हाईकोर्ट ने अवैध निरूद्धि पर बनी सरकारी नीति की सराहना की

हाईकोर्ट ने अवैध निरूद्धि पर बनी सरकारी नीति की सराहना की
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कहा, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई व पीड़ित को मुआवजा की पॉलिसी सही प्रयागराज, 11 जून (हि.स.)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसी व्यक्ति को अवैध निरूद्धि में रखने के दोषी अधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही करने एवं पीड़ित को मुआवजा देने की 23 मार्च 21 की सरकारी नीति की सराहना की है। कोर्ट ने मुख्य सचिव व अपर मुख्य सचिव गृह को इस नीति का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश दिया है। इस नीति में सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम लोगों के जीवन के मूल अधिकार का हनन करने वाले दोषी अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी। उत्पीड़न व अवैध निरूद्धि की शिकायत की जांच तीन माह में पूरी की जायेगी और अवैध निरूद्धि सिद्ध होने पर पीड़ित को 25 हजार रूपये का तत्काल मुआवजा मिलेगा। कोर्ट ने कहा है कि इस नीति को प्रदेश के सभी ब्लाकां, तहसील मुख्यालयों, जिला कलेक्ट्रेट व पुलिस थानों में डिस्प्ले बोर्ड पर लगाया जाय और अखबारों में प्रकाशित किया जाय। कहा गया है कि आदेश की प्रति सभी तहसील व जिला बार एसोसिएशन को भेजी जाय। यह आदेश न्यायमूर्ति एस पी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने रोहनिया, वाराणसी के शिव कुमार वर्मा व अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सरकारी सेवक साथ ही आम लोगों का भी सेवक है। इसलिए उसे अपनी शक्ति का इस्तेमाल अपने पद के दायित्व के दायरे में ही करना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण कार्य उत्पीड़नात्मक कार्रवाई होगी। किसी भी अधिकारी द्वारा शक्ति का दुरूपयोग करने पर उसे किसी कानून मे संरक्षण नहीं मिला है। परिणाम भुगतने की उसकी जवाबदेही होगी। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों द्वारा आम लोगों का उत्पीड़न किया जाना न केवल उस व्यक्ति की क्षति है, वरन असहाय की मनोदशा को चोट पहुंचाने वाली सामाजिक क्षति है। ऐसे में पीड़ित को मुआवजा दिलाना सामाजिक बुराई को हतोत्साहित करना भी है। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों का राजनैतिक संरक्षण नहीं है, आर्थिक रूप से सबल नहीं है, वे नौकरशाही की मनमानी कार्रवाई का मुकाबला नहीं कर सकते। इससे उनका सिस्टम से भरोसा उठने लगता है और फ्रस्ट्रेशन आने लगता है। इसलिए विवेकाधिकार का मनमाना प्रयोग करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई के साथ पीड़ित को मुआवजा पाने का अधिकार है। सरकार ऐसी राशि की वसूली दोषी अधिकारियों से अवश्य करे। मालूम हो कि जमीन बंटवारे को लेकर पारिवारिक विवाद व झगडे़ की स्थिति को लेकर पुलिस ने धारा 151 में चालान किया। 8 अक्टूबर 20 को दरोगा ने प्रिंटेड फार्म पर नाम भरकर रिपोर्ट भेजी। जिस पर एसडीएम ने केस दर्ज किया। याची ने 12 अक्टूबर 20 को बंधपत्र दिया, किन्तु उसे रिहा नहीं किया गया। खतौनी के सत्यापन की तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी। 21 अक्टूबर को पेश करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट आने पर याची रिहा किया गया। यह याचिका दायर कर याची ने 12 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 20 तक अवैध निरूद्धि के मुआवजे की मांग की। कोर्ट के निर्देश पर डीजीपी ने सभी पुलिस अधिकारियों को सचिव के आदेश का पालन करने का परिपत्र जारी किया और कहा कि चालान प्रिंटेड नहीं होगा। और पूर्ण विवरण, पत्रजात के साथ चालान रिपोर्ट भेजी जाय। मुआवजे के मुद्दे पर सरकार ने नीति जारी कर कोर्ट मे पेश की। जिस पर कोर्ट ने यह आदेश दिया है और कहा है कि मुआवजे की नीति आने के बाद याची के लिए अलग से आदेश देने की आवश्यकता नहीं है। हिन्दुस्थान समाचार/आर.एन