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उत्तर-प्रदेश

मुगलकाल में बदला परासौली गांव नाम, योगी सरकार ने किया परिवर्तन, खुशी से झूमे ग्रामीण

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- गांववासी बोले-‘‘नाचन हारी के दो-दो हूजें, इक योगी, इक मोदी। पूरी ऊपर बूरौ दूंगी, आलू की तरकारी। - महमूदपुर अब जाना जाएगा ‘परासौली’ - ऋषि पाराशर की जन्मस्थली, सूरदास की कर्मस्थली है यह गांव - भगवान कृष्ण व राधिका ने गोप-गोपियों संग छह माह किया था महारास मथुरा, 08 अप्रैल (हि.स.)। मुगलकाल में परासौली गांव का नाम परिवर्तन कर महमूदपुर कर दिया गया था, जिससे गांववासी काफी परेशान थे, सूर स्मारक समिति ने 40 साल तक लड़ाई लड़ी। ब्रज तीर्थ विकास समिति की मदद व मुख्यमंत्री की दृष्टि से नाम परिवर्तन संभव हुआ। हम बात कर रहे है जनपद के गोवर्धन तहसील के निकट स्थित महाकवि सूरदास की कर्मस्थली परासौली गांव की। यही खबर जब गांववासियों को दी गई तो वे खुशी मनाते हुए मिष्ठान वितरित किया गया और नाचने लगे, गाने लगे - नाचन हारी के दो-दो हूजें, इक योगी, इक मोदी। पूरी ऊपर बूरौ दूंगी, आलू की तरकारी। सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर दिए जाने की जानकारी मिलने पर गांव वासी झूम उठे। गांव में मिठाई बांटी गई व खुशियां मनाई गईं। क्योंकि, वे सभी सूरदास ब्रज रासस्थली विकास समिति परासौली मथुरा के सचिव हरिबाबू कौशिक की अगुआई में पिछले 40 साल से अनूठे प्रेम के साक्षी राधा और कृष्ण की रासस्थली का नामकरण उसके मौलिक नाम पर कर दिए जाने से अत्यंत खुशी का अनुभव कर रहे थे। आखिर, चार दशक से लंबित उनकी मांग मान ली गई थी। इस संबंध में उत्तर प्रदेश शासन के राजस्व विभाग द्वारा बीते 24 मार्च को जारी की गई अधिसूचना की प्रतिलिपि के माध्यम से कौशिक ने बताया कि वे वर्ष 1982 से परासौली गांव का नामकरण पुनः महमूदपुर से परासौली कराने के लिए राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों से मांग करते चले आ रहे थे। वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2018 में मांग किए जाने पर कार्यवाही शुरु कर दी और भारत सरकार के भी सभी संबंधित विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर विगत 24 मार्च को राज्यपाल की ओर से अधिसूचना भी जारी करा दी गई। सूरदास ब्रज रासस्थली विकास समिति परासौली मथुरा के सचिव हरीबाबू कौशिक ने बताया कि असल में इस गांव का नाम ऋषि पाराशर की जन्मस्थली होने के कारण ‘परासौली’ पड़ा था। दूसरे, वल्लभाचार्य जी के अनुसार भगवान कृष्ण एवं राधारानी ने यहां चंद्र सरोवर के निकट ब्रह्मा जी के एक क्षण यानि छह मास तक रास किया था। जिससे इस स्थली का माहात्म्य बढ़ गया। इसके बाद इस युग में भी महाकवि सूरदास की कर्मस्थली के रूप में विख्यात होने के बाद यह गांव साहित्य एवं संस्कृति की दृष्टि से और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। लेकिन, अफसोस यह है कि यह गांव व यह स्थल इतना महत्वपूर्ण होने के बाद भी सरकारी तौर पर उपेक्षित ही रहा है। जबकि, महाकवि की सभी प्रमुख रचनाओं ने यहीं आकार पाया। इस गांव का दुर्भाग्य यह रहा कि मुगल काल में जब एक बाद इसका नाम बदलकर महमूदपुर कर दिया गया, तो आजादी के सात दशक निकल जाने के बाद भी हमारे तत्कालीन शासकों का ध्यान इस ओर नहीं गया। सूर स्मारक समिति के माध्यम से हम लोग 40 साल से नाम परिवर्तन की मांग करते आ रहे थे। जो अब ब्रजतीर्थ विकास समिति के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र की मदद से मुख्यमंत्री एवं समिति के अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ के माध्यम से संभव हो सका है। हिन्दुस्थान समाचार/महेश