खिलाफ़ अपने आंदोलन को तेज करने की रणनीति बनाई। पूरी सभा जय सीताराम व जय जय राम के नारों से गूंज उठा। अयोध्या में जिस तरह से साधु संत इस आंदोलन से जुड़े उसका असर यह हुआ कि बाद में अन्य स्थानों में हुए किसानों के संघर्ष में साधु संत ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जब सरयू का पानी हुआ था लाल अवध किसान सभा के आंदोलन जगह जगह हो रहे थे,सरकार इससे परेशान थी। इस संघर्ष का सबसे प्रमुख घटना 7 जनवरी 1921 को हुई जब रायबरेली के मुंशीगंज में सैकड़ों किसानों को अपना बलिदान देना पड़ा और हजारों किसान घायल हुए। ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई इस वीभत्स घटना को गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने अखबार 'प्रताप' में दूसरा जालियांवाला बाग की संज्ञा दी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी इंडिपेंडेंट में इसपर विस्तार से लिखा है। कहा जाता है कि रातोंरात शवों को लेकर डलमऊ में गंगा में बहा दिया गया था और सई का पानी किसानों के खून से लाल हो उठा था। दरअसल रायबरेली में किसान नेताओं की गिरफ्तारी से आक्रोशित किसान लाखों की संख्या में एकत्रित होकर रायबरेली जा रहे थे, जहां पर पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी आना था,। लेकिन मुंशीगंज सई नदी पर बने पुल पर दोनों तरफ से किसानों को ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया और गोलियों की बौछार कर दी। भारतीय इतिहास में ब्रिटिश अत्याचार की सर्वाधिक प्रमुख घटनाओं में से यह एक थी। इस घटना के बाद पूरे देश में किसान आंदोलित हो उठे और कई मामलों में सरकार को पीछे हटना पड़ा। माहत्मा गांधी भी इससे बहुत व्यथित थे,लेकिन किसानों के इस संघर्ष ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचा और बाद में कई प्रमुख आंदोलनों की जिम्मेदारी रायबरेली को मिली। किसान आंदोलनों पर शोध करनेवाले और वरिष्ठ पत्रकार फ़िरोज नकवी कहते हैं कि मुंशीगंज गोलीकांड ब्रिटिश अत्याचार की इंतेहा थी,बावजूद इसके किसानों का जज्बा कम नहीं हुआ और आगे चलकर अवध के जिलों में आजादी की लड़ाई में मुख्य आधार बना। हिन्दुस्थान समाचार/रजनीश/राजेश-hindusthansamachar.in