दुनिया की सबसे ऊंची डीबीओ हवाई पट्टी के गेमचेंजर हैं चाफेकर
दुनिया की सबसे ऊंची डीबीओ हवाई पट्टी के गेमचेंजर हैं चाफेकर
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दुनिया की सबसे ऊंची डीबीओ हवाई पट्टी के गेमचेंजर हैं चाफेकर

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मनीष कुलकर्णी नागपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। चीन के साथ उत्तरी लद्दाख के गतिरोध में दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) हवाई पट्टी भारत के लिए वरदान साबित हो रही है। इस हवाई पट्टी के कारण ही आपातकालीन स्थिति में भारतीय जवान हजारों फीट की ऊंची पहाड़ियों पर उतरने में सक्षम हैं। नागपुर के एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) सूर्यकांत चाफेकर ने इस हवाई पट्टी (एयर स्ट्रिप) के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। शौर्यचक्र से सम्मानित चाफेकर ने हिन्दुस्थान समाचार से खास बातचीत में बताया कि उन्होंने 16 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर बनी इस हवाई पट्टी पर 31 मई, 2008 को सफल लैंडिग की थी। चाफेकर के इन प्रयासों के चलते आज यह एयर फील्ड एक्टिव है और वायुसेना के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए चाफेकर का कहना है कि उन्हें इस हवाई पट्टी के पुनर्निर्माण का अभिमान है। एयर वाइस मार्शल चाफेकर (से.नि.) का कहना है कि पूरी दुनिया को कोरोना महामारी में धकेलने वाले चीन ने विस्तारवादी नीति पर चलकर भारत के साथ बखेड़ा खड़ा कर दिया है। ऐसी संकट की स्थिति में भारत के लिए सामरिक दृष्टि से दौलत बेग ओल्डी (ऊंचाई 16 हजार 700 फीट), फुकचे (14 हजार 500 फीट) और नियोमा (ऊंचाई 13 हजार 500 फीट) हवाई पट्टी बड़ी कारगर साबित हो रही हैं। इन तीनों हवाई पट्टियों में दौलत बेग ओल्डी विश्व की सबसे ऊंची हवाई पट्टी है। उन्होंने बताया कि इस हवाई पट्टी के पुनर्निर्माण के संकल्प के साथ ही विश्व की सबसे ऊंची हवाई पट्टी पर एएन-32 जहाज से सफलतापूर्वक मैंने लैंडिंग की। इसके लिए मुझे शौर्यचक्र भी प्रदान किया गया। दौलत बेग ओल्डी का महत्व एयर वाईस मार्शल (से.नि.) चाफेकर ने विश्व की सबसे ऊंची हवाई पट्टी का सामरिक महत्व समझाते हुए बताया कि यदि तकनीकी मापदंडों पर चलें तो हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में 16 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर दुनिया का कोई भी प्लेन लैंड नहीं हो सकता। कारण यह है कि इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन 40 फीसदी कम हो जाती है। नतीजतन इस हवाई पट्टी पर हवाई जहाज का इंजन बंद करने पर दोबारा शुरू नहीं होता। इसलिए यहां लैंडिंग के बाद फाइटर प्लेन का इंजन चालू रखा जाता है तथा काम होने के तुरंत बाद प्लेन टेक-ऑफ होता है। चाफेकर ने बताया कि लैंडिंग के लिए हमें प्लेन की तकनीकी मर्यादाओं को लांघकर काम करना पड़ता है। इस हवाई पट्टी के चारों ओर ऊंची-ऊंची पहाड़ियां हैं। यह पूरा इलाका एक बाऊल (कटोरे) की तरह है, जिसके चलते यहां लैंडिंग और टेक-ऑफ कराना बहुत जोखिम भरा काम होता है। मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय वायुसेना अब हंसते-हंसते इस काम को पूरा करने में सक्षम है। हवाई पट्टी के पीछे सावरकर की प्रेरणा सूर्यकांत चाफेकर ने बताया कि यह हवाई पट्टी 1962 में भी थी, पर तब हमारी वायुसेना के पास ऐसे विमान नहीं थे जो वहां उतर सकें। 