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उत्तर-प्रदेश

आत्मनिर्भर: किन्नर मोहिनी ने शुरू किया मुर्गी पालन

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लखनऊ, 19 फरवरी (हि.स.)। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के द्वारा विकसित सहभागिता संस्था के सहयोग से मोहनी नामक किन्नर ने मलिहाबाद में अपने जीवनयापन के लिए मुर्गी पालन व्यवसाय को चुना है। मलिहाबाद के आम के बागों में मुर्गी पालन को व्यवसायिक बनाने के लिए संस्थान द्वारा फार्मर्स फर्स्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत प्रयासों के फल स्वरुप कई भूमिहीन एवं छोटी जोत वाले किसानों ने आम के बागों के बीच में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित कारी निर्भीक, कारी देवेंद्र, कारी शील और कड़कनाथ को पालना प्रारंभ किया। किन्नरों को अधिकतर अपने ही परिवार से विस्थापित होना पड़ता है। इनके साथ सामाजिक रूप से दुर्व्यवहार और अत्याचार होता रहा है। पहली बार 2011 भारतीय जनगणना में ट्रांसजेंडर आबादी की गणना की गयी, जिनकी संख्या साढ़े 4.5 लाख है, लेकिन असल में इनकी संख्या 20 लाख के आस पास हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2014 से भारतीय कानून में किन्नरों को तीसरा लिंग घोषित किया, लेकिन फिर भी अधिकत्तर किन्नर आज भी इस आधुनिकता के युग में परंपरागत पेशा को अपनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के फार्मर फर्स्ट परियोजना द्वारा चलाये जा रहे आम आधारित मुर्गी पालन से प्रेरित होकर माल-मलिहाबाद प्रखंड की किन्नर 35 वर्ष की मोहिनी ने परंपरा से हटकर अपना व्यवसाय शुरू किया है, जो अन्य किन्नरों के लिए भी एक मिसाल है। उन्होंने फार्मर फर्स्ट परियोजना से जुड़कर अपना कड़कनाथ पोल्ट्री फार्म खोलने का मन बनाया। इसके बाद सहभागिता स्वयं सहायता समूह, मलिहाबाद से इसके बारे में प्रशिक्षण प्राप्त किया। जिसमे इनको कम लागत में बाड़ा बनाना, दाना बनाना तथा बीमारियों से बचाने का उपाय बताया गया। प्रशिक्षण लेने के बाद मोहिनी ने आर्यन बागवान पोल्ट्री फार्म, माल-मलिहाबाद से मुर्गों की बिरादरी का शेर कहे जाने वाले कड़कनाथ के 500 चूजे क्रय करके अपना व्यवसाय शुरू किया। मोहिनी ने बताया कि लैंगिक भेदभाव के कारण हमलोगों को कोई जल्दी न तो नौकरी देता है और न ही बैंक स्वरोजगार के लिए लोन देना चाहती है। जिसके वजह से आज भी हम लोगों का मुख्य पेशा शिशु के जन्म पर घर-घर जाकर बधाई देना और ईनाम बख्शीस लेना होता है। उन्होंने किन्नरों से निवेदन किया कि अपना खुद का व्यवसाय शुरू करके आत्मनिर्भर बनें। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के निदेशक डॉ शैलेन्द्र राजन ने बताया कि आम बागवानों की आय बढ़ाने हेतु मलिहाबाद प्रखंड के तीन गांव में फार्मर फर्स्ट परियोजना चलाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत आम बागवानों को बांगो में पाले जानी वाली मुर्गी की नस्ल जैसे कैरी निर्भीक, कैरी देवेन्द्र, अशील, कड़कनाथ इत्यादि दी गई। ये मुर्गियां बाग में चरती हैं और अपना भोजन कीटों, खरपतवारों के बीजों एवं सड़े-गले अनाज, सब्जिओं एवं हरे चारे से प्राप्त कर लेती हैं। उन्होंने बताया कि इन मुर्गियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने के कारण पालने में खर्च कम आता है। जबकि ब्रायलर मुर्गो की तुलना में प्रति मुर्गों की कीमत 1000 रुपये से अधिक मिलती है। उन्होंने बताया की फार्मर फर्स्ट परियोजना के अंतर्गत छोटे एवं सीमांत किसान, महिलाओं, बंजारों एवं किन्नरों को भी जोड़कर उनको स्वरोजगार के लिए प्रेरित करके आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हिन्दुस्थान समाचार/उपेन्द्र