मंदिर और हिंदुत्व पर राजनीतिक घमासान
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मंदिर और हिंदुत्व पर राजनीतिक घमासान

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सियाराम पांडेय 'शांत' महाराष्ट्र में सिद्धि विनायक मंदिर खोलने को लेकर राजनीतिक घमासान जहां चरम पर है, वहीं हिंदुत्व के सबसे बड़े पैरोकार की जंग भी शुरू हो गई है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री की जुबानी जंग तो कमोबेश इसी ओर इशारा करती है। भाजपा इस मंदिर को यथाशीघ्र खोले जाने का महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बना रही है। सिद्धि विनायक मंदिर के सामने भाजपाइयों के प्रदर्शन के बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भी बंद पड़े धर्मस्थलों को खुलवाने को लेकर सीएम उद्धव ठाकरे को चिट्ठी लिखी। इस पर महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने जवाब देते कहा है कि जिस तरह से एकदम से लॉकडाउन लगाना उचित नहीं था, उसी तरह से उसे पूरी तरह से समाप्त करना भी ठीक नहीं है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी राज्यपाल पर निशाना साधा है और उनपर संविधान का अनुपालन न करने का आरोप लगाया है। लेकिन उन्हें राज्यपाल द्वारा कही गई बातों पर भी तो विचार करना चाहिए। सिद्धि विनायक मंदिर ही क्यों, किसी भी धर्म के धर्मस्थल को क्यों बंद रहना चाहिए। राज्यपाल ने यह भी पूछा है कि क्या उद्धव को ईश्वर की ओर से कोई चेतावनी मिली है कि धर्मस्थलों को दोबारा खोले जाने को टालते जाएं या फिर वह सेक्युलर हो गए हैं। उन्होंने अपने पत्र में यह भी जानना चाहा है कि आपने एकबार फिर पूजा स्थलों पर लगा बैन क्यों बढ़ा दिया है। एक तरफ सरकार ने बार, रेस्टोरेंट और समुद्री बीच खोल दिए हैं, दूसरी तरफ देवी-देवता लॉकडाउन में रहने को अभिशप्त हैं। उन्होंने उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व की पैरोकारी पर भी इस बहाने सवाल किए हैं। अगर बात मंदिरों को खोलने की होती तो शिवसेना कदाचित इतना न तिलमिलाती लेकिन हिंदुत्व पर सवाल उठे तो वह अपना आपा खो बैठती है। उद्धव ठाकरे ने कहा है कि शिवसेना को हिंदुत्व और उसकी पैरोकारी से कोई नहीं रोक सकता। मैं हिंदुत्व का अनुसरण करता हूं। मेरे हिंदुत्व को राज्यपाल से सत्यापन की आवश्यकता नहीं है। गौरतलब है कि राज्यपाल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को याद दिलाई है कि 1 जून को अपने टीवी संबोधन में उन्होंने कहा था कि राज्य में जून के पहले सप्ताह से 'पुनश्च हरिओम मिशन' शुरू हो जाएगा। यह भी कहा था कि उस दिन से 'लॉकडाउन' शब्द डस्टबिन में चला जाएगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को अपने राज्य की जनता को यह तो बताना ही चाहिए कि क्या वे इससे पूर्व गलतबयानी करते रहे हैं। सवाल यह है कि जिस कोरोना के बढ़ते संक्रमण के मद्देनजर देशभर में लॉकडाउन घोषित किया गया था। मंदिर, स्कूल-कॉलेज बंद किए थे, उस कोरोना संक्रमण की रफ्तार अब मंद पड़ गई है। महाराष्ट्र में कोरोना के सक्रिय मामलों की संख्या घट गयी। मरीजों के स्वस्थ होने से संक्रमण से मुक्ति पाने वालों की संख्या 12,81,896 हो गयी है। देशभर में लॉकडाउन समाप्त कर दिया गया है। महाराष्ट्र इसका अपवाद नहीं है। महाराष्ट्र सहित देशभर में मॉल, कॉम्प्लेक्स, रेस्तरां और थियेटर खोल दिए गए हैं। हालांकि ऐसा कोविड नियमावली के तहत हुआ है। दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की नसीहत अभी भी सरकार के स्तर पर दी जा रही है। विचारणीय यह है कि जब बार और शराब की दुकानें खोली जा सकती हैं। सिनेमाघर खोले जा सकते हैं तो मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर को क्यों नहीं खोला जा सकता? राज्यपाल संवैधानिक पद पर बैठे हुए हैं, उन्हें मुख्यमंत्री को पत्र लिखना चाहिए या नहीं लिखना चाहिए, यह विचार-विमर्श और बहस-मुबाहिसे का बिंदु हो सकता है लेकिन मंदिरों को खोलने में किसी तरह की टालमटोल नहीं होनी चाहिए। जिस शिद्दत के साथ हिंदुओं के धार्मिक स्थल खोले जाने चाहिए, अन्य धर्मों के इबादतस्थलों को खोलने में भी कुछ उसी तरह की तत्परता बरती जानी चाहिए। भारतीय संविधान ने लोगों को अपने धर्म के मुताबिक मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर या गुरुद्वारे में जाने की इजाजत है। पूजा-अर्चना या फिर इबादत करने की स्वतंत्रता मिली हुई है। यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, उसे उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के चलते मार्च 2020 में सात राज्यों के 44 प्रमुख मंदिरों को बंद कर दिया गया था। मंदिरों के बंद किए जाने के निर्णय से प्रभावित तो सभी मंदिर रहे। देश का शायद ही कोई बड़ा या छोटा मंदिर रहा है जो बंद न किया गया हो। एक लंबे अरसे तक वहां पुजारी या सेवादार ही पूजा-अर्चना करते रहे, वह भी सीमित संख्या में। इन 44 प्रमुख मंदिरों में वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर, तमिलनाडु का अरियालुर का चोला मंदिर, डोगरा राजा द्वारा बनवाया गया रघुनाथ मंदिर आदि प्रमुख हैं। इनमें कुछ मंदिर ऐसे भी ऐसे भी रहे जो पहली बार श्रद्धालुओं के लिए बंद किए गए। उज्जैन के महाकाल मंदिर में पहले सिर्फ भस्म आरती में भक्तों का प्रवेश बंद किया गया था। बाद में मंदिर में आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। गुजरात के सोमनाथ और द्वारिका सहित 4 बड़े मंदिर, तमिलनाडु के मदुरै के मीनाक्षी माता सहित 4 मंदिर, दिल्ली के इस्कॉन, झंडेवालान, अक्षरधाम मंदिर, काली मंदिर सहित सभी प्रमुखों मंदिरों में भक्तों का प्रवेश वंचित कर दिया गया था। मुंबई के महालक्ष्मी, जम्मू के रघुनाथ, सीकर के खाटू श्याम, पुरी के जगन्नाथ, चित्रकूट के कामतानाथ और आंध्र प्रदेश के तिरुपती बालाजी जैसे बड़े मंदिर बंद हुए थे। हरिद्वार और वाराणसी में रोजाना होने वाली गंगा आरती पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। कोरोना संक्रमण को देखते हुए उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी सीमित संख्या में हुई। श्री माता वैष्णोदेवी यात्रा पर भी रोक लगा दी गई थी। वृंदावन में भगवान रंगनाथ जी की 171 साल पुरानी वार्षिक यात्रा भी स्थगित कर दी गई थी। मुंबई की हाजी अली दरगाह में भी जायरीनों का प्रवेश बंद कर दिया गया था। केरल के सबरीमाला मंदिर के दस दिवसीय सालाना उत्सव में भाग लेने से भी श्रद्धालु इस साल वंचित रह गए थे। इस उत्सव में उन्हें दर्शन की अनुमति भी नहीं मिली थी। तमिलनाडु के मदुरै में स्थित मीनाक्षी मंदिर को भी कोरोना वायरस से सुरक्षा के चलते बंद किया गया था। कुंभकोणम में स्थित एक हजार साल पुराने बृहदेश्वर महादेव मंदिर, धारासुरम् मंदिर, अरियालुर का चोला मंदिर भी इतिहास में पहली बार दर्शनार्थियों के लिए बंद किया गया था। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, द्वारिका धाम, अंबाजी माता मंदिर और पावागढ़ माता मंदिर के साथ कई मंदिरों के दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए बंद हो गए थे। चित्रकूट के कामतानाथ मंदिर को भी अगले आदेश तक बंद कर दिया गया था। पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर, महाराष्ट्र का शिर्डी साई मंदिर, मध्य प्रदेश का ममलेश्वर और आंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों पर भी रोक लगा दी गई थी। मुंबई के 4 मंदिर मुंबादेवी मंदिर, महालक्ष्मी, बबूलनाथ और इस्कॉन मंदिर को बंद कर दिया गया था। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर खुला तो है लेकिन इसके परिसर में गोल्डन टैम्पल प्लाजा बंद कर दिया गया है। शिंगणापुर में शनिधाम को भी अगले आदेश तक बंद कर दिया गया है। हिमाचल प्रदेश 6 प्रमुख मंदिर बृजेश्वरी मंदिर, ज्वालामुखी मंदिर, चामुंडा देवी मंदिर, बगलामुखी मंदिर, बिलासपुर जिले में स्थित मां नयना देवी मंदिर और ऊना जिले में स्थित चिंतपुर्णी मंदिर भी कोरोनाकाल में श्रद्धालुओं के लिए बंद हो गए थे। शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार संविधान में बताए गए धर्मनिरपेक्षता शब्द के वास्तविक अर्थ को ध्यान में रखते हुए गंभीर है। सरकार कोरोना की स्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले रही है। ऐसे में राज्यपाल का पत्र साबित करता है कि वह भारत के संविधान का पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं। महाराष्ट्र में मंदिर खोलने को लेकर जारी सियासत में अब कंगना रनौत भी कूद पड़ी हैं। उन्होंने ट्वीट किया है कि यह जानकर अच्छा लगा कि माननीय गवर्नर महोदय ने गुंडा सरकार से पूछताछ की है। गुंडों ने बार और रेस्तरां खोले हैं लेकिन मंदिरों को बंद रखा है। सोनिया सेना, बाबर सेना से भी बदतर व्यवहार कर रही है। राक्रांपा प्रमुख शरद पवार भी राज्यपाल के पत्र की आलोचना कर रहे हैं। दरअसल यह सारी लड़ाई अपने आप को हिंदुत्व का सबसे बड़ा पैरोकार बनने की है। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)-hindusthansamachar.in