सिवान में चहल-पहल बढ़ी, खेतों में धान की नर्सरी डालने की तैयारी में जुटे किसान

सिवान में चहल-पहल बढ़ी, खेतों में धान की नर्सरी डालने की तैयारी में जुटे किसान
activities-increased-in-siwan-farmers-preparing-to-put-paddy-nursery-in-the-fields

-अगैती खेती करने वाले किसान 20 जून से धान की रोपाई शुरू कर देंगे वाराणसी, 09 जून (हि.स.)। जिले के ग्रामीण अंचल में खेती किसानी की तैयारी में किसान जुट गये हैं। लगभग तीन माह से वीरान पड़े सिवान में चहल-पहल बढ़ गई है। धान का बेहन (नर्सरी) डालने की तैयारी में जुटे किसान ट्रैक्टर से खेतों को जुतवाने के साथ इसकी मेड़बंदी कर बीज डालने के लिए लेव तैयार (खेत में पानी भरने)कर रहे है। कहीं-कहीं अग्रिम खेती करने वालों ने अपने निजी सिंचाई व्यवस्था पर मई माह के अंत में ही खेतों को तैयार कर धान की बीज डाल दिये हैं। 20 जून से इनका बीज रोपाई के लिए तैयार हो जायेगा। वहीं, वाराणसी सहित पड़ोसी जिला चंदौली में ज्यादातर किसान जो नहरों और बारिश के पानी पर निर्भर हैं वे 15 से 20 जून के मध्य धान की नर्सरी डालते हैं। जनपद चन्दौली के अलीनगर थाना क्षेत्र के ग्राम धूस खास के किसान दिलीप कुमार मिश्र 'बबलू' और भारतीय किसान संघ चंदौली के अध्यक्ष संतोष मिश्र उर्फ 'मुन्ना' ने बुधवार को 'हिन्दुस्थान समाचार'से बातचीत में बताया कि ज्येष्ठ माह के मध्य में हम लोग धान की नर्सरी डाल देते हैं। बीज डालने के पहले खेत को तैयार करते हैं। जुताई के बाद हेंगा (समतल) कर खेतों में पानी भरकर लेव तैयार कर लेते हैं। खेत में पहले खरपतवार रोकने के लिए दवा डालने के साथ धान की बीज डालते हैं। एक बीघा के रोपाई के लिए दो से ढाई किग्रा धान के बेहन की जरूरत पड़ती है। दिलीप मिश्र ने बताया कि खेतों में बीज डालने के पहले समहूत (विधिवत पूजन अर्चन) होता है। इसके पहले ही खाद बीज दवा का इंतजाम भी करना पड़ता है। संतोष मिश्र बताते हैं कि धान की नर्सरी उसकी रोपाई से कम से कम 20-22 दिन पहले डाली जाती है। नर्सरी तैयार होने लगती है तो फिर रोपाई के लिए पूरे खेतों में जुताई कर लेव तैयार कर लिया जाता है। संतोष मिश्र बताते हैं कि धान की नर्सरी डालने के लिए 15 जून के आसपास का समय सही माना जाता है। कुछ लोग खासकर सांडा की खेती करने वाले किसान मई माह के तीसरे सप्ताह में ही धान की नर्सरी डाल देते हैं। धान का बेहन तैयार होने के बाद उखाड़ कर दूसरे खेत में लगाया जाता है। पहले महिलाएं धान की रोपनी करती थी। अब रोपना (पुरूष ) कर रहे हैं। दिलीप मिश्र बताते है कि रोपना से अपेक्षाकृत बेहन की बर्बादी कम होती है। रोपनी के लिए खेत में पानी की मात्रा घुटने से ऊपर होना चाहिए, तभी बेहन का सही जमाव होता है। उन्होंने बताया कि इनके गांव और आसपास के ज्यादातर किसान नाटी मंसूरी,डीपीटी,चिंटू धान का बीज डाल रहे हैं। वाराणसी के कृषि विशेषज्ञ और बीज विक्रेता राजन राय बताते हैं कि भारत के उच्च वर्षा एवं तापमान वाले क्षेत्र में इसकी खेती वर्ष में एक बार खरीफ के मौसम में की जाती है। वाराणसी सहित पूर्वांचल के जिलों में आमतौर पर जून-जुलाई माह में ही बेहन पड़ता है। भारत में उगाई जाने वाली कुल धान उत्पादों में 80 फीसद से अधिक उत्पादन इसी मौसम में ही की जाती है। राजन राय बताते हैं कि पूर्वांचल के जिन क्षेत्रों में पानी की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता होती है। मानसून का भी साथ मिलता है, वहां पर लेव बनाकर बीज पड़ता है। जिन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता कम होती है तथा सिंचाई के साधन भी कम होते हैं वहां पर धान की खेती अलग तरीके से होती है। अच्छी फसल के लिए समय-समय पर खाद तथा उर्वरकों को भी खेतों में डाला जाता है। लगभग 120 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस तथा 60 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है। इसके साथ ही साथ धान की फसल को खैरा रोग से बचाव के लिए जिंक का भी उपयोग होता है। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर