सामाजिक न्याय बनाम आरक्षण या सामाजिक न्याय और आरक्षण
इलाहाबाद

सामाजिक न्याय बनाम आरक्षण या सामाजिक न्याय और आरक्षण

Team Raftaar

समाज एक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं। मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षा और निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं।मनुष्य सामाजिक प्राणी है|मनुष्य सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है|अन्य प्राणियों की मानसिक शक्ति की अपेक्षा मनुष्य की मानसिक शक्ति अत्यधिक विकसित है|समाज रूपी मकान जब न्याय रूपी स्तम्भ पर खड़ा होता है तो ऐसा समाज सौम्यता,समानता और शांति का प्रतीक होता है|सामाजिक न्याय (सोशल जस्टिस )की बुनियाद सभी मनुष्यों को समान मानने के आग्रह पर आधारित है।सामाजिक न्याय अर्थात समानता का अधिकार|न्याय ही समाज में फैली तमाम तरह की बुराईयों और गैर-सामाजिक तत्वों पर लगाम लगाने, उन्हें सजा देने तथा तमाम नागरिकों के नैतिक और मानवाधिकारों की रक्षा करता हैं| यह दिवस खास कर समाज में फैली असमानता और भेदभाव जैसी कुरीतिओं के प्रति तेजी से उठ रहे असमानता और भेदभाव से समाजिक न्याय की मांग को देखते हुए कई कानून बने लेकिन आज भी यह बुराई हमारे समाज में फैली हुयी हैं | इसे दूर करने के लिए कई बार विचार विमर्श हुए और इसके निदान के लिए कई अभियान भी चलाये गए|लेकिन फिर भी अभी तक समाज से यह बुराई नहीं मिट पायी|सामाजिक न्याय एक सपना का सपना ही बना रहा|समाज में फैली भेदभाव और असमानता के कारण मानवाधिकारों का हनन लगातार होता रहा| संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में 20 फरवरी के दिन को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रुप में मनाने की घोषणा की थी|अतएव विश्व में प्रत्येक वर्ष 20 फरवरी के दिन को विश्व सामाजिक न्याय दिवस (वर्ल्ड डे ऑफ़ सोशल जस्टिस) के रूप में मनाया जाता हैं|विश्व सामाजिक न्याय दिवस का आयोजन विभिन्न सामाजिक मुद्दों,जैसे– बहिष्कार, बेरोजगारी तथा गरीबी से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है|इसी दिवस को सफल बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के लोगो के द्वारा सामाजिक न्याय हेतु अलग अलग तरह के कैम्प लगाये जाते हैं और लोगो को सामाजिक न्याय के प्रति जागरूक किया जाता हैं|विश्व सामाजिक न्याय दिवस- 2021 का थीम / प्रसंग है " अंकीय अर्थव्यवस्था में सामाजिक न्याय का आह्वान |"(ए कॉल फॉर सोशल जस्टिस इन द डिजिटल इकोनॉमी)|अंकीय अर्थव्यवस्था (डिजिटल इकोनॉमी) का अर्थ उस अर्थव्यवस्था से है जो अंकीय संगणन की प्रौद्योगिकी (जैसे कम्प्यूतर, इन्टरनेट) आदि पर आधारित हो। कभी-कभी इसे इन्टरनेट अर्थव्यवस्था, नयी अर्थव्यवस्था, या वेब अर्थव्यवस्था भी कहते हैं। विश्व में डिजिटल अर्थव्यवस्था कार्य करने की क्षमता को नया आयाम दे रही है। पिछले एक दशक में, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी,क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा के विस्तार ने डिजिटल प्लेटफार्मों के प्रसार को बढ़ावा दिया है| डिजिटल अर्थव्यवस्था समाज के कई कार्य क्षेत्रों में प्रवेश कर चुका हैं। वर्ष 2020 की शुरुआत से,कोविड-19 महामारी के परिणामों ने विश्व में दूरस्थ कार्य व्यवस्था को जन्म दिया है| डिजिटल प्लेटफार्म ने कोविड-19 महामारी के दौरान दुनिया को वेब /इंटरनेट के माध्यम से जोड़े रखा| डिजिटल प्लेटफार्म ने समाज के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में जैसे शिक्षा,बैंकिंग,सुरक्षा,एंटरटेनमेंट आदि को काफी मजबूती प्रदान करी| डिजिटल प्लेटफार्म ने कई व्यावसायिक गतिविधियों की निरंतरता को बनाए रखा |अंतर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले उत्सव और प्रतिस्पर्धा का लोगो ने डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से जमकर लुफ्त उठाया|डिजिटल प्लेटफार्म ने न्याय व्यवस्था को समाज से जोड़े रखा है|कोरोना महामारी के दौरान समाज को सुलभ और सस्ता न्याय दिलाने में डिजिटल प्लेटफार्म ने अहम् भूमिका निभाई है |डिजिटल प्लेटफार्म पर लोगो ने अर्थव्यवस्था के विकास और प्रभाव को और मजबूती प्रदान की है। डिजिटल लेबर प्लेटफ़ॉर्म मज़दूरों को आय-सृजन के अवसर और लचीली कार्य व्यवस्था से लाभ प्रदान करते हैं|कई देशों के नियामक प्रतिक्रियाओं ने डिजिटल श्रम प्लेटफार्मों पर काम करने की स्थिति से संबंधित कुछ मुद्दों को संबोधित करना शुरू कर दिया है। हालाँकि, अंतर्राष्ट्रीय नीति संवाद और समन्वय की आवश्यकता है क्योंकि डिजिटल श्रम मंच कई न्यायालयों में काम करते हैं। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बहु-हितधारक नीति संवाद और समन्वय को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है ताकि देशों और मंच कंपनियों द्वारा प्रतिक्रियाओं की विविधता को देखते हुए नियामक निश्चितता और सार्वभौमिक श्रम मानकों की प्रयोज्यता सुनिश्चित की जा सके।

