कुंभ 2021ः नागा साधुओं की धूनी होती है खास

कुंभ 2021ः नागा साधुओं की धूनी होती है खास
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हरिद्वार, 24 मार्च (हि.स.)। कुंभ में नागा संन्यासियों का विशेष महत्व होता है और उनके जीवन में धूनी का। वह अपने तंबुओं में अग्नि की प्रतीक धूनी को स्थापित करते हैं। उसी पर खुद भोजन पकाते हैं। नागा संन्यासियों की धूनी लोगों के लिए एक आकर्षण का केंद्र होती है। श्रद्धालु नागा संन्यासियों के दर्शन धूनी पर ही करते हैं। नागा संन्यासी के जीवन में धूनी, भस्म, त्रिशूल और रुद्राक्ष का विशेष महत्व होता है। कुंभ के दौरान इन नागा संन्यासियों के कई रूप जनता को देखने को मिलते हैं। निरंजनी अखाड़े के सचिव राम रतन गिरी का कहना है कि नागा संन्यासी कुंभ के दौरान अपने अखाड़े की छावनी में अलग तंबू तो लगाते ही हैं साथ ही इस तंबू के बाहर अग्नि की प्रतीक धूनी भी प्रज्ज्वलित करते हैं। इसे कुंभ के अंतिम दिन तक पूजा जाता है। इस धूनी पर ही नागा की पूरी दिनचर्या आधारित होती है। इस धूनी की भस्म से वह अपना प्रतिदिन भस्म शृंगार करते हैं। इसी पर अपने लिए भोजन पकाते हैं। नागा कुंभ के दौरान किसी दूसरे के हाथ का पका भोजन ग्रहण नहीं करते। गिरी का कहना है कि नागा संन्यासी लोगों के आकर्षण का केंद्र इसलिए होते हैं, क्योंकि वस्त्र पहनने वाले संत तो बहुत होते हैं मगर नागा संन्यासी सिर्फ कुंभ में ही दिखते हैं। नागा संन्यासी अजय गिरी का कहना है कि धूनी हमारे लिए प्रत्यक्ष देवता हैं। इनको जो भी भोग दिया जाता है उसको यह ग्रहण करते हैं। धूनी अग्नि का रूप मानी जाती है। धूनी पंचतत्व का स्वरूप होती है। इसके सानिध्य में बैठकर हम तपस्या करते हैं। उनका कहना है कि कुंभ मेले के उपरांत साधु-संत अपने आश्रम में निवास करते हैं। कई साधु देशभर का भ्रमण करते हैं। कुंभ मेला नागा संन्यासियों के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। कुंभ का शाही स्नान करने के लिए सभी नागा संन्यासी पूरे देश से कुंभ नगरी में पहुंचते हैं। इसी कारण लोगों को सभी नागा संन्यासी एक साथ देखने को मिलते हैं। दिगंबर किरण भारती नागा संन्यासी का कहना है कि नागा संन्यासी द्वारा स्थापित की गई धूनी पर तपस्या की जाती है। देश-दुनिया में खुशहाली बनी रहे ये प्रार्थना की जाती है। धूनी पर ही हमारे द्वारा भोजन बनाया जाता है और इसकी भभूति से ही हम शृंगार करते हैं। नागा संन्यासियों की धूनी श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र होती है। नागा संन्यासियों की धूनी भगवान शंकर का प्रतीक होती है। इसके द्वारा ही देवताओं को भोग लगाया जाता है। इसी के सामने बैठकर नागा संन्यासी तपस्या करते हैं। कुंभ में की गयी तपस्या का महत्व और बढ़ जाता है। धूनी की भभूति से ही शृंगार किया जाता है। हिन्दुस्थान समाचार/रजनीकांत/मुकुंद

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