मेरठ में होली मनाने की नायाब परम्परा, मिलती है 'मूर्खाधिराज' की उपाधि

मेरठ में होली मनाने की नायाब परम्परा, मिलती है 'मूर्खाधिराज' की उपाधि
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डॉ. कुलदीप त्यागी मेरठ, 27 मार्च (हि.स.)। ऐतिहासिक नगरी मेरठ में होली मनाने की नायाब परम्परा चली आ रही है। यहां पर मोहल्लों में होली अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। आस्था और उल्लास के साथ लोग रंगों से सराबोर हो जाते हैं। जिमखाना मैदान में होली महोत्सव में लोकप्रिय व्यक्ति को 'मूर्खाधिपति' की उपाधि दी जाती है। लोकप्रियता का पैमाना होती है 'मूर्खाधिपति' की उपाधि नागरिक समिति के तत्वावधान में जिमखाना मैदान में प्रत्येक वर्ष होली मिलन समारोह का आयोजन होता है। वरिष्ठ पत्रकार सुबोध कुमार विनोद की अगुवाई में होली महोत्सव की शुरूआत हुई थी। हास-परिहास के बीच होली महोत्सव में लोगों में मूर्खाधिपति की उपाधि पाने की होड़ मची रहती है। मूर्खाधिपति की पदवी लोकप्रियता का पैमाना होती है। इस कारण नेताओं में भी इसे पाने की होड़ मची रहती है। पूर्व विधायक मोहनलाल कपूर, पूर्व विधायक पंडित जयनारायण शर्मा, पूर्व विधायक मंजूर अहमद, पूर्व मंत्री शाहिद मंजूर को कई बार मूर्खाधिपति की पदवी से नवाजा गया। इस सूची पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत बाजपेयी समेत कई नेता शामिल है। किसी ने भी बुरा माने बिना इस पदवी को धारण किया। किसी को निमंत्रण नहीं दिया जाता जिमखाना मैदान के होली महोत्सव में किसी को भी निमंत्रण नहीं भेजा जाता। दुल्हैंडी के दिन होली खोलने के बाद शाम को कार्यक्रम होता है। लोग अपनी मर्जी से इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं और उत्साह से होली मिलन करते हैं। लंबे समय से यहां पर होली कार्यक्रम आयोजित होता आ रहा है। शहर के कोने-कोने से लोग जिमखाना मैदान में शामिल होने आते हैं। अब प्रत्येक मोहल्ले में होने लगा अलग आयोजन पहले मेरठ शहर में होलिका दहन वृहद पैमाने पर किया जाता था। समय बीतने के साथ ही मोहल्लेवार होलिका दहन होने लगा। दहन से पहले पूजन किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल अग्रवाल का कहना है कि वास्तव में होलिका का पूजन नहीं किया जाता, बल्कि भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह का पूजन किया जाता है। अब इस आयोजन का विस्तार होता जा रहा है। बदले समय के कारण अब जगह-जगह होली चैक बनते जा रहे हैं। कागजी बाजार में सबसे प्राचीन होली चौक पुराने शहर में कागजी बाजार के पास सबसे प्राचीन होलिका दहन स्थल है। इसे आज भी होली चौक कहा जाता है और मोहल्ले को होली मोहल्ला। आज भी यहां पर भव्य तरीके से होलिका दहन होता है। शीशमहल मोहल्ले से पुरोहित को बुलाकर दाऊजी मंदिर में पूजन होता है। इसके बाद पुरोहित सिर पर अग्नि को रखकर लाते हैं और उससे होलिका दहन किया जाता है। यहां पर टेसू के फूल से तैयार रंग से होली खेली जाती है। विभिन्न प्रकार के होते हैं आयोजन शहर में अब सभी मोहल्लों में रंग के आयोजन होते हैं। कैंट स्थित औघड़नाथ मंदिर, मोहनपुरी स्थित दयालेश्वर महादेव मंदिर आदि स्थानों में होली का भव्य आयोजन होता है। लोग रंगों से एक-दूसरे से होली खेलते हैं। शहर के बाहरी हिस्सों में बनी काॅलोनियों में अलग होली उत्सव मनाए जाते हैं। लालकुर्ती स्थित पंचायती मंदिर से होली का जुलूस निकलता है। जिसमें रंग और ठंडाई के ड्रम साथ-साथ चलते हैं। हिन्दुस्थान समाचार/

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