1966 में हिमालयी क्षेत्र में आए एक भूकंप के चलते यह हवाई पट्टी क्षतिग्रस्त हो गई। उसके बाद इसके पुनर्निमाण का कोई प्रयास यह मानकर नहीं किया गया कि इसका ज्यादा महत्व नहीं है या इसके चलते चीन से बेवजह तनातनी हो जाएगी। चाफेकर बताते हैं कि 2008 में इस हवाई पट्टी का सामरिक महत्व देखते हुए उनके दिमाग में इसके पुनर्निर्माण का विचार आया। उन्होंने इस विचार को यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए दिन-रात एक कर दिया। चाफेकर ने बताया कि वह स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से बेहद प्रभावित रहे हैं। भारत के आजाद होने से पहले ही सावरकर ने चीन को लेकर आगाह किया था। इसके साथ ही सावरकर हमेशा कहते थे कि देश की सीमाएं चरखे से नहीं बल्कि तलवार की नोंक पर खींची जाती हैं। चाफेकर ने कहा कि पाकिस्तान के साथ हमारी सीमा इंच-इंच निर्धारित है, इसलिए लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) कहलाती है। वहीं चीन के साथ हमारी सीमा निर्धारित नहीं होने की वजह से लाइन ऑफ ऍक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) कहलाती है। सेना का काम सीमाओं को निर्धारित करना नहीं है, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करना हमारी जिम्मेदारी है। इसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी का पुनर्निर्माण का विचार आया। बारबोरा के साथ बेजोड़ समन्वय एयर वाइस मार्शल (से.नि.) सूर्यकांत चाफेकर वायुसेना के पहले और इकलौते अफसर हैं जिन्होंने वायुसेना की वेस्टर्न कमांड के तहत आने वाली चंडीगढ़ एयर फील्ड में बतौर फ्लाइट कमांडर, कमांडिंग अफसर (सीओ) और एयर ऑफिसर कमांडिंग (एओसी) तीनों पदों पर काम किया है। चाफेकर जब चंडीगढ़ में तैनात थे, तब वायुसेना के वेस्टर्न एयर कमांड की जिम्मेदारी प्रणव कुमार बारबोरा (पूर्व वाइस एयर चीफ मार्शल) के कंधों पर थी। संयोग से इन दोनों अफसरों की तैनाती 1 जनवरी, 2008 को एक ही दिन हुई थी। दौलत बेग ओल्डी में हवाई पट्टी के पुनर्निर्माण को लेकर भारतीय वायुसेना तीन बार गहराई से अध्ययन कर चुकी थी। इन तीनों कमेटियों ने यहां हवाई पट्टी बनाने को लेकर निगेटिव रिपोर्ट की थी, लेकिन चाफेकर हर हाल में हवाई पट्टी का पुनर्निर्माण करवाना चाहते थे। उनके संकल्प को तत्कालीन कमांडिग अफसर बारबोरा का सहयोग व संबल मिला। उसके बाद चाफेकर ने थलसेना की सहायता से दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी का पुनर्निर्माण करवाया। उन्होंने बताया कि भारतीय थलसेना के बहादुर जवानों ने हवाई पट्टी की जगह को समतल बनाया। भूकंप से पड़ी दरारें खत्म कीं और धूल न उड़े, इसके लिए वहां ऑयल का छिड़काव किया गया। इसके बाद 31 मई, 2008 को चाफेकर ने खुद इस हवाई पट्टी पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की। इसके बाद चाफेकर के प्रयास और योजना से नवंबर, 2008 को फुकचे और सितम्बर, 2009 में निओम हवाई पट्टी बनवाई गई। चाफेकर ने बताया कि इस तरह के पुनर्निर्माण के कार्य करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होती है। केवल वित्तीय और सामरिक कार्य करने के लिए सरकार से अनुमति और सहयोग जरूरी होता है। इस हवाई पट्टी के पुनर्निर्माण का काम कमांडिंग अफसर बारबोरा के सहयोग और उनकी मेहनत के दम पर पूरा किया गया। बालाकोट के बाद ऊंचा उठा मनोबल चीन के साथ चल रहे मौजूदा संघर्ष को लेकर चाफेकर ने कहा कि बीती 15 जून को हमारे वीर जवानों ने चीन को नाकों चने चबवा दिये। बीते 72 साल में पहली बार ऐसा जबरदस्त जोश देखने को मिला है। सैन्य दलों के इस बढ़े हुए मनोबल का श्रेय बालाकोट एयर स्ट्राइक को जाता है। चाफेकर ने कहा कि इससे पूर्व पाकिस्तान बार-बार न्यूक्लियर हमले की धमकी देता रहता था। हमारी ओर से उसकी सैकड़ों गुस्ताखियों के बाद भी कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती थी लेकिन मौजूदा सरकार ने बालाकोट हवाई हमले की अनुमति देकर पाकिस्तान को उसकी औकात दिखा दी। इस कार्रवाई के बाद हमारी सेना का मनोबल ऊंचा उठ गया है। दरअसल, सेना के साथ सरकार मजबूती से खड़ी रही और नतीजा सबके सामने है। जिस चीन को हम हौव्वा या अपराजेय समझते थे, वह पीछे हटने को मजबूर है और भारत के सैनिकों के मनोबल, भारत की सैन्य क्षमता के साथ ही भारत की इच्छाशक्ति को समूचा विश्व भी देख रहा है, उसकी प्रशंसा कर रहा है। हिन्दुस्थान समाचार-hindusthansamachar.in