भारत में अशिक्षा, ग़रीबी, बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता ज्यादा है। इन्हीं भेदभावों के कारण सामाजिक न्याय बेहद विचारणीय विषय हो गया है। डॉ॰ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर (15 जनवरी 1929 – 4 अप्रैल 1968) अमेरिका के एक पादरी,आन्दोलनकारी(ऐक्टिविस्ट)एवं अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकारों के संघर्ष के प्रमुख नेता थे। उन्हें अमेरिका का गांधी भी कहा जाता है। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि "जहां भी अन्‍याय होता है वहां हमेशा न्‍याय को खतरा होता है| यह बात केवल वैधानिक न्‍याय के बारे में ही सही नहीं है क्योंकि एक विवेकपूर्ण समाज से सदैव समावेशी प्रणाली के लिये रंग, नस्‍ल,वर्ग,जाति जैसी किसी भी प्रकार की सामाजिक बाधा से मुक्त न्‍याय सुनिश्चित करने की उम्‍मीद की जाती है| ताकि समाज का कोई भी व्‍यक्ति अपने न्‍याय के अधिकार से वंचित न हो सके|किसी को भी न्‍याय से वंचित रखना न केवल सामाजिक न्‍याय के सिद्धांतों के खिलाफ है बल्कि संविधानिक प्रावधानों के भी खिलाफ़ हैं |" भारत में लोकतंत्र है और राजनेताओं ने लोकतंत्र का आधार,आरक्षण को बना दिया है| भ्रष्ट प्रशासन,शिक्षा से लेकर न्याय तक का राजनैतिककरण होना ,लोकतंत्रात्मक प्रणाली का जुगाड़ तंत्रात्मक हो जाना आदि अन्य सामाजिक कुरीतियों ने जन्म ले लिया| सत्य अहिंसा विरोधी रथ पर सवार हो सत्ता के चरम शिखर पर पहुंचने वाले सुधारकों की मनोदशा ठीक नहीं है| सुधारकों की प्रवृत्ति ठीक होती तो देश में आरक्षण को लेकर राजनीति न होती| शिक्षा समाज का दर्पण है|इस परिपेक्ष्य में शिक्षा का बहुजन हिताए स्वरुप प्रधान होकर गरीब तथा वंचित वर्ग का नेतृत्व करता दिखाई देता है|भारत में शैक्षिक प्रबंधन अच्छा नहीं है|25.08.1949 ई. में संविधान सभा में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आरक्षण को मात्र 10 वर्ष सीमित रखने के प्रस्ताव पर एस. नागप्पा व बी. आई. मुनिस्वामी पिल्लई आदि की आपत्तियां आईं| डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कहा मैं नहीं समझता कि हमें इस विषय में किसी परिवर्तन कि अनुमति देनी चाहिए|यदि 10 वर्ष में अनुसूचित जातियों कि स्थिति नहीं सुधरती तो इसी सरंक्षण को प्राप्त करने के लिए उपाय ढूढ़ना उनकी बुद्धि शक्ति से परे न होगा| आरक्षण समानता का का प्रतीक नहीं रह गया क्योंकि आरक्षित कोटा सामान्य कोटे को बहुत पीछे धकेल दिया है, अब सामान्य कोटे को आरक्षण की जरुरत पड़ गई है| इसलिए सामाजिक न्याय देते समय समय और परिस्थिति