देश में प्रतिवर्ष 10 से 15 हजार बच्चे आनुवंशिक बीमारी थैलेसीमिया से होते हैं ग्रसित

देश में प्रतिवर्ष 10 से 15 हजार बच्चे आनुवंशिक बीमारी थैलेसीमिया से होते हैं ग्रसित
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— रोग के खात्मे को जागरुकता जरुरी, बच्चों को माता-पिता से मिलती है बीमारी कानपुर, 07 मई (हि.स.)। थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त-रोग है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन के निर्माण की प्रक्रिया ठीक से काम नहीं करती है और रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस बीमारी से प्रतिवर्ष देश में 10 से 15 हजार बच्चे प्रभावित होते हैं। यह बातें जीएसवीएम मेडिकल कालेज के शिशु विभाग के प्रो. डा. एके आर्य ने शुक्रवार को विश्व थैलेसीमिया दिवस पर कही। उन्होंने बताया कि यह बीमारी हीमोग्लोबिन की कोशिकाओं को बनाने वाले जीन में म्यूटेशन के कारण होती है। हीमोग्लोबिन आयरन व ग्लोबिन प्रोटीन से मिलकर बनता है। ग्लोबिन दो तरह का होता है – अल्फ़ा व बीटा ग्लोबिन। थैलेसीमिया के रोगियों में ग्लोबीन प्रोटीन या तो बहुत कम बनता है या नहीं बनता है जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। इससे शरीर को आक्सीजन नहीं मिल पाती है और व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ब्लड ट्रांस्फ्युसन की प्रक्रिया जनसंख्या के एक छोटे अंश को ही मिल पाती है बाकी रोगी इसके अभाव में अपनी जान गंवा देते हैं। बताया कि यह कई प्रकार का होता है –मेजर, माइनर और इंटरमीडिएट थैलेसीमिया। संक्रमित बच्चे के माता और पिता दोनों के जींस में थैलेसीमिया है तो मेजर, यदि माता-पिता दोनों में से किसी एक के जींस में थैलेसीमिया है तो माइनर थैलेसीमिया होता है। इसके अलावा इंटरमीडिएट थैलेसीमिया भी होता है जिसमें मेजर व माइनर थैलीसीमिया दोनों के ही लक्षण दिखते हैं। थैलेसीमिया के लक्षण इस बीमारी से ग्रसित बच्चों में लक्षण जन्म से चा या छह महीने में नजर आते हैं। कुछ बच्चों में पांच-10 साल के मध्य दिखाई देते हैं। त्वचा, आंखें, जीभ व नाखून पीले पड़ने लगते हैं। प्लीहा और यकृत बढ़ने लगते हैं, आंतों में विषमता आ जाती है, दांतों को उगने में काफी कठिनाई आती है और बच्चे का विकास रुक जाता है। हिन्दुस्थान समाचार/महमूद