अब मातृभाषा में ई-लर्निंग से लेकर, बोर्ड परीक्षा में कम होगा अंकों का खेल
अब मातृभाषा में ई-लर्निंग से लेकर, बोर्ड परीक्षा में कम होगा अंकों का खेल
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अब मातृभाषा में ई-लर्निंग से लेकर, बोर्ड परीक्षा में कम होगा अंकों का खेल

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स्कूली शिक्षा में अब 10+2 नहीं, बल्कि 5 +3+3+4 का मॉडल अपनाया जाएगा। बच्चों को शुरू से ही प्रायोगिक एवं कौशल आधारित शिक्षा दी जाएगी, जिससे कि वे भविष्य के लिए खुद को बेहतर तैयार कर सकें। इसके अलावा, बोर्ड परीक्षाओं में अंकों के दबाव को कम करने के लिए कॉन्सेप्ट आधारित शिक्षा पर जोर होगा। स्कूल से लेकर ई-पाठ्यक्रम में मातृभाषा को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे कि बच्चे अपनी स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में भी ज्ञान अर्जन कर सकें। अब स्कूली शिक्षा का आधार रट्टा-मार तकनीक नहीं, बल्कि वह ज्ञान और तर्क पर आधारित होगी। नए वैश्विक परिदृश्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती अहमियत को देखते हुए छठी कक्षा से ही बच्चों को कोडिंग आदि पढ़ाने की बात की गई है। स्कूली शिक्षा में प्रयोग आधारित अध्ययन पर भी जोर दिया गया है, जो बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। इससे स्टूडेंट्स में तर्क की धारणा विकसित होगी। उच्च शिक्षा का आधार भी यही है। नई शिक्षा नीति में पढ़ने-लिखने और जोड़-घटाव (संख्यात्मक ज्ञान) की बुनियादी योग्यता पर ज़ोर दिया गया है। लखनऊ के अलीगंज स्थित केंद्रीय विद्यालय स्कूल में जीव विज्ञान के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं शिक्षा शिल्पी (विज्ञान भारती) के स्टेट को-ऑर्डिनेटर सुशील द्विवेदी के अनुसार, यह निश्चय ही सीबीएसई द्वारा स्कूलों में अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम अर्थात पीसा कार्यक्रम के अंतर्गत सीसीटी (क्रिटिकल क्रिएटिव थिंकिंग) आधारित मूल्यांकन में सहायक सिद्ध होगा। मातृभाषा में ई-लर्निंग को प्राथमिकता नई नीति में ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सिफ़ारिशों के एक व्यापक सेट को कवर किया गया है, जिसके मद्देनजर ई-पाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित किए जाने, एक राष्ट्रीय शैक्षिक टेक्नोलॉजी फ़ोरम के तहत वर्चुअल प्रयोगशालाओं या डिजिटल प्रयोगशालाओं से स्कूलों को प्रयोग आधारित विज्ञान शिक्षा को सुलभ कराने में सुविधा होगी। सुशील द्विवेदी के अनुसार, ‘डिजिटल अवसंरचना, डिजिटल कंटेंट और क्षमता निर्माण के उद्देश्य से एक समर्पित इकाई बनाने से स्कूलों में ई-शिक्षा की जरूरतें भी पूरी होंगी। हालांकि इससे पारंपरिक कक्षा की कोई जगह नहीं ले सकता है।‘ 11वीं एवं 12वीं के स्टूडेंट्स को हिंदी में विज्ञान विषयों के कंटेंट उपलब्ध कराने वाले प्लेटफॉर्म येसगुरुजी डॉट कॉम के सह-संस्थापक बाल कृष्ण शुक्ला कहते हैं कि इससे उन लाखों स्टूडेंट्स की मदद हो सकेगी, जो अपनी मातृभाषा में पढ़ना चाहते हैं। लेकिन उनके पास इसका पर्याप्ट विकल्प नहीं होते। नई नीति में ये भी कहा गया है कि बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं, राज्यों, क्षेत्रों और छात्रों की पसंद की होंगी। इसके लिए तीन में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए। इसके अलावा, स्कूलों में शिक्षा के माध्यम पर स्पष्ट कहा गया है कि जहां कहीं (कम से कम ग्रेड 5 तक) संभव हो, निर्देश का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय भाषा एवं क्षेत्रीय भाषा हो। यह नियम निजी एवं सार्वजनिक, दोनों तरह के स्कूल में लागू होंगे। कम उम्र से बच्चों का कौशल विकास देश में काफी समय से मांग थी कि शिक्षा को मूल्यवर्धक बनाया जाए, जिससे बच्चों का संपूर्ण विकास हो सके। वे पढ़ाई के साथ लाइफ स्किल सीख सकें। नई नीति में अर्ली चाइल्ड केयर एजुकेशन (ईसीसीई) एवं डेवलपमेंट पर विशेष जोर दिया गया है। यानी खेल-खेल में बच्चों को शिक्षा प्रदान की जाएगी। कम उम्र से ही उनका कौशल विकास किया जा सकेगा। एंपरसैंड ग्रुप के चेयरमैन रुस्तम केरावाला कहते हैं, को-करिकुलर सब्जेक्ट्स को इंटीग्रेट करने से स्टूडेंट्स को अपनी हॉबीज एवं स्किल्स निखारने का मौका मिलेगा। शुरुआती वर्षों में ही प्रोजेक्ट बेस्ड एवं वोकेशनल लर्निंग के साथ-साथ टेक फ्रेंडली होने से बच्चे अपने लक्ष्य के प्रति जल्दी सजग हो सकेंगे। इससे उनके आगे की पढ़ाई को लेकर कंफ्यूजन कम होगा। बोर्ड परीक्षा में कम होगा अंकों का महत्व बोर्ड परीक्षाओं में अंकों को लेकर होने वाली मारामारी को कम करने की कोशिश भी नई शिक्षा नीति में की गई है। स्कूली शिक्षा सचिव अनीता करवल के अनुसार, बोर्ड परीक्षा में नंबरों का महत्व अब कम होगा। कॉन्सेप्ट एवं प्रैक्टिकल नॉलेज को महत्व दिया जाएगा। इतना ही नहीं, स्टूडेंट्स को उन विषयों को चुनने का अधिकार होगा, जिनमें वे बोर्ड परीक्षा देना चाहते हों। इसमें सभी स्टूडेंट्स को किसी भी स्कूल वर्ष के दौरान दो बार बोर्ड परीक्षा देने की अनुमति दी जाएगी, ताकि स्टूडेंट्स अपने नंबर सुधार सकें। इस तरह, स्कूली शिक्षा कुल मिलाकर चार स्तरीय होगी। शुरुआत के तीन साल फाउंडेशन स्टेज के होंगे, जिसमें तीन से आठ साल की उम्र के बच्चों की पढ़ाई करायी जाएगी। यह प्री-प्राइमरी से प्राइमरी यानी दूसरी कक्षा के लिए होगी। प्रारंभिक स्तर ( कक्षा तीन से पांच) और मिडिल स्तर (कक्षा 6 से 8) तीन-तीन साल के होंगे। सेकंडरी स्तर (कक्षा नौ से 12) चार साल का होगा।-newsindialive.in