महामारी का कहर : सब्जियों के दाम नहीं मिलने से आर्थिक नुकसान से जूझ रहे किसान

महामारी का कहर : सब्जियों के दाम नहीं मिलने से आर्थिक नुकसान से जूझ रहे किसान
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मीरजापुर, 13 मई (हि.स.)। वैश्विक महामारी कोरोना आदमी ही नहीं खेती बाड़ी पर भी कहर बरपा रहा है। हालत यह है कि पूर्णबंदी के दौरान खेत से सब्जी को मंडी तक पहुंचने में लगने वाला भाड़ा भी नहीं मिल पा रहा है। जुताई, महंगा बीज, खाद-पानी के बाद जी-तोड़ मेहनत का तो कोई मोल ही नहीं है। सब्जी उत्पादक किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। राजगढ़ क्षेत्र में धान गेहूं के आलावा बड़े पैमाने पर सब्जी का उत्पादन किया जाता है। सब्जियाँ भारी मात्रा मेंं जिले के साथ ही अन्य जिलों में भी भेजी जाती हैं। लेकिन पूर्णबंदी में सब्जियां खेतों में सड़ रही हैं। शुरूआती दौर में लौकी 20, बैगन 25, नेनुआ 40, करेला 50, टमाटर 20, बोड़ा (बजरबट्टू) 40, परवल 60, कोहड़ा 25, खीरा 20 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहे थे। लेकिन बंदी के बाद इन्हीं सब्जियों के दाम जमीन पकड़ लिए हैं। लौकी तीन, कोहड़ा पांच, नेनुआ चार, करेला 10, टमाटर पांच, परवल 20, खीरा तीन रुपए व बैगन साढे़ तीन प्रति किलो की दर मंडियों में है। चिलचिलाती धूप में कड़ी मेहनत कर, ऊंची लागत लगाने के बाद सब्जी का उत्पादन करते हैं। सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध अहरौरा कोइरान बाजार के खेतों में पत्ता गोभी, टमाटर आदि सड़ते हुए देखा जा सकता है। सब्जी उत्पादक बिहारी बताते हैं कि कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन में सब्जियों के दाम को कौन कहे लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा है। मजदूरों से तोड़ाई और मंडी तक पहुंचाने का भाड़ा तक सब्जियों के मूल्य से ज्यादा है। दुकाने बन्द होने से छोटे छोटे फुटकर सब्जी बेचने वाले भी परेशान हैं। साइकिल व ठेला पर रखकर गांव-गांव घूमकर सब्जी बेच रहे हैं। पिछले साल के लाकडाउन से किसानों की कमर टूट चुकी है। इस बार इसकी भरपाई की पूरी उम्मीदें थी। लेकिन कोरोना ने अरमानों पर पानी फेर दिया। हिन्दुस्थान समाचार/ गिरजा शंकर/विद्या कान्त

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