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उत्तर-प्रदेश

गन्ना किसानों की बल्ले-बल्ले, तीन नई प्रजातियां स्वीकृत

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- अर्ली, सामान्य और जलप्लावित क्षेत्रों के लिये एक-एक प्रजातियों को मिली स्वीकृति - ऊसर और जल भराव वाली भूमि पर भी पाएंगे अच्छी उपज गोरखपुर, 20 जनवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लियर खुशखबरी है। तीन नई किस्मों को स्वीकृति मिली है। इनमें से एक अर्ली, दूसरी सामान्य और तीसरी जलप्लावित क्षेत्र के लिए है। इन प्रजातियों को स्वीकृति मिलने से किसानों को ऊसर और जल भराव वाले खेतों में भी अच्छी उपज मिलेगी। उत्तर प्रदेश के तकरीबन 50 प्रतिशत से अधिक गन्ना की खेती वाले भू-भाग पर लहलहाने और सर्वाधिक उपज देने वाली प्रजाति को. 0238 में लाल सड़न वाली बीमारी (रेडरॉट) लगनेके बाद गन्ना किसान काफी चिंतित थे, लेकिन अब तीन नई प्रजातियों के स्वीकृत होने के बाद किसान राहत की सांस ले सकेंगे। हालांकि, किसानों को होने वाली आय की भरपाई कर पाना अभी आसान नहीं होगा। हां, यह जरूर है कि अधिक जलभराव वाले खेतों में बरसात की वजह से होने वाली हानि रुक जाएगी। ऊसर जमीन पर भी गन्ना की बुवाई करने के बाद भी अच्छी उपज ले सकेंगे। इन प्रजातियों को मिली स्वीकृति जिन तीन नई प्रजातियों को स्वीकृति मिली है उनमें शीघ्र पकने वाली यानी अर्ली वेराइटी को-लख 14201, दूसरी प्रजाति कोशा 14233 और तीसरी प्रजाति 10239 शामिल हैं। को-लख 14201 है अर्ली वेराइटी को-लख 14201 अर्ली वेराइटी है। इसे भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ ने विकसित किया है। इसकी औसत उपज 350 से 400 कुंतल प्रति एकड़ और चीनी परता (रिकवरी) 12 प्रतिशत है। को.शा. 14233 की हैं खूबियां दूसरी प्रजाति को.शा. 14233 मध्य-देर से पकने वाली प्रजाति है। इसे शाहजहाँपुर गन्ना शोध केंद्र ने विकसित किया है। इसकी औसत उपज 400 कुंतल प्रति एकड़ है। इसमें चीनी परता (रिकवरी) भी 13 प्रतिशत है। बोले सहायक निदेशक उप्र गन्ना किसान संस्थान प्रशिक्षण केंद्र पिपराइच गोरखपुर के सहायक निदेशक ओमप्रकाश गुप्ता का कहना है कि तीसरी प्रजाति 10239 जल-प्लावित क्षेत्र के किसानों को संजीवनी देने वाला है। जलप्लावित क्षेत्रों के लिए स्वीकृत अन्य प्रजातियों में को-लख 94184, को. 98014, को.शा. 8279, को.से. 8452, 11453, को.शा. 10239, यू.पी. 9530, को.से. 96436 आदि प्रमुख हैं। हिन्दुस्थान समाचार/आमोद/दीपक-hindusthansamachar.in