किसानों की आड़ में राजनीति या सरकार बनाम किसान
उत्तर-प्रदेश

किसानों की आड़ में राजनीति या सरकार बनाम किसान

स्तंभ लेखन

Sunil Bhatt

भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था है|इस व्यवस्था में सरकारी और निजी क्षेत्र की सहभागिता होती है|मिश्रित अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान होता है|किसान भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी है|किसान के बिना कृषि शब्द का कोई महत्व नहीं है|किसान और कृषि एक दूसरे के पूरक हैं|कृषि क्षेत्र में पैदावार बढ़ने से किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी|हाल ही में किसानो द्वारा भारत सरकार पर एम.एस.पी.(मिनिमम सपोर्ट प्राइस) पर क़ानून बनाने पर जोर दिया जा रहा है| जिसके चलते किसान आंदोलित है|सरकार एम.एस. पी .(न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर कानून बनाने को राजी नहीं है|सरकार किसानो को यह आश्वासन जरूर दे रही कि एम.एस.पी. ख़त्म नहीं होगा और किसानो की फसल सरकार एम.एस.पी. पर खरीदती रहेगी|सरकार किसान की फसल के लिए एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित करती है,जिसे एम.एस.पी. कहा जाता है।एम.एस.पी.में सरकार की तरफ से गारंटी होती है की हर हाल में किसान को उसकी फसल के लिए तय दाम मिलेंगे|अगर मंडियों में किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य या उससे ज्यादा पैसे नहीं मिलते तो सरकार किसानों से उनकी फसल एम.एस.पी. पर खरीद लेती है। इससे बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर नहीं पड़ता। स्वतंत्रता के बाद शुरूआती दशकों में किसानो की फसलों का अत्यधिक उत्पादन हो जाने पर उन्हें उसके अच्छे दाम नहीं मिल पाते थे| फलस्वरूप किसान अपनी फसलों का वाजिब दाम पाने के लिए आंदोलन करने लगे|तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1 अगस्त 1964 को एल.के.झा. के नेतृत्व में एक समिति बनाई जिसका काम अनाजों की कीमतें तय करना था |समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद 1966-67 में पहली बार गेहूं के लिए एम.एस.पी. का ऐलान किया गया।इसके बाद से हर साल सरकार बुवाई से पहले फसलों का एम. एस. पी. घोषित कर देती है। देश में एम.एस.पी. तय करने का काम कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का है। कृषि मंत्रालय के तहत काम करने वाली यह संस्था शुरुआत में कृषि मूल्य के नाम से जानी जाती थी। बाद में इसमें लागत भी जोड़ दी गई,जिससे इसका नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग हो गया। यह अलग-अलग फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती है। वहीं गन्ने का एम.एस.पी. तय करने की जिम्मेदारी गन्ना आयोग के पास होती है।एम. एस. पी. तय करने के बाद सरकार स्थानीय सरकारी एजेंसियों के जरिये अनाज खरीदकर फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफ.सी.आई.) और नेफेड(नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के पास उसका भंडारण करती है। फिर इन्हीं स्टोर्स से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) के जरिये गरीबों तक सस्ते दामों में अनाज पहुंचाया जाता है।शुरुआत में केवल गेहूं के लिए एम.एस.पी. तय किया गया था। इससे किसान बाकी फसलों को छोड़कर सिर्फ गेहूं की फसल उगाने लगे, जिससे अनाजों का उत्पादन कम हो गया। फिर सरकार की तरफ से धान, तिलहन और दलहन की फसलों पर भी एम.एस.पी. दिया जाने लगा। फिलहाल

