सालों पुरानी परंपरा टूटेगी, इस साल देवीधुरा में नहीं खेला जायेगा बग्वाल
सालों पुरानी परंपरा टूटेगी, इस साल देवीधुरा में नहीं खेला जायेगा बग्वाल
उत्तराखंड

सालों पुरानी परंपरा टूटेगी, इस साल देवीधुरा में नहीं खेला जायेगा बग्वाल

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चंपावत, 02 अगस्त (हि.स.)। पूरे विश्व में प्रसिद्ध मां बाराही धाम देवीधुरा में बग्वाल इस बार नहीं खेला जाएगी। कोरोना महामारी के कारण जिला प्रशासन और मंदिर कमेटी ने यह निर्णय लिया है। इतिहास में यह पहली बार होगा कि जब मां बाराही धाम में बग्वाल का आयोजन नहीं किया जाएगा। रक्षाबंधन के दिन होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल में इस बार सिर्फ पूजा अर्चना और मंदिर मैदान की परिक्रमा चार खाम और सात तोकों के चुनिंदा लोग ही करेंगे। चार खाम और सात तोकों ने मंदिर समिति और जिला प्रशासन के साथ मिलकर यह निर्णय लिया है। कोरोना के कारण वर्षों पुरानी परंपरा टूट जायेगी। मान्यता है कि एक बार अंग्रेजों ने भी बग्वाल को रोकने का प्रयास किया था लेकिन तब भी बग्वाल खेला गया था। बग्वाल में चार खाम और सात थोकों के वीर मां बारही को खुश करने के लिए एक दूसरे पर पत्थरों की बारिश की वर्षा करते हैं। जब तक एक आदमी के शरीर के बराबर रक्त नहीं बह जाता, तब तक यह खेल बग्वाल चलता रहता है। मगर इस बार कोरोना महामारी के चलते बग्वाल का आयोजन नहीं होगा। मान्यता है कि देवीधुरा क्षेत्र में नरवेगी यज्ञ हुआ करता था, जिसमें यहां नर बलि दी जाती थी। एक परिवार में से हर साल एक पुरुष की बलि दी जाती थी। जब एक बार चम्याल खाम की एक वृद्ध महिला के परिवार की बारी आयी तो उसका एक नाती था, जो उसका एक मात्र सहारा था। तब उसने मां बाराही से प्रार्थना की। मां बाराही ने उसे सपने में दर्शन दिये और समस्त गांव वालों के साथ मिलकर बग्वाल के आयोजन करने के लिए कहा। तब से देवीधुरा में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह मेला रक्षाबंधन के दिन ही होता है। कुछ सालों से हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बग्वाल के रूप में भी परिवर्तन आया है। यहां बग्वाल पत्थरों का बजाय फल और फूलों से खेली जाने लगी है। मंदिर में अष्टबलि देने की परंपरा भी थी जो अब बिल्कुल समाप्त हो गई है। हिन्दुस्थान समाचार/राजीव मुरारी-hindusthansamachar.in