नवरात्रि के दूसरे दिन भी भक्तों की मंदिरों में रही धूम

नवरात्रि के दूसरे दिन भी भक्तों की मंदिरों में रही धूम
on-the-second-day-of-navratri-devotees-rocked-the-temples

नई टिहरी, 14 अप्रैल (हि.स.)। नवरात्रि के दूसरे दिन भी भक्त मां भगवती की आराधना में तल्लीन नजर आये। सुबह से माता के मंदिरों में महिला-पुरुष पूजा-अर्चना को पहुंचते दिखे। मां भगवती की आराधना भक्तों ने द्वितीय ब्रहमचारिणी के रूप में की। देवप्रयाग क्षेत्र में महिलाओं ने कन्याओं की पूजा कर देवी का प्रसन्न करने का काम किया। देवी के निशानों व प्रिय चीजों को लेकर भी भक्तों में उत्साह देखने का मिला। देवी प्रसन्न करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ करते भी लोग नजर आये। कुंजापुरी देती है भक्तों को मनमांगी मुरादें नवरात्रों में शक्तिपीठों पर श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ मन्नतें मांगने को पहुंचते हैं। भक्तों का मानना है कि माता के शक्ति पीठों पर पहुंचकर पूजा-अर्चना करने से मानव के सभी संकट दूर होते हैं। मन की मुरादें भी पूरी होती हैं। कुंजापुरी में भी बड़ी संख्या में भक्त मुरादें पूरी होने की उम्मीदों को लेकर पहुंचते हैं। कुंजापुरी देवी दुर्गा का मंदिर है। यह शिवालिक रेंज में तेरह शक्ति पीठों में से एक है। जगदगुरु शंकराचार्य ने टिहरी जिले में स्थापित तीन शक्ति पीठों में से एक है। जिले के अन्य दो शक्ति पीठो में एक सुरकंडा देवी का मंदिर और दूसरा चन्द्रबदनी देवी का मंदिर हैं। कुंजापुरी इन दोनों पीठों के साथ एक पवित्र त्रिकोण बनाता है। शक्ति पीठ उन जगहों पर है जहां भगवान शिव ने बाहों में हिमालय की ओर ले जा रहे देवी सती (भगवान शिव की पत्नी एवं राजा दक्ष की पुत्री) के मृत शरीर के अंग गिरे थे। देवी सती के पिता राजा दक्ष के द्वारा भगवान शिव के बारे में अपमानजनक बातें सुनने पर सती यज्ञ कुण्ड में जल गई थी। जब भगवान शिव को सती की मृत्यु का पता चला तो वे शोक में चले गये। सती के पार्थिव शरीर को लेके हिमालय की ओर निकल पड़े। शिव की उदासीनता को तोड़ने और सृष्टी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने शिव द्वारा ले जा रहे सती के शरीर को सुदर्शन चक्र से काट दिया जिससे सती के अंग विभिन्न पहाड़ियों पर गिरे। सती के शरीर का ऊपरी भाग, यानि कुंजा उस स्थान पर गिरा जो आज कुंजापुरी के नाम से जाना जाता है। इसे शक्तिपीठों में गिना जाता है। माता कुंजापुरी का मंदिर परिक्षेत्र नैसर्गिक छटाओं से भी अटा पड़ा है। यहां से सुर्यास्त व सुर्योदय का नजारा देखत ही बनता है। यह नरेंद्र नगर से 7 किमी, ऋषिकेश से 15 किमी और देवप्रयाग से 93 किमी दूर है। हिन्दुस्थान समाचार/प्रदीप डबराल/