श्रद्धापूर्वक मनाया गया नाग पंचमी का पर्व

श्रद्धापूर्वक मनाया गया नाग पंचमी का पर्व
श्रद्धापूर्वक मनाया गया नाग पंचमी का पर्व

हरिद्वार, 25 जुलाई (हि.स.)। श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी मनाई जाती है। नाग पंचमी का पर्व शनिवार को श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर लोगों ने नाग देवता की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की। नाग पंचमी पर शिवालयों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। नाग पंचमी का महत्व बताते हुए श्री तिभाण्डेश्वर महादेव मंदिर के श्रीमहंत त्रिवेणी दास महाराज ने कहा कि हिंदुू धर्म में नागों का विशेष महत्व है। इनकी पूजा पूरी श्रद्धा से की जाती है। नाग शिव शंकर के गले का आभूषण भी हैं और भगवान विष्णु की शैय्या भी। मान्यताओं के अनुसार नाग देवता का दूध से अभिषेक किया जाता है और उनका पूजन किया जाता है। इससे वो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। अगर कुंडली दोष हो तो उसे दूर करने के लिए भी नाग पंचमी का महत्व अत्यधिक होता है। उन्होंने कहा कि भविष्यपुराण के अनुसार सागर मंथन के दौरान नागों ने अपनी माता की बात नहीं मानी थी जिसके चलते उन्हें श्राप मिला था। नागों को कहा गया था कि वो जनमेजय के यज्ञ में जलकर भस्म हो जाएंगे। घबराए हुए नाग ब्रह्माजी की शरण में पहुंच गए और उनसे मदद मांगने लगे। तब ब्रह्माजी ने कहा कि नागवंश में महात्मा जरत्कारू के पुत्र आस्तिक सभी नागों की रक्षा करेंगे। ब्रह्माजी ने यह उपाय पंचमी तिथि को ही बताया था। आस्तिक मुनि ने सावन मास की पंचमी तिथि को नागों को यज्ञ में जलने से बचाया था। इन्होंने नागों के ऊपर दूध डालकर उन्हें बचाया था। उस समय मुनि ने कहा था कि जो भी पंचमी तिथि को नागों की पूजा करेगा उसे नागदंश से कोई डर नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि एक अन्य मान्यता के अनुसार जब समुंद्र मंथन हुआ था तब किसी को भी रस्सी नहीं मिल रही थी। इस समय वासुकि नाग को रस्सी की तरह इस्तेमाल किया गया था। जहां देवताओं ने वासुकी नाग की पूंछ पकड़ी थी वहीं, दानवों ने उनका मुंह पकड़ा था। मंथन में पहले विष निकला था जिसे शिव भगवान में अपने कंठ में धारण किया था और समस्त लोकों की रक्षा की थी। मंथन से जब अमृत निकला तो देवताओं ने इसे पीकर अमरत्व को प्राप्त किया। इसके बाद से ही इस तिथि को नाग पंचमी के पर्व के तौर पर मनाया जाता है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन के लोगों की जान नाग को हराकर बचाई थी। श्री कृष्ण भगवान ने सांप के फन पर नृत्य किया था, जिसके बाद वो नथैया कहलाए थे। तब से ही नागों की पूजा की परंपरा चली आ रही है। हिन्दुस्थान समाचार/रजनीकांत-hindusthansamachar.in

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