ऋषिकेश: कोरोना व सामान्य बीमारियों से मरने वाले लोगों की बढ़ी संख्या, श्मशान घाटों पर जगह पड़ी कम

ऋषिकेश: कोरोना व सामान्य बीमारियों से मरने वाले लोगों की बढ़ी संख्या, श्मशान घाटों पर जगह पड़ी कम
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- अब ऋषिकेश में गोबर से बनी लकड़ियों से किया जाएगा दाह संस्कार: किंगर ऋषिकेश, 29 अप्रैल (हि.स.)। तीर्थ नगरी ऋषिकेश में कोरोना के साथ सामान्य बीमारियों से हो रही मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। इस कारण श्मशान घाटों पर जगह कम पड़ी जा रही है। मृतक के परिजनों को भी दाह संस्कार के लिए कम से कम 24 घंटे का समय लेना पड़ रहा है। चंद्रेश्वर नगर के श्मशान घाट संचालक अनिल किंगर ने बताया कि पिछले एक पखवाड़े से चंद्रेश्वर नगर श्मशान घाट पर कोविड-19 सहित सामान्य मृतकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इस कारण श्मशान घाट पर जगह के अभाव में मृतक के परिजनों को कुछ समय के लिए रोका जा रहा है। उन्होंने बताया कि ऋषिकेश एम्स व स्थानीय प्रशासन द्वारा कोविड से हो रही मौतों को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से शाम 5 बजे के बाद दाह संस्कार किए जाने की कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन करते हुए अनुमति दी गई है। इसके अंतर्गत श्मशान घाट पर 15 से 20 लोगों के जाने की ही अनुमति है। उनका कहना था कि कोविड-19 के मृतक के परिजन तथा उसे लाने वाले एंबुलेंस के चालक के पास एम्स की पर्ची का होना अनिवार्य है। यह इसलिए किया गया है क्योंकि सामान्य तौर पर देखने में आया है कि कोविड मरीज के शव को एंबुलेंस के चालक लावारिस हालत में छोड़ कर चले जाते हैं, जिनके दाह संस्कार में दिक्कत आ रही थी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पास श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार करवाने वाले महापंडितों के अतिरिक्त अन्य कर्मचारियों का भी अभाव है। एक महापंडित पिछले दिनों कोविड की चपेट में आ गया था। जिसे देखते हुए उनके द्वारा कुछ कर्मचारी अस्थाई तौर पर रखे गए हैं। इस समय उनके पास 10 से 15 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें तीन-चार परमानेंट हैं। उन्होंने बताया कि कोविड से मौत को देखते हुए उनके परिजन भी नहीं आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि लगातार दाह संस्कार में उपयोग की जाने वाली लकड़ियों की कमी हो रही है, जिसे देखते हुए हरिद्वार में लगे गोबर की लकड़ी के प्लांट से अब गोबर से निर्मित की गई लकड़ियांं गुरुवार को मंगवाई गई हैं, जिसका एक ट्रक पहुंच भी गया है। यह लकड़ी सामान्य लकड़ियों के साथ दी जाएगी। अभी उनके द्वारा पहले एक मृतक के दाह संस्कार के लिए 4 क्विंटल लकड़ी दी जा रही थी, परंतु अब लगातार आ रहे मृतकों के शवों के संस्कार किए जाने के लिए लकड़ियों के अभाव को देखते हुए निर्णय लिया गया कि एक शव को जलाने के लिए ढाई क्विंटल लकड़ी ही उपलब्ध करवाई जाएगी। किंगर का कहना है कि अगर गोबर से निर्मित लकड़ी का शव संस्कार में प्रयोग सफल रहेगा, तो वह इसका प्लांट ऋषिकेश में ही, सरकार अगर जगह उपलब्ध करवाएगी तो लगवा देंगे। श्मशान घाट के महापंडित चाहित भारद्वाज ने बताया कि बुधवार को उस समय विकट स्थिति पैदा हुई जब 12 लोगों के शव सामान्य बीमारियों के तथा नौ शव कोविड-19 के मरीजों के आ गए, जिनका दाह संस्कार 5 बजे से रात 11 बजे तक करवाया गया। उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में 5 से 6 शव ही आते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी हो गई है जबकि श्मशान घाट पर इतनी बड़ी संख्या में शवों को जलाने के लिए स्थान का अभाव है। इस कारण बुधवार को कुछ शव खुले आसमान के नीचे जलाए गए। भारद्वाज का कहना था कि यह प्रक्रिया आजकल सुबह 6 बजे से ही प्रारंभ हो जाती है, लेकिन सामान्य दिनों में लोग मृतक का दाह संस्कार 10 बजे बाद ही करते थे। यही हाल टिहरी जिले के साथ आसपास के क्षेत्रों से पूर्णानंद घाट व पौड़ी जिले के किरमोला व बैराज घाट के अतिरिक्त 20 बीघा तथा श्यामपुर के लक्कड घाट पर अंतिम संस्कार किए जाने के लिए आने वाले मृतकों के परिजनों का भी है। उन्होंने मांग की कि उत्तर प्रदेश सरकार की तरह उत्तराखंड सरकार को भी प्रदेश भर के सभी ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में बने श्मशान घाटों का सौंदर्यीकरण किया जाना चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार /विक्रम