काशी के प्रकांड विद्वान रेवा प्रसाद द्विवेदी नहीं रहे, पाण्डित्य परम्परा का एक अंग टूटा

काशी के प्रकांड विद्वान रेवा प्रसाद द्विवेदी नहीं रहे, पाण्डित्य परम्परा का एक अंग टूटा
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वाराणसी, 22 मई (हि.स.)। धर्म नगरी काशी के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी नहीं रहे। 90 वर्षीय पंडितजी ने शुक्रवार देर शाम अन्तिम सांस ली। शनिवार सुबह उनके निधन की जानकारी पाते ही काशी के विद्वानों में शोक की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया के जरिये शोक श्रद्धांजलि देने का तांता लग गया। काशी हिन्दू विश्वविद्वयालय (बीएचयू) के वरिष्ठ प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि एक सांस्कृतिक धरोहर का तिरोधान-एक युग का अवसान - आज काशी के पाण्डित्य परम्परा का एक अंग ही टूट गया। हम सबके आध्यात्मिक प्रेरणा स्रोत पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी स्वामी करपात्री के अनन्य शिष्यों में से थे। 70 के दशक में काशी में पं रेवा प्रसाद द्विवेदी, महन्त प्रो. भद्र मिश्र, प्रो.विद्या निवास मिश्र, हरिहर नाथ त्रिपाठी, शिव दत्त शर्मा चतुर्वेदी, पं गोपाल त्रिपाठी, कमलेश दत्त त्रिपाठी, गिरजा शंकर सिंह, बटुक शास्त्री जैसे काशी के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, अकादमिक क्षेत्र में बड़े नाम थे। इन महापुरूषों ने काशी की पाण्डित्य परम्परा को सुदृढ़ करने में अद्भुत कार्य किया। रेवा प्रसाद का जाना इस महान परम्परा का काशी से तिरोहित हो जाना है। वर्ष 1935 में मध्य प्रदेश के नांदेर में जन्मे पंडितजी की उच्च शिक्षा बीएचयू में हुई थी। स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद संस्कृत विश्वविद्वयालय से शोध और जबलपुर विश्वविद्वयालय से डी—लिट किया था। वे संस्कृत भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार रहे। इनके लिखित महाकाव्य स्वातंत्रसंभवम् के लिए वर्ष 1991 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार, कबीर सम्मान, वाचस्पति सहित कई राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया है। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर/विद्या कान्त

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