उल्फा (स्व) प्रमुख परेश बरुवा भी वार्ता को तैयार
उल्फा (स्व) प्रमुख परेश बरुवा भी वार्ता को तैयार
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उल्फा (स्व) प्रमुख परेश बरुवा भी वार्ता को तैयार

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गुवाहाटी, 22 नवम्बर (हि.स.)। असम में प्रतिबंधित संगठन उल्फा (स्वाधीन) की कमजोर होती स्थिति और बड़े कैडरों के लगातार साथ छोड़ने की सूरत में उल्फा के स्वयंभू मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरुवा भी संभवतः वार्ता की मेज पर आने को तैयार नजर आ रहे हैं। हालांकि बरुवा ने यह भी दावा किया कि उल्फा (स्व) के डिप्टी कमांडर-इन-चीफ दृष्टि राजखोवा के आत्मसमर्पण के बाद संगठन में आई शून्यता को भरने में हम सक्षम हैं। परेश बरुवा ने किसी अज्ञात स्थान से फोन पर शनिवार को गुवाहाटी के एक स्थानीय समाचार पत्र के साथ बात करते हुए कहा कि जब तक सरकार मुख्य मुद्दे पर बात करने के लिए सहमत नहीं होती, तब तक उल्फा (स्व) बातचीत के लिए नहीं आएगा। साथ ही कहा कि अगर सरकार हमें लिखित में आश्वासन देती है कि वह मुख्य मुद्दे पर बात करेगी, तो हम निश्चित रूप से सकारात्मक तरीके से जवाब देंगे लेकिन मुख्य मुद्दा संप्रभुता है। राजखोवा के आत्मसमर्पण पर परेश बरुवा ने कहा कि उल्फा के गठन के बाद से कई वरिष्ठ नेता और कैडरों ने संगठन को छोड़ दिया लेकिन नए सदस्यों ने उस रिक्तता को पूरा किया। उन्होंने कहा कि उल्फा (स्व) हमेशा सशस्त्र आंदोलन में राजखोवा के योगदान का सम्मान करेगा लेकिन दृष्टि राजखोवा के आत्मसमर्पण से उत्पन्न रिक्तता को भरा जाएगा। उल्फा (स्व) प्रमुख ने कहा कि संगठन की पश्चिमी कमान का नया प्रमुख पहले ही नियुक्त किया जा चुका है। बरुवा ने बताया कि संगठन के गठन के बाद से अध्यक्ष के पद पर तीन व्यक्तियों का कब्जा था। 1992 में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नेता और कैडर संगठन से बाहर चले गये। फिर, 2010 में अध्यक्ष सहित आठ केंद्रीय समिति के सदस्य सरकार के साथ बातचीत शुरू करने के लिए भूमिगत हो गए। वे कई जिला समिति के सदस्यों के साथ-साथ संगठन की चार बटालियनों में से तीन के सदस्यों को भी अपने साथ ले गये। लेकिन, इस तरह के झटके के बाद भी उल्फा अभी भी बचा हुआ है। इससे यह साबित होता है कि कुछ लोगों का आत्मसमर्पण आंदोलन को खत्म नहीं करेगा। बरुवा ने स्वीकार किया कि वह अपने कुछ पूर्व सहयोगियों के संपर्क में हैं, जो उल्फा के समर्थक-वार्ता गुट के सदस्य हैं। हमने एक परिवार की तरह सालों तक साथ काम किया और उनके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन, हम बातचीत की प्रक्रिया में दिलचस्पी नहीं रखते हैं क्योंकि, उन्होंने सरकार के साथ बात करने के लिए अपनी मुख्य मांग को छोड़ दिया है। बरुवा ने अपने तर्कों को मजबूत बनाने के लिए असम के उग्रवादी संगठन एनडीएफबी (संगबिजीत) गुट और नगालैंड के उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आईएम) की बातों को साझा किया। जानकारों का कहना है कि परेश बरुवा कहीं न कहीं सरकार के साथ बातचीत का संकेत दे रहे हैं। पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ सूत्रों की मानें तो उल्फा (स्व) प्रमुख बरुवा भी वार्ता में शामिल होने को तैयार हैं। राज्य में जिस तेजी के साथ उल्फा (स्व) का जनाधार घट रहा है और सुरक्षा बलों की गतिविधियां मजबूत हुई है, उससे भी परेश बरुवा अब लंबे समय तक जंगल में रहकर संघर्ष की राह पर आगे नहीं बढ़ पाएंगे। इसका कारण है कि लगभग अधिकांश बड़े कैडर परेश बरुवा का साथ छोड़कर जा चुके हैं। उल्फा के म्यांमार स्थित ठिकाने पर म्यांमार की सेना भी अब लगातार अभियान चलाकर उनके छिपने के स्थानों को समाप्त कर रही है। ऐसे में सिवाय मुख्यधारा में लौटने के परेश बरुवा के पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। हिन्दुस्थान समाचार/अरविंद/सुनीत-hindusthansamachar.in