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उत्तराखंड

भाषा को संप्रेषण का माध्यम बनाना चाहिए न कि पाण्डित्य प्रदर्शन: सत्य प्रकाश

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देहरादून, 17 फरवरी (हि.स.)। निदेशक (राजभाषा) सत्य प्रकाश ने कहा कि कार्यालय में भाषा को संप्रेषण का माध्यम बनाना चाहिए न कि पाण्डित्य प्रदर्शन का। उन्होंने राजभाषा अधिनियमों, नियमों पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डालते हुए संसदीय राजभाषा समिति की महत्ता का भी उल्लेख किया। बुधवार को भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा, परिषद के तत्वावधान में राजभाषा हिंदी प्रशिक्षण कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि निदेशक (राजभाषा) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सत्य प्रकाश ने यह भाषा उत्थान पर यह विचार रखे। हिंदी के राजभाषा बनाए जाने के विकासक्रम पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण के पांच प्रमुख तत्व होते हैं जिसमें से एक राजभाषा होती है। राजभाषा किसी भी राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। उन्होंने कार्यालयीन परिवेश में अनुवाद पर विशेष बल देते हुए कहा कि शब्दानुवाद से बचा जाना चाहिए। अनुवाद में संदर्भ को विशेष ध्यान में रखते हुए शब्दों का प्रयोग सावधानी पूर्वक करने का सुझाव दिया। कार्यशाला में डॉ. सुधीर कुमार, उपमहानिदेशक (विस्तार) एवं डॉ. गीता जोशी, सहायक महानिदेशक (मीडिया एवं विस्तार) मंच पर उपस्थित रहे। इसके साथ ही परिषद् (मुख्यालय) पर विभिन्न प्रभागों एवं कार्यालयों के अधिकारियों व कर्मचारियों ने कार्यशाला में शामिल हुए। कार्यशाला के अंत में सहायक महानिदेशक (मीडिया एवं विस्तार) डॉ. गीता जोशी ने सत्य प्रकाश का धन्यवाद किया। इसके साथ ही उन्होंने सभी प्रतिभागियों का भी धन्यवाद ज्ञापित किया। हिन्दुस्थान समाचार/राजेश-hindusthansamachar.in