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उत्तर-प्रदेश

राम जन्मभूमि विवाद पर फैसला सुनाने वाले जस्टिस डीवी शर्मा का निधन

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प्रयागराज, 07 मई (हि.स.)। अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद पर 30 सितम्बर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की ओर से सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले में तीन जजों की बेंच में शामिल रहे जस्टिस धर्मवीर शर्मा का शुक्रवार को को निधन हो गया। सेवानिवृत्त होने के बाद वे परिवार के साथ लखनऊ रह रहे थे। पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। जस्टिस धर्मवीर शर्मा का जन्म 02 अक्टूबर, 1948 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक किसान परिवार में हुआ था। 1970 में वकालत की डिग्री हासिल करने के बाद जस्टिस शर्मा ने उत्तर प्रदेश में मुख्य कानून अधिकारी और सहायक न्यायिक सचिव जैसे पदों पर काम किए। वर्ष 2002 में उनकी नियुक्ति जिला और सत्र न्यायाधीश के रुप में हुई। अगस्त, 2003 से अगस्त, 2004 के बीच वह उत्तर प्रदेश सरकार में प्रधान न्यायिक सचिव रहे। वर्ष 2005 में अतिरिक्त जज के रुप में इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी नियुक्ति हुई और सितम्बर, 2007 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थाई जज के रुप में शपथ ली थी। जस्टिस शर्मा 01 अक्टूबर, 2010 को अपने पद से सेवानिवृत्त हो गए थे। राम जन्म भूमि विवाद को तय करने के लिए चीफ जस्टिस के आदेश से बनी तीन जजों की पूर्णपीठ में जस्टिस शर्मा की राय फैसला में दो जजों से अलग थी। जस्टिस शर्मा की राय थी कि पूरे विवादित परिसर को हिंदुओं को दिया जाना चाहिए। अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद पर 30 सितम्बर, 2010 को फैसला सुनाने वाली इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ में शामिल जस्टिस डीवी शर्मा की राय बाकी दो न्यायाधीशों जस्टिस एसयू खान और सुधीर अग्रवाल से अलग थी। जस्टिस शर्मा ने अपनी अलग राय देते हुए कहा था कि विवादित परिसर भगवान राम की जन्मस्थली है। इस स्थल पर मुगल शासक बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था। परिसर में स्थित मस्जिद के परीक्षण के बाद यह बात साफ हो जाती है इसलिए पूरा विवादित परिसर हिंदुओं को दिया जाए। अपने फैसले में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था कि विवादित स्थल भगवान राम का जन्मस्थान है। यह स्थान भगवान राम के बालरूप की दैवीय भावना को प्रदर्शित करता है। हर व्यक्ति को किसी भी रूप में उनका ध्यान करने का अधिकार है। विवादित भवन का निर्माण बाबर ने करवाया था। विवादित ढांचे को उसी जगह ये पुरानी संरचना को गिराकर बनवाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से साबित हुआ है कि वह संरचना हिंदुओं का एक विशाल धार्मिक स्थान थी। विवादित ढांचे के मध्य गुंबद में 1949 के 22-23 दिसम्बर की रात को मूर्तियां रखी गई थीं। यह साबित हो चुका है कि विवादित स्थल का बाहरी परिसर भी हिंदुओं के कब्जे में था। विवादित ढांचे को मस्जिद नहीं माना जा सकता है, क्योंकि उसे इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बनाया गया था। जस्टिस धरम वीर शर्मा के निधन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। हिन्दुस्थान समाचार/आर.एन/विद्या कान्त