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माँ शीतला मंदिर के कपाट बंद, न आने की अपील

माँ शीतला मंदिर के कपाट बंद, न आने की अपील

माँ शीतला मंदिर के कपाट बंद, न आने की अपील कौशाम्बी, 24 मार्च (हि.स.)। कोरोना वायरस के सम्भावित खतरे के बीच शक्तिपीठ माँ शीतला के कपाट अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए गए हैं। यह पहला मौका है जब मंदिर की प्रबंध समिति ने भक्तों से अपील की है कि वह अपने घरों में सुरक्षित रहें, माँ शीतला के दर्शन

पूजन को मंदिर न आयें। माँ के दर्शन पूजन बंद होने के ऐलान के बाद इलाके के तीन हजार से अधिक लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। गौरतलब है कि सिराथू तहसील के कड़ा कस्बे में माँ शक्ति की आराध्य देवी माँ शीतला का धाम है। जो 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। पुराणों के अनुसार यहां देवादिदेव महादेव की पत्नी सती का “कर“ (दाहिने हाथ का पंजा) गिरा था। तभी से कुंड में माता सती व मूर्त रूप में माँ शीतला की पूजा अर्चना कर भक्त सुख शान्ति का आशीर्वाद पाते हैं। नवरात्र से पूर्व मंदिर प्रबंध समिति का ऐलान आर्थिक दृष्टिकोण से खासा मायने रखता है। समिति के अध्यक्ष शारदा प्रसाद उर्फ भुक्खड़ पण्डा ने बताया कि मंदिर परिसर की एक हजार मीटर की परिधि में तकरीबन ढाई हजार पण्डा समाज, पुरोहित व तीर्थ पुरोहित रहते हैं। जिनकी जीविका का साधन-संसाधन मंदिर में आने वाले भक्त व दर्शनार्थी होते हैं। जिनको वह दुकानों के जरिये सिन्दूर, प्रसाद, खिलौने इत्यादि बेचकर जीविका चलाते हैं। मंदिर में चढ़ावे, प्रसाद, मिष्ठान, नाश्ता व चाय-पान की दुकानों को मिलकर 800 करीब दूकानदार श्रद्धालुओं व मंदिर आने वाले लोगों से अपनी जीविका चलाते हैं। ऐसे में कोरोना वायरस के संभावित खतरे को देखते हुए दर्शन पूजन बंद होने से आर्थिक विपन्नता व भुखमरी का संकट स्थानीय लोगां के सामने खड़ा हो गया है। दुकानदार हरि मोहन पण्डा बताते है कि केवल नवरात्र के दिनों में माँ शीतला के दर्शन पूजन के लिए 10 लाख भक्त आते हैं। जिससे उनकी साल भर की आमदनी हो जाती है। उन्हें इधर उधर आर्थिक कारणों से भटकना नहीं पड़ता है। भौगोलिक लिहाज से माँ शीतला का कड़ा धाम गंगा नदी के किनारे स्थित है। यहां आने वाले भक्त मंदिर में दर्शन पूजन के पहले गंगा स्नान आचमन करते हैं। नदी आधारित जीविका पर आश्रित नाविक परिवार भी खासे प्रभावित हैं। नाविक कमाता प्रसाद बताते हैं वह और उनके जैसे 200 परिवार मंदिर में दर्शन पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के भरोसे ही अपने-अपने परिवार का पेट पालते हैं। अब वह भी बंद हो गया है। कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर मंदिर परिसर में इधर उधर रहने वाले याचक व भिक्षुक पर हुआ है। भिक्षाटन कर अपना जीवन चलाने वाली रमैया को नहीं पता कि अचानक भीड़ बंद क्यों हो गई। पेट की आग बुझाने वाले अन्न का दाना भी अब मिलना मुश्किल हो गया है। परिसर में इनकी संख्या लगभग 400 के करीब मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष शारदा प्रसाद आंकते है। हिन्दुस्थान समाचार/अजय/विद्या कान्त
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