गांव में रहकर आत्मनिर्भर बनने के लिए आधे से भी कम दाम में बेच दिया दुकान
गांव में रहकर आत्मनिर्भर बनने के लिए आधे से भी कम दाम में बेच दिया दुकान
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गांव में रहकर आत्मनिर्भर बनने के लिए आधे से भी कम दाम में बेच दिया दुकान

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सुरेन्द्र बेगूसराय, 24 जुलाई (हि.स.)। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक माह देश के विभिन्न शहरों से आने वाला करोड़ों-करोड़ों रुपया रुक गया है। अब करोड़ों रुपया आने के बदले रुपया कमाने वाले ही भागे-भागे अपने गांव की ओर आ रहे हैं। देश के तमाम शहरों से प्रवासियों के आने का सिलसिला लगातार जारी है लेकिन सबसे अधिक प्रवासी श्रमिक और कामगार दिल्ली, मुंबई एवं असम से लौट रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान हुई परेशानी और कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों ने चार महीने से काम-धंधा बंद कर परदेस में बैठे श्रमिकों को घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया है। हालांकि अनलॉक जब हुआ तो करीब सभी जगह काम-धंधे शुरू हुए लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया गरीब कल्याण रोजगार अभियान ने अब श्रमिकों को परदेस में रुकने नहीं दे रहा है। घर लौटे श्रमिक काफी खुश हैं तथा घर आते ही गरीब कल्याण रोजगार अभियान में काम खोजने की जुगाड़ लगा रहे हैं। देश के विभिन्न शहरों से लौटे श्रमिकों को कुशल एवं अकुशल श्रमिकों को उनके कौशल के अनुसार रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए प्रशासन जोर-शोर से काम कर रही है। औद्योगिक नवप्रवर्तन योजना के तहत बैग निर्माण, वुडन फर्नीचर, फेवर ब्लॉक, मधुबनी पेंटिंग, अगरबत्ती निर्माण आदि से संबंधित कलस्टर निर्माण की चल रही है प्रक्रिया परदेसों में रह रहे श्रमिकों को घर वापस आने के लिए मजबूर कर रही है। घर का फोन, प्रधानमंत्री की योजना और घर वापसी के लिए उपलब्ध ट्रेन की सुविधा, परदेस में वहां की सरकारों द्वारा उपेक्षा से आहत श्रमिकों को लगातार घर बुला रही है। इससे एक ओर अब बिहार भी सशक्त बनेगा तो वहीं परदेस की सरकार और उद्योगपतियों के बीच बिहार के श्रम शक्ति का साथ छूटने से खलबली मच गई है। असम के कामरूप जिला स्थित रंगिया जंक्शन स्टेशन रोड में जनरल स्टोर का दुकान चलाने वाले मंझौल के दो सगे भाई विनोद कुमार राय और प्रमोद कुमार राय भी गांव में रोजी रोजगार मिलने की बात सुनते ही वहां से 12 साल पुरानी अपनी दुकान बेचकर गुरुवार को गांव आ गए हैं। बेगूसराय स्टेशन पर हिन्दुस्थान समाचार ने उनसे दुख दर्द साझा करने का प्रयास किया तो दोनों भाई की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन होने पर जब ट्रेन सेवा बंद हो गई तो हमारे दुकान के आसपास के इलाकों में मरघटी सन्नाटा पसर गया। एक भी लोग नहीं दिखते थे, दुकान पूरी तरह से बंद हो गया, वहां सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की। हम लोग जनरल स्टोर चलाते थे जिसके कारण खाने पीने के सामान की समस्या नहीं थी। दोनों भाई खुद के भरोसे चार महीना से किसी तरह जलालत झेलकर जीते रहे। दुकान बेचने का प्रयास किया, लॉकडाउन में बाहर निकलना मुश्किल हो गया था। जिस थाने की पुलिस सामान लेने के लिए रोज दुकान पर आती थी, उस थाने की पुलिस ने भी बाहर निकलने पर कई बार लाठी चला दिया। दुकान बेच कर घर आने का कोशिश किया तो कोई ग्राहक नहीं मिला, अनलॉक होने पर ग्राहक जब मिले तो मजबूरी का फायदा उठा कर आधे से भी कम दाम में दुकान लेने के लिए तैयार हुए। इस बीच जब गांव में आत्मनिर्भर भारत अभियान शुरू होने की जानकारी हुई तो एक बार फिर ग्राहक खोजना शुरू किया और करीब तीन लाख का अपने सपनों का वह दुकान मात्र एक लाख 35 हजार में बेचना पड़ा। दुकान बेच कर अब गांव आ गए हैं, यही दुकान खोलेंगे और दोनों भाई परिवार के साथ रहकर खुशी पूर्वक जिएंगे। प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए योजना में योजना से स्वरोजगार कर अपने परिवार को आत्मनिर्भर बनाएंगे। हिन्दुस्थान समाचार-hindusthansamachar.in