गंगा दशहरा पर गंगोत्री से गंगा सागर तक निकाली गई 'शब्द यात्रा'

गंगा दशहरा पर गंगोत्री से गंगा सागर तक निकाली गई 'शब्द यात्रा'
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- लोक संस्कृति शोध संस्थान का ऑनलाइन आयोजन लखनऊ, 20 जून (हि.स.)। लोक संस्कृति शोध संस्थान एवं त्रिवेणी अंतरराष्ट्रीय संस्था के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को गंगा दशहरा के अवसर पर गंगोत्री से गंगा सागर तक की 'शब्द यात्रा' निकाली गई। कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रो कमला श्रीवास्तव ने गंगा से जुड़े संस्मरण के साथ लोक गीत गंगा तोरी लहर सभै कै मन भाई से की। साहित्यकार डॉ विद्या विन्दु सिंह ने गंगा के प्रकट होने से सम्बन्धित विभिन्न पौराणिक व लोक कथाओं की चर्चा करते हुए कहा कि भागीरथी गंगा की महिमा का बखान प्राचीन साहित्य से लेकर आज तो विभिन्न रूपों में हुआ है, पर जन मानस में गंगा मइया के प्रति जो अकूत श्रद्धा भरी है उसको वाणी देना कठिन है। उन्होंने कहा कि लोक जीवन के समस्त संस्कार गंगा के स्मरण और उनके पवित्र जल की उपस्थिति के बिना सम्पन्न नहीं होते। गंगा जल के प्रति निष्ठा का ही परिणाम है कि कहीं का भी जल हो उसे हाथ में लेकर गंगाजल की ही शपथ ली जाती है। गंगा देहु भगीरथ पूत... कहकर उनसे भागीरथ जैसे पुत्र की कामना की जाती है। वे पुत्रदात्री तो हैं ही जीवन की निरन्तरता, प्रेम की सनातनता की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस मौके पर उन्होंने गंगा दशहरा पर सुनी जाने वाली कथा व उनसे जुड़ी अन्य लोक कथाएं भी सुनाईं। साहित्यकार ऋतुप्रिया खरे ने अपनी पुस्तक ‘विकास की गंगा’ से गंगा महात्म्य का वर्णन करते हुए सोदाहरण गीत भी प्रस्तुत किए। उन्होंने गंगा के प्रवाह को निर्मल बनाये रखने के संकल्प को याद दिलाते हुए युगों युगों से बहती गंगा की सौगन्ध उठायेंगे, गंगा फिर निर्मल होगी हम गंगा स्वच्छ बनायेंगे... सुनाया। ऑनलाइन आयोजित गंगा यात्रा संगोष्ठी में देश-विदेश के सैकड़ों लोग सहभागी हुए। हिन्दुस्थान समाचार/राजेश

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