आपातकाल: अमानवीय यातनाओं से भी नहीं डिगा लोकतंत्र रक्षकों का हौसला

आपातकाल: अमानवीय यातनाओं से भी नहीं डिगा लोकतंत्र रक्षकों का हौसला
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मेरठ, 24 जून (हि.स.)। 25 जून, 1975 को देश में ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसने देश में कोहराम मचा दिया। लोकतंत्र को बंधक बनाकर लोगों को जबरन जेल भेज दिया गया। लोकतंत्र सेनानियों को अमानवीय यातनाएं दी गई, लेकिन उनका हौसला नहीं डिगा। आज भी लोकतंत्र सेनानी उस समय के दमन चक्र को याद करके गुस्से से भर जाते हैं। मेरठ काॅलेज में हुआ था सत्याग्रह भारतीय लोकतंत्र रक्षक सेनानी समिति मेरठ के अध्यक्ष प्रदीप चंद्र कंसल बताते हैं कि आपातकाल के समय वह मेरठ काॅलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के छात्र थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के काॅलेज संयोजक थे। काॅलेज छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी को महामंत्री समेत चार में से तीन पदों पर जीत हासिल हुई। आपातकाल लागू होते ही आरएसएस, एबीवीपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके विरोध में विद्यार्थियों ने आंदोलन का बिगुल बजा दिया। मेरठ काॅलेज में वह खुद सत्याग्रह के लिए आगे आए और अपने नेताओं के जिन्दाबाद और तानाशाही सरकार के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाए। उस समय पुलिस ने छात्रों की पिटाई शुरू की तो छात्र पुलिस पर ही टूट पड़े। उन्होंने खुद बीच में जाकर पुलिसकर्मियों को बचाया। जेल जाने के बाद भी उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गई, लेकिन उनका हौसला नहीं डिगा। पिता के घर पहुंच गया कुर्की का नोटिस भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण वशिष्ठ आपातकाल के समय मेरठ काॅलेज छात्र संघ के महामंत्री थे और सरकार की तानाशाही विरोधी कार्य में अग्रणी रहे। एबीवीपी कार्यकर्ता के नाते आपात काल लगते ही उनके खिलाफ पांच मुकदमे दर्ज किए गए। बाद में एक मुकदमा मीसा के तहत भी दर्ज हुआ। गिरफ्तारी के समय उनकी आयु साढ़े 22 साल थी। उनके दिल्ली स्थित पिता के घर पर कुर्की का नोटिस पहुंच गया। इसके बाद 16 जुलाई को कोर्ट में सरेंडर किया। जेल में भी उनका हौसला नहीं डिगा और वह आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करते रहे। कुल 19 माह जेल में रहने के दौरान वहां के बदतर इंतजाम, दोयम दर्जे का भोजन, शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गई। इनकी दुकान से चलता था आंदोलन पल्हैड़ा निवासी लोकतंत्र सेनानी 75 वर्षीय जन्मेजय चौहान की आपातकाल के समय बेगमपुल पर रेडियो रिपेयरिंग की दुकान थी। उनके छोटे भाई शीलेंद्र चैहान बततो हैं कि 09 दिसम्बर 1975 को उनके भाई जन्मेजय तीन लोगों के साथ जेल गए थे। जेल में उन्हें बहुत यातनाएं दी गईं। छह माह बाद उनकी जमानत हुई। इसके बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए कार्य जारी रखा। इसके बाद खूनी पुल से संघ के नगर प्रचारक रामलाल और वीरेंद्र के साथ जन्मेजय को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। आपातकाल खत्म होने के बाद ही उनकी रिहाई हो पाई। महिलाओं ने भी दी थी गिरफ्तारी आपातकाल का विरोध करने वालों में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। सिविल लाइन्स थाना क्षेत्र के मानसरोवर में रहने वाली कृष्णकांता तोमर अपने पांच वर्षीय पुत्र धर्मेंद्र तोमर और अपनी मकान मालकिन कृष्णा वत्स के साथ नारेबाजी करती हुई बेगमपुल पहुंच गई। वहां पर लालकुर्ती पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। दोनों महिलाओं की एक माह बाद जेल से रिहाई हुई। इसके बाद भी वह आपातकाल का विरोध करने में जुटी रहीं। 20 महीने तक फरार रहे गोपाल अग्रवाल समाजवादी नेता गोपाल अग्रवाल ने भी आपातकाल का जमकर विरोध किया। उस समय वह समाजवादी युवजन सभा के जिला सचिव थे। उनकी गतिविधि के चलते पुलिस उनके पीछे लग गई। इस कारण उन्हें मेरठ छोड़ना पड़ा। वे 20 महीने तक अपना शहर छोड़कर फरार रहे और भूमिगत होकर आपातकाल का विरोध करते रहे। हिन्दुस्थान समाचार/कुलदीप / प्रभात ओझा

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