का विशेष ध्यान रखना चाहिए|किसी विशेष जाती को लम्बे समय तक दिया गया लाभ दूसरे जाती के लोगों को प्रभावित करता है|ये समानता कैसी है ? जो समानता में दरार पैदा करती है|जिस प्रकार दूध में पाए जाने वाले माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस और गैर-बीजाणु बनाने वाले अन्य रोग-रोधी सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने के लिए समय (15 सेकंड) और तापमान (72°सेंटीग्रेड ) आवश्यक है। यदि समय और तापमान बहुत ज्यादा कर दें तो दूध का पोषण ख़त्म हो जाएगा| कहने का तात्पर्य यह है कि सीमा से ज्यादा समय और तापमान देकर हम दूध में से हानिकारक बैक्टीरिया तो ख़त्म कर सकते हैं पर दूध के कि क्वालिटी खराब हो जाती है|उसी प्रकार से सीमा से ज्यादा समय तक दिया गया आरक्षण व्यक्ति को अपंग और आलसी बना देता है|अतएव आरक्षण देते समय, समय और परिस्थिति तय होनी चाहिए|अम्बेडकर जी ने 10 वर्ष का जो समय सीमा तय किया था वहीँ तक आरक्षण को सीमित रखना था|आरक्षणवादी लोग डॉ. अम्बेडकर की राष्ट्र सर्वोपरिता की कद्र नहीं करता| आरक्षणवादी लोगों ने राष्ट्र का संतुलन खराब कर दिया है|आरक्षणवादी लोग वोट की राजनीति करने लगे हैं, न कि डॉ. अम्बेडकर के सिद्धांत का अनुपालन कर रहे है|आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए|आरक्षण कोटे से चयनित आई.ए.एस., पी.सी.एस., इंजीनियर ,डॉक्टर आदि अपने कार्य का संचालन ठीक से नहीं कर पाते है क्यों कि उनको ,कोटे के तहत उभारा गया| ताजा स्थिति यह है कि आरक्षण राष्ट्रीय विकास पर हावी है|अतः सामाजिक न्याय को पुनःजीवित करने के लिए,आरक्षण को वोट कि राजनीति से दूर रखना होगा|आरक्षण विकास का आधार नहीं हो सकता|आरक्षण लोकतंत्र का आधार नहीं हो सकता|आरक्षण समुदाय को अलग करने का काम करता है न कि जोड़ने का|ऐसी डोर जो समुदाय या लोगों को जोड़े वह है लोकतंत्र|लोकतंत्र का आधार सिर्फ और सिर्फ विकास हो सकता है क्योंकि डोर या रस्सी रूपी विकास ही समूह को जोड़ने का आधार है|लोकतंत्र का आधार विकास होना चाहिए न कि आरक्षण|आरक्षण सामाजिक न्याय का द्योतक नहीं है|भारत जैसे देश में आरक्षण सामाजिक वैमनस्यता का मूल कारण है|आरक्षण समाज को विघटित करता है संगठित नहीं |वैमनस्यता से असमानता की बाधा को दूर नहीं किया जा सकता| अतः सामाजिक न्याय समय और परिस्थिति पर आधारित होना चाहिए|

लेखक:

डॉ शंकर सुवन सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं विचारक

असिस्टेंट प्रोफेसर,शुएट्स,नैनी, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

shanranu80@gmail.com