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धान,गेहूं,मक्का,जई,जौ,बाजरा,चना,अरहर,मूंग,उड़द,मसूर,सरसों,सोयाबीन,सूरजमूखी,गन्ना,कपास,जूट समेत 20 से अधिक फसलों पर एम.एस.पी. दिया जाता है। फसलों की बुआई से पहले एम.एस.पी. तय की जाती है।जबकि कटाई के बाद प्रोक्योरमेंट घोषित किया जाता है। दरअसल साल 1968-69 के बाद से ही एम.एस.पी. और प्रोक्यरमेंट को एक जैसा समझा जाने लगा। प्रोक्योरमेंट के लिए अलग से कोई व्यवस्था नही की गई। एमएसपी को ही प्रोक्योरमेंट माना जाने लगा। आज किसान बिल आने के बाद शोर मचाया जा रहा है कि किसानों के साथ अन्याय हो रहा है लेकिन 1969 के बाद से ही एम.एस.पी. और प्रोक्योरमेंट को एक ही में मिला दिया गया। जिसके चलते हुआ है कि बुआई से पहले और कटाई के बाद जो फसल उगाने का खर्च बढ़ा उसके बारे में किसी ने सोचा ही नहीं| न पुरानी सरकार ने, न ही मौजूदा सरकार ने। प्रत्येक राजनैतिक पार्टी अपनी राजनीती चमकाने के लिए किसान बिल को आधार बना रही है|किसानो का मसला है और देश का असली किसान सरकार के पक्ष में है|सड़क पर उतरकर आंदोलन करने वाला हर व्यक्ति किसान नहीं है|किसानो की आड़ में राष्ट्र विरोधी तत्व भी अपना हाथ सेक लेने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं |एम.एस.पी और प्रोक्योरमेंट पुराना मसला है अतएव किसानो को भी चाहिए की आपसी सहमति का परिचय दें| देश का असली किसान अपने खेतों खलिहानो में है न की सड़को पे|जो किसान सड़क पर है उसको भी राष्ट्रहित के बारे में सोचना चाहिए न की राष्ट्र के विरोध में|किसान की बात सरकार मान ले तो राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर काफी बोझ पड़ जाएगा| भारत सरकार को राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी देखनी है|यंहा तो आंदोलित किसान और विपक्षी पार्टियां सिर्फ और सिर्फ अपना भला देख रहे हैं|किसानों से एम.एस.पी. पर खरीदे गए अनाज से सरकार सिर्फ पी.डी.एस.(सार्वजनिक वितरण प्रणाली) में राशन बांटती है|बाजार में किसी अनाज की कमी होती है,तो सरकार अपने भंडार से अनाज जारी करती है| भंडारों में रखा सरकार का अधिकतर अनाज खराब हो रहा है|इसके बावजूद सरकार हर साल किसानों से अनाज खरीदती है जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है|कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर अशोक गुलाटी का कहना है,'आज देश में इतना अनाज है कि देश में रखने की जगह नहीं है|किसान कहता है कि मेरे से ले लो, चाहे जहां फेंको|आज देश को दलहन और तिलहन की जरूरत है|इनका काफी आयात होता है| उनके लिए प्रोक्योर करके एम.एस.पी. क्यों नहीं करते हैं|क्या सिर्फ गेहूं और चावल से आगे बढ़ना है हमें? सरकार भले ही 20 से ज्यादा फसलों के लिए एम.एस.पी. तय करती है,लेकिन आमतौर पर सरकारी स्तर पर खरीद केवल गेहूं और धान की हो पाती है। ऐसे में सभी किसानों को एम.एस.पी. का फायदा नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह है कि गेहूं और धान को सरकार पी.डी.एस. प्रणाली के तहत गरीबों को देती है इसलिए उसे इसकी जरूरत होती है। बाकी फसलों की उसे इतने बड़े स्तर पर जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए उनकी खरीद नहीं हो पाती|किसान बिल पर पर सबसे ज्यादा जोर पंजाब और हरियाणा के किसान का ही क्यों है? क्योंकि एम.एस.पी. का सबसे ज्यादा फायदा पंजाब और हरियाणा के किसानों को मिल रहा है| पंजाब के किसानों का 95% से ज्यादा अनाज तो एम.एस.पी पर बिक जाता है लेकिन बाकी देश के सिर्फ 6% किसान ही अपना अनाज एम.एस.पी. पर बेच पाते हैं |वहीं सरकार के लिए समस्या ये है कि अगर उसने सभी फसलें एम.एस.पी. पर खरीदनी शुरू कर दीं तो सरकार के खजाने पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ जाएगा|कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना का कहना है,'23फसलों का पूरा प्रोडक्शन निकालते हैं और पूरा एमएसपी खरीदते हैं तो ये पूरा 15 लाख करोड़ होता है|जिस तरह से किसानों ने घेराबंदी कर दी है,अगर प्राइवेट सेक्टर भी कह दे कि हम नहीं खरीदेंगे तो सरकार क्या करेगी?व्यापारी वर्ग क्या करेगा?वो कहेगा हम बाजार से नहीं खरीदेंगे,सरकार से खरीदेंगे तो सरकार को 15 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे|ऐसे में किसान खड़ा होगा और कहेगा कि मैं सब कुछ छोड़ कर वही उगाऊंगा जो सरकार खरीदेगी|ऐसा होने पर 30 लाख करोड़ रुपये का कृषि खरीद का बजट होगा और आपका टोटल रेवेन्यू 16 लाख करोड़ है तो क्या देश पर ताला लगवाना है?'किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ है तो उसका आंदोलन अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहा है|अतएव हम कह सकते हैं न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानो का आंदोलन अपरिपक्वता की निशानी है|

लेखक: डॉ. शंकर सुवन सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं प्रॉक्टर, (खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग), शुएट्स , नैनी, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

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